चमक खो रहा है जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल का सितारा – German Chancellor Angela Merkel is Right Now Facing Many Difficulties in her Political Career

वह 2011 से लगातार दुनिया की सबसे ताकतवर महिला हैं। उन्होंने युद्ध से जान बचाकर भागे दस लाख से ज्यादा शरणार्थियों का बाहें फैलाकर स्वागत किया। विश्व राजनीति में उन्हें उम्मीद की किरण के तौर पर देखा जाता है, खासकर अमेरिका में डोनॉल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद। यूरोप को एक सूत्र में बांधे रखने की जिम्मेदारी भी वह अपने कंधों पर उठाए हुए हैं। कुल मिलाकर एंजेला मर्केल विश्व राजनीति की स्टार हैं लेकिन घरेलू मोर्चे पर वह कई मुश्किलों में घिरी हैं। एक तो चुनावों के बाद सरकार बनाना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। दूसरा, एक ताजा सर्वे के मुताबिक आधे लोग चाहते हैं कि 2021 में अगले चुनाव से पहले उन्हें राजनीति को अलविदा कह देना चाहिए। यूगोव के सर्वे में शामिल 2,036 लोगों में से सिर्फ 36 प्रतिश लोग ही चाहते हैं कि मैर्केल चार साल का अपना अगला कार्यकाल पूरा करें। 47 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो चांसलर के पद पर अगले चार साल तक सिर्फ मर्केल को नहीं देखना चाहते।

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दिलचस्प बात यह है कि तीन महीने पहले हुए आम चुनाव के समय किए गए यूगोव के सर्वे में सिर्फ 36 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ने के हक में थे। लगभग 44 प्रतिशत लोग चाहते थे कि मर्केल अगले चार साल तक यूरोप में सबसे ज्यादा आबादी और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश जर्मनी का नेतृत्व करती रहें। ताजा सर्वे जरूर मर्केल तक भी पहुंचा होगा। लेकिन अभी उनके लिए बड़ा सिरदर्द यह सर्वे नहीं, बल्कि नई सरकार का गठन है। आम चुनाव के तीन महीने बाद भी यह साफ नहीं है कि अगली सरकार का गठन कब होगा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में हमेशा गठबंधन सरकारें ही बनी हैं। लेकिन गठबंधन बनाने में इतनी मुश्किल कभी पेश नहीं आई, जितनी इस बार हो रही है।

24 सितंबर के आम चुनावों में लगभग 33 प्रतिशत वोटों के साथ मर्केल की सीडीयू सबसे बड़ी पार्टी बनने में तो कामयाब रही लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे गठबंधन साझीदारों की जरूरत है। मर्केल ने पहले कारोबार समर्थक एफडीपी और पर्यावरण मुद्दों को लेकर चलने वाली ग्रीन पार्टी के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की। लेकिन एफडीपी और ग्रीन पार्टी के कई मुद्दों पर मतभेद के चलते गठबंधन की कोशिशें कामयाब नहीं हो पाईं। इसके बाद मर्केल को आम चुनाव में 20 प्रतिशत वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रही एसपीडी का दरवाजा खटखटाना पड़ा। एसपीडी गठबंधन पर बात करने के लिए तो सहमत हो गई, लेकिन पार्टी बहुत ही फूंक-फूंककर कदम रख रही है। पार्टी के बहुत से नेताओं को लगता है कि पिछली गठबंधन सरकार में मर्केल के साथ रहने का ही नतीजा है कि उन्हें हालिया आम चुनावों में अपने वोटों में ऐतिहासिक गिरावट झेलनी पड़ी है।

चुनाव नतीज आने के तुरंत बाद एसपीडी ने मर्केल की सीडीयू के साथ गठबंधन तोड़ने का एलान किया था। पार्टी को उम्मीद थी कि वह विपक्ष में रहेगी तो उसके लिए अपना आधार मजबूत करना आसान होगा। इसलिए अब सरकार में भागीदार बनने से पहले पार्टी शायद अपनी सभी शर्तों को मनवाना चाहती है और नफा नुकसान को तौल लेना चाहती है। इसीलिए गठबंधन बनने में इतना समय लग रहा है। इस रस्साकशी के बीच ताजा सर्वे के नतीजे मर्केल के लिए जरूर एक झटका हैं। मैर्केल 2005 से जर्मन चांसलर के पद पर बनी हुई हैं। ऐसे में, लोगों के भीतर चांसलर के पद पर किसी नए व्यक्ति को देखने की तमन्ना स्वाभाविक हो सकती है। मर्केल भी इस बात को जानती हैं कि अब वह अपने सियासी करियर की ढलान पर हैं। लेकिन यह अभी तक साफ नहीं है कि उनके बाद जर्मनी की सबसे बड़ी पार्टी का मुखिया कौन बनेगा।

येंस श्पान, डानिएल गुंटर और अनेग्रेट क्रांप कारेनबाउर जैसे नेताओं के नाम इस सिलसिले में गर्दिश कर रहे हैं। जिसे भी मर्केल की जगह लेनी है, उसके हिस्से में ढेरों चुनौतियां भी होगीं। एक तरफ ब्रेक्जिट है तो दूसरी तरफ शरणार्थी संकट, कभी व्लादिमीर पुतिन का मुकाबला करना है तो कभी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप से निपटना है। इस बीच, यूरोपीय संघ के अंदरूनी झगड़े भी सुलझाने पड़ते हैं, तो बीच बीच में वित्तीय मुश्किलों के झटके भी लगते रहते हैं। इतना ही नहीं, घरेलू मोर्चे पर मजबूत हो रहे दक्षिणपंथी अलग सिरदर्द हैं। अलबत्ता मर्केल की जगह लेने के लिए रेस अभी शुरू नहीं हुई है। मर्केल मैदान में डटी हैं। सरकार भी देर सवेर बन ही जाएगी। लेकिन जर्मन मीडिया में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मर्केल के सियासी करियर के अंत की शुरुआत हो चुकी है?

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