गुजरात चुनाव 2017: बीजेपी के पक्ष में हैं यह 5 बड़ी बातें- gujarat-elections-2017-these-five-factors-may-raise-bjp-possibilities

गुजरात की सत्ता पर बीते दो दशक से ज्यादा वक्त से काबिज बीजेपी की परीक्षा की घड़ी आ गई है। शनिवार को पहले चरण के मतदान के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी फिर से उसी धमक से सत्ता पर काबिज हो पाएगी? अधिकतर चुनावी पोल्स पार्टी के पक्ष में ही नजर आ रहे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार जरूर मान रहे हैं कि बीजेपी को पिछली बार जितनी सीटें शायद न मिलें। वहीं, इन पोल्स में विपक्षी कांग्रेस भी पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिख रही है। बीजेपी ने चुनाव प्रचार में अपना सब कुछ झोंक दिया था क्योंकि यह पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का गृह राज्य है। इसके चुनावी नतीजे दोनों की निजी प्रतिष्ठा से भी जुड़े हुए हैं। अब 18 दिसंबर को जो भी नतीजे आएं, इससे पहले यह जान लेते हैं कि इस पार्टी के पक्ष में कौन से फैक्टर हैं

यूपी निकाय चुनाव नतीजों से मिला जोश: यह बताने की जरूरत नहीं है कि ऐन गुजरात चुनाव से पहले यूपी निकाय चुनाव में मिली धमाकेदार जीत से बीजेपी कार्यकर्ताओं का हौसला कितना बढ़ा होगा। पार्टी इन नतीजों के जरिए अपने विरोधियों को यह संदेश देने में सफल रही है कि उसकी नीतियों को जनता ने स्वीकार किया है।

मोदी का व्यक्तित्व और स्थानीय जुड़ाव: गुजरात पीएम नरेंद्र मोदी की जन्मस्थली है। मोदी इस राज्य की सियासी नब्ज को बेहद अच्छे से समझते हैं। वह खुद कई बार इस राज्य के सीएम रहे। पार्टी को उनके चेहरे के आधार पर ही राज्य में जीत मिली। ऐसे में उनसे बेहतर राज्य की राजनीतिक हवा को कौन समझ सकता है। देश भर में हिंदी में भाषण देने वाले मोदी आजकल गुजराती में लोगों से संवाद करते दिख रहे हैं। पार्टी को इसका फायदा जरूर होगा।

अमित शाह की सियासी रणनीति: बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह वो शख्स हैं, जिन्होंने पार्टी को एक नए मुकाम पर पहुंचाया है। आज आधे से ज्यादा देश पर पार्टी का शासन है। इसका बहुत कुछ क्रेडिट अमित शाह की चुनावी रणनीति को जाता है। कुछ राजनीतिक समीक्षक उन्हें आधुनिक राजनीतिक का चाणक्य भी करार देते हैं। शाह के सियासी ज्ञान पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा चुका है। अमित शाह के चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा पहलू यह है कि वह बूथ लेवल तक की रणनीति पर भी खुद नजर रखते हैं। अब मामला उनके राज्य का है, ऐसे में उनको खुद से भी बहुत सारी अपेक्षाएं होंगी।

विपक्ष के पास बड़े मुद्दों की कमी: बहुत सारे राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि गुजरात चुनाव में विपक्षी पार्टियों का हमला गैर वाजिब मुद्दों पर आधारित है। मसलन-ईवीएम का मुद्दा। यूपी निकाय चुनाव में मिली हार के बाद भी कांग्रेस के सहयोगी समाजवादी पार्टी ने ईवीएम पर ठीकरा फोड़ा। वहीं, मायावती ने भी इसी तरह के आरोप लगाए। विकास के मुद्दे पर बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रही कांग्रेस के पास मोदी के कारोबारी दोस्त और सरकार द्वारा उनको कथित तौर पर दी गई मदद जैसे घिसे-पिटे आरोप हैं। वहीं, राज्य में महंगाई और कारोबारियों को जमीन देने से जुड़े आरोपों पर भी कुछ मौकों पर गलत आंकड़े देकर पार्टी शर्मिंदगी झेल चुकी है।

कांग्रेस के पास सीएम फेस नहीं: कांग्रेस ने गुजरात चुनाव के लिए सीएम कैंडिडेट का ऐलान नहीं किया है। कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है। राजनीतिक गलियारों में अहमद पटेल को सीएम बनाए जाने की अटकलें हैं। माना जा रहा है कि इन अटकलों का फायदा बीजेपी ध्रुवीकरण के जरिए उठा सकती है। वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष बनने जा रहे राहुल गांधी अहमद पटेल को केंद्र से राज्य की राजनीति में भेजकर उनको किनारे लगा सकते हैं। अब इन अटकलों में जो भी सच्चाई हो, यह तो हकीकत है कि राज्य में कांग्रेस की सियासी जमीन अपेक्षाकृत कमजोर है। इसके अलावा, उसे गुटबाजी और फूट का भी नुकसान उठाना पड़ा है।

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