For BJP, what does ending up under 100 seats for the first time since 1995 mean? – गुजरात चुनाव: 22 साल में पहली बार बीजेपी की सौ से कम सीटें, ये रही वजह

लीना मिश्रा
पिछले 22 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है जब बीजेपी गुजरात में 100 सीटों से भी कम पर चुनाव जीती हो। यह तब हुआ है जब गुजरात में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार है और पार्टी की कमान भी किसी गुजराती के ही हाथ में है। बता दें कि सोमवार को आए नतीजों में बीजेपी को 99 सीटें मिली हैं। जबकि साल 2012 के विधान सभा चुनावों में बीजेपी को 116 सीट मिली थी। पार्टी को 2007 में 117, 2002 में 127, 1998 में 117, 1995 में 121 सीटें मिली थीं। यानी कभी 100 से कम का आंकड़ा नहीं रहा। इसी तरह कांग्रेस इन 22 वर्षों में 45 सीट से बढ़कर 77 सीट पर पहुंच गई है। यानी साफ है कि राज्य में बीजेपी का प्रभाव कम हो रहा है जबकि कांग्रेस का प्रभाव लोकतांत्रिक गणित में बढ़ता दिख रहा है।

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दरअसल, गुजरात में साल 2002 से बीजेपी पंचायत स्तर से लेकर संसद स्तर तक के सभी तरह के चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर ही जीतती रही है लेकिन अब उसे अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। बीजेपी के अधिकांश विधायकों ने भी अपनी जीत का श्रेय पीएम मोदी को दिया है क्योंकि उनका मतदाताओं से व्यक्तिगत संवाद और मेल-जोल घटता गया है। यही वजह है कि पाटीदार अमानत आंदोलन के दौरान भी बीजेपी विधायकों ने अपने-अपने विधान सभा क्षेत्रों से दूरी बनाए रखी। इस दौरान कई मतदाताओं ने उनकी बातचीत का फोन रिकॉर्ड कर लिया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। बीजेपी कार्यकर्ताओं का एक समूह इन सब बातों से भी बचता दिखा।

बीजेपी के लिए सबसे निराशाजनक प्रदर्शन सौराष्ट्र और कच्छ इलाके में रहा, जहां 54 सीटों में से बीजेपी को मात्र 23 सीटें मिलीं। साल 2012 के चुनावों में इस इलाके में बीजेपी को 35 सीटें मिली थीं। चुनावों ने साफ कर दिया है कि काठियावाड़ के पटेलों का फिर से कांग्रेस की तरफ झुकाव हुआ है। इस इलाके में आए चुनाव परिणाम 1985 के विधान सभा चुनाव के समान है। उस वक्त कांग्रेस ने कच्छ की छह सीटों में से पांच पर और सौराष्ट्र की 52 में से 43 पर जीत दर्ज की थी। उस साल राज्य में कांग्रेस को कुल 149 सीटें मिली थीं।

हालांकि, जीएसटी और नोटबंदी की आग में झुलसे सूरत के व्यापारियों ने फिर से बीजेपी पर ही भरोसा जताया। सूरत की 12 शहरी सीटों में से सभी 12 सीटें बीजेपी की झोली में ही गई हैं। बता दें कि जीएसटी के विरोध में सूरत के कपड़ा व्यापारियों ने 22 दिनों तक विरोध-प्रदर्शन किया था और इस दौरान करीब 60,000 यूनिट बंद हो गए थे। हीरा कारोबारियों ने भी मोदी सरकार के फैसले का विरोध किया था। हालांकि, कपड़ा और हीरा व्यापारियों ने आखिरकार बीजेपी को ही समर्थन दिया, जबकि उनके पक्ष में कांग्रेस और राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहा था और उन्हें रिझाने की कोशिश की थी। लेकिन ग्रामीण इलाकों में मतदाताओं ने बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस पर भरोसा जताया।

इनके अलावा दलित और आदिवासी मतदाताओं ने बीजेपी शासनकाल में हुए अत्याचार की वजह से उनसे मुंह मोड़ लिया। पटेल जो पारंपरिक रूप से बीजेपी के वोटर रहे, उनका वोट बीजेपी और कांग्रेस के बीच बंट गया। ओबासी समुदाय भी इस बार बीजेपी से नाराज रहा, नतीजतन बीजेपी को 100 से कम सीटों पर सिमटना पड़ा।

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