Anand Bakshi, who was the conductor’s house for 6 years free, left the job twice – जब 6 साल फ्री में कंडक्टर के घर रहे आनंद बख्शी, दो बार छोड़ी फौज की नौकरी

4 हजार गीतों के साथ 40 साल से भी ज्यादा लंबा फिल्मी सफर और 40 बार फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नामांकन। यह आंकड़े बताते हैं कि आनंद बख्शी ने जो रचा उसका दायरा कितना विशाल था। आनंद बख्शी ने काफी लंबे समय तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया है। उन्होंने हिंदी सिनेमा के तमाम दिग्गज गायकों के साथ समा बंधा है और सुर्खियां बटोरी हैं। इनमें शमशाद बेगम से लेकर अलका याग्निक, मन्ना डे और कुमार सानू जैसे गायक शामिल रहे हैं। ‘मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए’ यह गाना आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। आनंद बख्शी ने बॉलीवुड में पहचान बनाने के लिए काफी स्ट्रगल किया है। यहां तक कि वह दूसरी बार हताश होकर लौट रहे थे। चलिए बताते हैं आखिर कैसे एक कंडक्टर दोस्त ने की थी आनंद बख्शी की मदद।

21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी में जन्मे आनंद बख्शी गीतकार के साथ-साथ गायक भी बनना चाहते थे। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वे 14 साल की उम्र में घर से भागकर बंबई आए लेकिन हताश होकर वापस लौट गए थे। शुरुआत में मौका नहीं मिला तो जिंदगी चलाने के लिए उन्होंने कई साल तक पहले नौसेना और फिर सेना में काम किया। फौज की नौकरी के दौरान भी वह कविताएं लिखते थे और उनकी रचना काफी पसंद की जाती थी। इसलिए वह दोबारा मुंबई आने से अपने आप को रोक नहीं सके।

आनंद बख्शी 1956 में दोबारा मुंबई लौटे और दादर के गेस्ट हाउस में रहने लगे लेकिन हालात पहले से भी बदतर हो गए। 5-6 महीने मुंबई में बिताने के बाद भी आनंद को कुछ हासिल नहीं हुआ। हालात पहले से खराब होने लगे थे। गेस्ट हाउस का किराया देना तो दूर उनके पास खाने के भी पैसे नहीं बचे थे।

वह निराश और हताश हो गए थे, घर लौटना चाहते थे लेकिन वापस जाने के पैसे भी नहीं थे। तब वह अपने एक दोस्त चित्रमल के पास पहुंचे जो पेशे से कंडक्टर थे। उन्होंने कंडक्टर दोस्त से वापस लौटने के लिए मदद मांगी लेकिन उनसे मिलकर आनंद बख्शी के दिन बदल गए। दोस्त चित्रमल ने उनपर भरोसा जताते हुए उन्हें अपने घर ले गए और उनसे बिना किराया लिए अपने घर मुंबई के बोरीवली में रखा। यहां तक कि कंडक्टर दोस्त चित्रमल ने उनका खाना-खर्चा भी उठाया। इसके बाद आनंद बख्शी 6 साल तक अपने दोस्त के घर रहे थे।

हालत खराब, वापस जाने के भी पैसे नहीं बचे, चित्रमल कंडक्टर दोस्त बना तो उससे मदद मांगी, कं ने कहा भरोसा है कामयाबी जरूर कदम चूमेगी, खाने-घर जाने के के भी पैसे नहीं है, चित्रमल ने कहा बोरीवली में अपने घर ले गए, 6 साल तक फ्री में रहे सारा खर्चा उठाया। बने बड़े गीतकार।

1958 में आनंद बख्शी को पहला ब्रेक मिला। भगवान दादा की फिल्म भला आदमी के लिए उन्होंने चार गीत लिखे। फिल्म तो नहीं चली लेकिन गीतकार के रूप में उनकी गाड़ी चल पड़ी। इसके बाद उन्हें फिल्में मिलती रहीं। जिनमें काला समंदर, मेहंदी लगी मेरे हाथ जैसी फिल्में शामिल थी। 1965 में आनंद बख्शी के करियर ने एक बड़ी करवट ली। ‘हिमालय की गोद’ और ‘जब-जब फूल खिले’ फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को अचानक ही आसमान पर पहुंचा दिया। इसके बाद तो आराधना, कटी पतंग, शोले, अमर अकबर एंथनी, हरे रामा हरे कृष्णा, कर्मा, खलनायक, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, ताल, गदर-एक प्रेमकथा और यादें तक 4 दशक से भी ज्यादा समय तक वह अपने गीतों की फुहारों से लोगों के दिलों को भिगोते रहे।

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