…तब अखबार में अपनी खबर या तस्वीर छपने का इंतजार करते रहते थे कपिलदेव, याद किए चंडीगढ़ के पुराने दिन – Former Indian cricket captain Kapil Dev remembers old days in Chandigarh waited to see his picture on newspaper

इंडियन क्रिकेट टीम के सफलतम खिलाड़ियों में से एक कपिल देव को खेलते देखना रोमांचकारी अनुभव तो है ही, उन्हें बोलते सुनना, पुराने दिनों की यादों को साझा करते हुए देखना भी एक मजेदार अनुभव है। कपिल देव की यादें हर खिलाड़ी, खेल प्रेमी और देश प्रेमी को बहुत कुछ सीखने के मौका देती है। एक कार्यक्रम में कपिल आपको लगभग 46 साल पीछे ले जाते है, और 1971 की बात आपको बताते हैं। ये मौका था चंडीगढ़ में एक स्टार्ट अप को प्रमोट करने का। इस दौरान कपिल देव अपने शहर चंडीगढ़ की यादों में खो गये। कपिल देव बताते हैं कि तब शहर में मात्र चार सिनेमाहॉल थे। जगत, नीलम, केसी और किरण,  फिल्में देखने के लिए स्कूल बंक करना उन दिनों आम बात थी। इस कार्यक्रम में कपिल देव ने अपने क्रिकेट कोच देश प्रेम आजाद को याद किया। कपिल देव ने इसी क्रिकेट गुरु के सानिध्य में चंडीगढ़ के सेक्टर-16 क्रिकेट स्टेडियम में क्रिकेट की बारीकियां सीखीं। कपिलदेव बताते हैं कि चूंकि मैं सेक्टर-16 में रहता था इसलिए सेक्टर-17 उनका पसंदीदा अड्डा था, जबकि सेक्टर-16 का मार्केट एक तरह से उनका दूसरा घर था।

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कपिल देव बातचीत में अखबार में अपनी तस्वीर देखने की बेताबी को बताते हैं। हरियाणा हरिकेन ने कहा, ‘मेरे कोच देश प्रेम आजाद और तब के ‘द ट्रिब्यून’ के स्पोर्ट्स एडिटर सैमुअल बनर्जी दोस्त थे, उन दिनों ट्रिब्यून चंडीगढ़ का एक मात्र अखबार था और मैं अखबार में अपनी तस्वीरें, अपने बारे में खबरें देखने के लिए बेसब्री से इंतजार करता था।’ कपिल बताते हैं कि सैमुअल अंकल और मेरे बीच लगाव इस लिए कायम हो पाया क्योंकि हम दोनों में क्रिकेट को लेकर जुनून था, वो डीपी आजाद के दोस्त थे जो काफी सख्त कोच थे।’

कपिल कहते हैं वह और उनके दूसरे क्रिकेटर साथी कोच से डरते थे। उन्होंने बतौर कोच और खिलाड़ी में साफ अंतर बता दिया था, आप उनके सामने मजाक नहीं कर सकते थे। हालांकि अब चीजें बदल गई हैं। कपिल देव बताते हैं कि आज आपको एक भी ऐसा खिलाड़ी नहीं मिलेगा जिसके पास मोबाइल ना हो और एक भी ऐसा विद्यार्थी नहीं होगा जो बिना कैलकुलेटर काम करता हो।’ कपिल देव बताते हैं कि क्रिकेट ट्रेनिंग में हो रहा बदलाव ठीक है, और क्रिकेट की विकास यात्रा में यह सही भी है, लेकिन किसी को भी अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए।

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