राहुल गांधी नए कांग्रेस अध्‍यक्ष, इन पांच समस्‍याओं से पा पाएंगे पार challenges before rahul gandhi

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आखिरकार कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं। पार्टी महासचिव बनने के बाद उन्हें वर्ष 2013 में भारत की सबसे पुरानी पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था। इसके बाद उन्होंने कई बदलाव किए थे। इनमें सबसे प्रमुख विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावी युवा नेताओं को पार्टी में स्थान देना था। यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई में आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के द्वारा युवाओं को शीर्ष पदों पर आसीन करने की प्रक्रिया शुरू करने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। हालांकि, सवाल यह भी उठने लगा है कि राहुल गांधी उपाध्यक्ष रहते ऐसा क्या नहीं कर पा रहे थे जो अध्यक्ष बनने के बाद करेंगे? कांग्रेस के महाधिवेशन में कांग्रेस के युवा अध्यक्ष पर अंतिम मुहर लगेगी, जहां देश भर के नौ हजार डेलीगेट द्वारा उन्हें समर्थन देने की उम्मीद है। ऐसे में उनके सामने क्या-क्या चुनौतियां हो सकती हैं?

नए और पुराने नेताओं के बीच संतुलन: राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती नए और पुराने नेताओं के बीच संतुलन साधना होगा। बतौर महासचिव और उपाध्यक्ष राहुल ने युवाओं को ज्यादा मौका दिया। राहुल के इस कदम से पुराने क्षत्रपों की नाराजगी कई बार सामने आ चुकी है। ऐसे में राहुल के लिए पहली और सबसे बड़ी चुनौती नए और पुराने दिग्गजों के बीच संतुलन साधना है। पुराने नेताओं में मोतीलाल बोरा, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं। दूसरी तरफ, सचिन पायलट, मुरली देवड़ा, सूरज हेगड़े और एम. टैगोर (पूर्व सांसद, पार्टी महासिचव और कर्नाटक के प्रभारी) जैसे नेता हैं।

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पार्टी का पुनर्गठन: राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस पार्टी में कई बदलाव होने की संभावना जताई जा रही है। इसके तहत पार्टी का पुनर्गठन भी किया जाना है। ऐसे में पुराने नेताओं को वह पूरी तरह से दरकिनार करेंगे या उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी, इस पर भी सबकी निगाहें होंगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी युवा सहयोगियों में से किसे तवज्जो देते हैं, क्योंकि इसी टीम के साथ ही राहुल लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए चुनौती पेश करेंगे।

लगातार हार ने बढ़ाई चिंता: राहुल के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस की लगातार हार है। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी को उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में हार का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा असम और बंगाल में भी पार्टी हाशिए पर चली गई है। बिहार चुनाव में जीत के बाद भी सरकार को संभाल न पाना कांग्रेस की बड़ी विफलता मानी जाती है। ऐसे में सबकी नजरें गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों पर टिकी हैं। गुजरात में राहुल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। यहां जीत मिलने पर न केवल राहुल का कद बढ़ेगा, बल्कि देशभर में सुस्त पड़े कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में भी सुगबुगाहट आएगी। अगले साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और उसके बाद वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव भी है।

मुस्लिम वोट बैंक को वापस लाना: मुस्लिम समुदाय परंपरागत तौर पर कांग्रेस के पक्ष में रहा है। लेकिन, नब्बे के दशक के बाद से क्षेत्रीय क्षत्रपों ने इस तिलिस्म को तोड़ा है। देश के तीन बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस के इस परंपरागत वोट बैंक को छिन्न-भिन्न कर दिया है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायवती ने इसमें सेंध लगाई है। बिहार में नीतीश कुमार मुस्लिम समुदाय के बीच लोकप्रिय हैं। लालू यादव भी समुदाय के बीच पैठ रखते हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ वाम दलों के मुस्लिम वोट बैंक को दरकाया है। ऐसे में राहुल के सामने मुस्लिम समुदाय को वापस लाना चौथी सबसे बड़ी चुनौती होगी।

जमीन पर काम करने वाले नेताओं की अनदेखी: सूत्र कहते हैं कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कई नेताओं को पार्टी में ज्यादा तरजीह नहीं दी गई है। हालात तो ये हैं कि ऐसे नेताओं को राहुल गांधी से मिलने तक का मौका नहीं दिया जाता है। डॉक्टर हिना जूनी पंडित को लोकसभा चुनाव के दौरान विशेष तौर पर योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र में भेजा गया था। उनकी शिकायत है कि जमीनी स्तर पर काम करने के बावजूद पार्टी ने उन्हें तवज्जो नहीं दी। सूत्र बताते हैं कि अगर उत्तराखंड की मौजूदा विपक्ष की नेता और वरिष्ठ कांग्रेसी इंदिरा हृदयेश को उचित मौका दिया जाता तो राज्य में कांग्रेस की स्थिति कहीं बेहतर होती। राहुल कार्यालय में जातिगत लॉबी को भी बड़ी बाधा के तौर पर देखा जाता है।

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