अयोध्‍या पर गरमागरम बहस: जज ने कप‍िल स‍िब्‍बल से कहा- अाप मुकर रहे हैं, हमें मत स‍िखाइए supreme court rapped kapil sibbal asked do not teach us

राम जन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सुन्‍नी सेंट्रल वक्‍फ की ओर से पेश वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता कपिल सिब्‍बल ने मामले की सुनवाई जुलाई, 2019 तक टालने की मांग की थी। हालांकि, उन्‍होंने आम चुनावों का स्‍पष्‍ट तौर पर उल्‍लेख नहीं किया, लेकिन माना जा रहा है कि सिब्‍बल ने लोकसभा चुनाव की ओर ही संकेत किया था। मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने उनकी दलीलों को खारिज करते हुए सुनवाई की अगली तारीख आठ फरवरी मुकर्रर कर दी। दोनों पक्षों और पीठ के बीच चली सुनवाई का ब्‍योरा कुछ इस तरह है –

कपिल सिब्‍बल: इस मामले पर पहले सुनवाई क्‍यों नहीं की गई? अचानक से अब क्‍यों? शायद यह भारत के इतिहास का सबसे महत्‍वपूर्ण मामला है, क्‍योंकि इससे देश का भविष्‍य तय होगा। इसके गंभीर परिणाम होंगे। लिहाजा इसे पांच या सात जजों की पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। कृपया इस मामले की सुनवाई जुलाई 2019 तक के लिए टाल दें (मई 2019 में लोकसभा चुनाव होना है), क्‍योंकि इसका भारतीय राजनीति पर असर पड़ेगा।

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पीठ: कोर्ट इस बात को लेकर पूरी तरह आश्‍वस्‍त है कि सभी पक्षकारों के काबिल अधिवक्‍ता पूरी तरह से तैयार होकर आएंगे और स्‍थगन की मांग नहीं करेंगे।

 

सिब्‍बल: मैं इस तथ्‍य से भी असंतुष्‍ट हूं कि एक व्‍यक्ति जो इस मामले में पक्षकार भी नहीं है, उन्‍होंने इसका उल्‍लेख किया और मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो गया। कोर्ट को इस जाल में क्‍यों फंसना चाहिए? कुछ लोग पार्टी के घोषणात्र को आगे बढ़ा रहे हैं। (उनका संकेत भाजपा नेता सुब्रमण्‍यम स्‍वामी की तरफ था, हालांकि उन्‍होंने स्‍पष्‍ट तौर पर नाम नहीं लिया।)

हरीश साल्‍वे (हिंदू पक्ष के अधिवक्‍ता): हां, कभी-कभी स्‍वामित्‍व वाले मामलों का असर अदालत से बाहर भी पड़ता है, लेकिन मैं नहीं समझता कि कोर्ट को इसकी परवाह करनी चाहिए। यह परेशान करने वाला है। वे इस बात का अनुमान लगा रहे हैं कि कोर्ट को किस तरफ जाना चाहिए। इस तरह की बात क्‍यों होने लगी है कि धर्मनिरपेक्षता का क्‍या होगा?

साल्‍वे: क्‍या हम यह जान सकते हैं कि कोर्ट क्‍या निर्णय लेगा? सुप्रीम कोर्ट को हाई कोर्ट के फैसले पर कानून के तहत निर्णय लेना चाहिए न कि इस आधार पर कि इसके परिणामस्‍वरूप क्‍या होंगे। सबसे बड़ा तथ्‍य तो यही है कि उन्‍होंने (दूसरा पक्ष) जुलाई 2019 का वक्‍त मांगा है, यही सबसे बड़ा कारण है कि कोर्ट को आज से ही सुनवाई शुरू कर देनी चाहिए। वह बेहद गलत संदेश दे रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो इसका मतलब यह होगा कि कोर्ट की नजर इस बात पर भी है कि क्‍या होने जा रहा है।

जस्टिस अशोक भूषण (सिब्‍बल से): आप उसी बात पर जा रहे हैं जो आप पहले कह चुके हैं। आपने कहा था मामले की सुनवाई जनवरी में होनी चाहिए अब कह रहे हैं कि जुलाई 2019 में मामले को लिया जाए।

सिब्‍बल: हां, मैंने कहा था, और मैंने पूरे उत्‍साह के साथ कहा था।

जस्टिस भूषण: आप इसे नॉन सीरियस बना रहे हैं।

राजीव धवन (मुस्लिम पक्ष के वकील): यह मामला सिर्फ स्‍वामित्‍व का नहीं है, इसमें कुछ ऐसा है जो धर्मनिरपेक्षता के आधार को प्रभावित करता है। (शीर्ष अदालत के ही एक फैसले का हवाला देते हुए कहा) सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के मामले में कहा था कि मुस्लिम कहीं भी प्रार्थना कर सकते हैं। तो क्‍या दुनिया भर के मस्जिद अप्रासंगिक हो गए? यह न सिर्फ अपमानजनक है बल्कि यह आपसे (सुप्रीम कोर्ट) से भी जुड़ा है।

सीजेआइ दीपक मिश्रा: मिस्‍टर सिब्‍बल आप को ऐसा नहीं करना चाहिए (जब सिब्‍बल कोर्ट से जाने लगते हैं)। यह चौंकाने वाला और आश्‍चर्यजनक है। जब पीठ ने रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया शुरू की तो ऐसा न करने का अनुरोध किया गया। अधिवक्‍ताओं के आग्रह पर कोर्ट ने ऐसा नहीं किया।

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