Actor Bharat Bhushan, who was troubled by the strughes, was returning but 60 rupees changed his luck – स्ट्रगल से परेशान वापस लौट रहे थे भारत भूषण, 60 रुपए ने बदल दी किस्मत

भारत भूषण हिंदी सिनेमा जगत के मंझे हुए कलाकार थे। उनकी गिनती हमेशा सरल, सहज, शिष्ट और शालीन कलाकारों में होती है। अपने दौर में उनका नाम कभी भी किसी विवाद से नहीं जुड़ा था। अपने करियर में कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्जा गालिब जैसे चरित्रों को नया रूप देने वाले एक्टर भारत भूषण को कभी फिल्मों में छोटे-छोटे रोल करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। चलिए बताते हैं भारत भूषण से जुड़ा एक रोचक वाकया। जब सिफारिश पत्र भी उनके काम नहीं आया था और निराश होकर सेट से लौटते थे।

दरअसल यह वाकया उन दिनों का है जब भारत भूषण एक्टर बनने मुंबई आए थे और काम की तलाश में थे। भारत भूषण जब मुंबई आए तो उनके पास हिंदी सिनेमा के मशहूर डायरेक्टर महबूब खान के लिए एक सिफारिश पत्र था। उस वक्त महबूब खान मुंबई के ज्योती स्टूडियो में अलीबाबा चालीस चोर की शूटिंग में व्यस्त थे।

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भारत भूषण ने उन्हें वह खत दिखाया लेकिन तब तक फिल्म में कोई रोल नहीं बचा था। महबूब ने भारत भूषण का खत नजरअंदाज कर दिया। वह काफी निराश हो गए और तब उन्हें किसी ने डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा के बारे में बताते हुए कहा कि वह भक्त कबीर फिल्म बना रहे हैं वहां कुछ हो सकता है।

इसके बाद भारत रामेश्वर के स्टूडियो पहुंचे लेकिन वह वहां नहीं थे। उन्हें पता चला कि फिल्म की कास्ट पूरी हो चुकी है, सिर्फ काशी नरेश का छोटा सा रोल बचा है। भारत भूषण एक बार फिर निराश हो गए और हताश होकर लौटने लगे। तभी डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा वहां पहुंच गए उन्होंने निराश भारत को देखा और कैबिन में बुला लिया। भारत भूषण से बात कर रामेश्वर काफी प्रभावित हुए। उन्होंने भारत भूषण को 60 रुपये प्रतिमाह की नौकरी के साथ काशी नरेश का रोल दे दिया। 60 रुपये की नौकरी पाकर मानों भारत भूषण की किस्मत बदल गई थी। यह सैलरी स्ट्रगल के दिनों में राहत की तरह थी। इस तरह भारत भूषण को साल 1942 में रिलीज हुई फिल्म भक्त कबीर में पहला रोल मिला था। हालांकि इससे पहले 1941 में उनकी दूसरी फिल्म रिलीज हो गई थी। निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की फिल्म चित्रलेखा में उन्होंने छोटा सा रोल किया था।

बता दें कि भारत भूषण ने भक्त कबीर (1942), भाईचारा (1943), सुहागरात (1948), उधार (1949), रंगीला राजस्थान (1949), एक थी लड़की (1949), राम दर्शन (1950), किसी की याद (1950), भाई-बहन (1950), आंखें (1950), सागर (1951), हमारी शान (1951), आनंदमठ और मां (1952) फ़िल्मों में काम किया। वहीं भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फिल्म बैजू बावरा से चमका था।

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