4 दशक से बिना वोटिंग अध्यक्ष चुन रही बीजेपी, जानें क्या है दूसरी पार्टियों का हाल – Congress president election rahul gandhi files nomination bjp choosing its president without election know about janta dal sp bsp

कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए राहुल गांधी ने सोमवार (4 दिसंबर) को नामांकन भरा। हालांकि, नॉमिनेशन से पहले पार्टी उस वक्त विवादों में घिर गई, जब एक कांग्रेसी नेता ने अध्यक्ष चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। इस आरोप को लेकर बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस पर तीखे हमले किए। वहीं, सोशल मीडिया पर आलोचकों का कहना है कि अध्यक्ष चुनाव का नतीजा पहले से ही फिक्स्ड है और परिवारवाद के तहत राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में अध्यक्ष का चुनाव कितना निष्पक्ष और लोकतांत्रिक होता है? जहां तक कांग्रेस की बात है, राहुल से पहले सोनिया गांधी 19 सालों तक पार्टी की कमान संभाल चुकी हैं। ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस में अध्यक्ष चुनाव एकतरफा रहे हों और गांधी परिवार का ही इस पर कब्जा रहा हो। पूर्व में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कुछ मौकों पर हाई वोल्टेज मुकाबला भी देखने को मिला है। आइए, डालते हैं दूसरी पार्टियों में अध्यक्ष चुनाव का क्या रहा है हाल

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‘आम सहमति’ के घिर चुकी है बीजेपी
भारतीय जनता पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद से ही आज तक अध्यक्ष पद के लिए भी एक बार भी मुकाबला नहीं हुआ। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष पद के लिए आम सहमति बनाने के बाद ही उम्मीदवार का नाम आगे बढ़ाया गया। वहीं, कांग्रेस और बीजेपी आलोचकों का कहना है कि पार्टी का असल नियंत्रण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास है। संगठन के नागपुर मुख्यालय से जिसका भी नाम तय होता है, उसे अध्यक्ष बना दिया जाता है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस नेता कमल नाथ सोमवार को भी बीजेपी पर हमलावर नजर आए। उन्होंने कहा, ‘क्या बीजेपी के अध्यक्षों का चुनाव होता आया है? क्या नितिन गडकरी मतदान प्रक्रिया के जरिए चुने गए थे? जवाब पहले उनको देना है।’

…जब कांग्रेस में सोनिया को मिली चुनौती
बात 1998 की है, जहां कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सीताराम केसरी को पद से बर्खास्त करते हुए सोनिया गांधी को अपना अध्यक्ष चुना था। सोनिया को शुरुआत में पार्टी के अंदर कई बार विरोध का सामना करना पड़ा। शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया के विदेशी मूल का सवाल उठाया। सोनिया ने इस्तीफा तो दे दिया लेकिन पार्टी वर्किंग कमेटी ने तीन नेताओं को बर्खास्त करते हुए सोनिया में फिर विश्वास दिखाया। बाद में अध्यक्ष पद के लिए सोनिया के सामने जितेंद्र प्रसाद ने चुनौती दी। हालांकि, उन्हें बस 1.02 पर्सेंट वोट ही मिले।

दूसरे कांग्रेसी नेताओं में भी भिड़ंत
ऐसा नहीं है कि पार्टी में सिर्फ सोनिया गांधी को ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद शरद पवार ने पीवी नरसिम्हा राव को चुनौती दी। राव 30 वोटों से जीत गए। बाद में राव को फ्रीहैंड देने के लिए कई सीनियर नेताओं को इस्तीफा दिलाया गया। हालांकि, राव को एक मामले में चार्जशीट और चुनाव में हार की वजह से 1996 में इस्तीफा देना पड़ा। राव ने सीताराम केसरी को चुना, हालांकि बाद में केसरी ने उन्हें ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। केसरी को भी बतौर पार्टी अध्यक्ष शरद पवार और राजेश पायलट ने चुनौती दी थी।

समाजवादी पार्टी, आरजेडी और जनता दल से टूटी पार्टियां
जब जनता दल अस्तित्व में था तो कई तरह के दिलचस्प मुकाबले देखने को मिले। शरद यादव ने पार्टी अध्यक्ष पद के लिए जॉर्ज फर्नांडीज को शिकस्त दी। शरद ने पार्टी नेतृत्व के लिए मुकाबले में लालू प्रसाद यादव को भी हराया। हालांकि, बाद में आपसी टकराव की वजह से जनता दल टूट गया और मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, देवगौड़ा, देवी लाल-चौटाला, अजीत सिंह, राम विलास पासवान जैसे नेताओं ने खुद की पार्टियां बनाईं। इन सभी ने समाजवाद और लोहिया के सिद्धांतों की बात तो की, लेकिन धीरे-धीरे अपनी पार्टी को पारिवारिक प्रॉपर्टी में तब्दील कर दिया। उदाहरण के तौर पर मुलायम सिंह, जिन्होंने हाल ही में कुछ राजनीतिक ड्रामे के बाद पूरी समाजवादी पार्टी की कमान अपने बेटे अखिलेश यादव को सौंप दी। लालू की सत्ता संभालने के लिए उनके बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी पूरी तरह तैयार हैं। अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की बात करें तो बाल ठाकरे से उद्धव ठाकरे के बाद शिवसेना के अगली पीढ़ी के नेता आदित्य ठाकरे ही नजर आते हैं।

लेफ्ट पार्टियों का हाल
सीपीएम और सीपीआई में विचारधाराओं और को लेकर काफी टकराव हुआ है। हालांकि, दोनों ही पार्टियों में मतदान के जरिए जनरल सेक्रटरी का चुनाव अभी तक नहीं हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि जब केरल सीपीएम में गुटबाजी की बातें सामने आईं तो कुछ राज्य और जिला स्तर के पार्टी कॉन्फ्रेंसेज में कमेटी के पदों के लिए चुनाव होता नजर आया। इस चुनाव में पार्टी और विरोधी, दोनों ग्रुप के लोग उतरे। शायद यही वजह है कि एक बार ईके नयनार ने केरल सीपीएम स्टेट कमेटी के चुनाव में सुशील गोपालन को हराते हुए राज्य के सीएम बने।

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