गोल्डी पेड़ लगाते गए, लोग फल खाते गए- Remembering Director Vijay Anand on his 13th death anniversary

विजय आनंद- (22 जनवरी,1934 – 23 फरवरी, 2004)

विजय आनंद ने ‘गाइड’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘काला बाजार’, ‘ज्वेलथीफ ’ जैसी कई सफल फिल्में निर्देशित कीं, जिनके दम पर उनके निर्माता ने खूब कमाया। मगर विजय आनंद को अक्सर अपने निर्माताओं की वादाखिलाफी का सामना करना पड़ा।

देव आनंद बतौर निर्माता दो भाषाओं में ‘गाइड’ (1965) बना रहे थे। उनके बड़े भाई चेतन आनंद हिंदी और टेड डेनियलवस्की अंग्रेजी संस्करण का निर्देशन कर रहे थे। मगर चेतन ‘गाइड’ बीेच में ही छोड़ अपनी फिल्म ‘हकीकत’ बनाने लगे। तब ‘गाइड’ के निर्देशन की जिम्मेदारी गोल्डी यानी विजय आनंद पर आई। गोल्डी ने कहा कि वे फिल्म की पटकथा अपने हिसाब से लिखेंगे। गोल्डी ने ‘गाइड’ में अध्यात्म का पुट दिया और देव की लवर बॉय की इमेज को ध्वस्त कर दिया।

अंग्रेजी से अलग हिंदी ‘गाइड’ में उन्होंने कई बदलाव भी किए क्योंकि उनका मानना था कि भारतीय दर्शक किसी महिला को पराये मर्द से इश्क करते स्वीकार नहीं करेंगे। मजरूह सुलतानपुरी ने इसके गाने लिखे तो गोल्डी को लगा कि गानों के लिहाज से तो हीरोइन खलनायिका नजर आती है। लिहाजा उनकी जगह शैलेंद्र को फिल्म के गीत लिखने की जिम्मेदारी दी गई, जिन्होंने नायिका को खलनायिका के बजाय बागी तेवर दिए।

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फिल्म का अंग्रेजी संस्करण बॉक्स आॅफिस पर फ्लॉप रहा। मगर गोल्डी की हिंदी ‘गाइड’ सुपर हिट साबित हुई। आरके नारायण, जिनके उपन्यास पर फिल्म बनी थी, ने तो यहां तक कहा कि फिल्म मेरी किताब से भी ज्यादा खूबसूरत बनी है।देव ने टेड को ‘गाइड’ के निर्देशन के लिए दस लाख दिए मगर अपने छोटे भाई गोल्डी को न तो कुछ दिया और न गोल्डी ने कुछ मांगा। यहां तक कि गोल्डी की मेहनत के बावजूद देव आनंद ने ‘गाइड’ के पोस्टरों पर लिखा- ए फिल्म बाय देव आनंद।

गोल्डी को लगा कि उनके घर में उनकी कीमत नहीं हो रही है लिहाजा उन्होंने बाहर की फिल्म निर्देशित करना तय किया। नासिर हुसैन ने उन्हें अपनी फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ का निर्देशन सौंपा। यहां भी विजय आनंद ने कहा कि वे अपना संगीतकार लाएंगे। नासिर और ‘तीसरी मंजिल’ के हीरो शम्मी कपूर शंकर-जयकिशन के भक्त थे। मगर गोल्डी के कहने पर दोनों ने आरडी बर्मन को सुना और उनके भक्त बन गए। अनुबंध के मुताबिक फिल्म के बॉम्बे वितरण क्षेत्र के मुनाफे में गोल्डी को 20 फीसद मिलना था। फिल्म के हिट होते ही नासिर ने अपने चचेरे भाई को गोल्डी के पास अनुबंध पर पुनर्विचार करने भेजा। गोल्डी को बुरा लगा और उन्होंने 20 फीसद मुनाफे वाली बात खुद अनुबंध से हटाई और अपना मेहनताना तक नहीं लिया। यह बात गोल्डी के मित्र फिल्म वितरक गुलशन राय को बहुत बुरी लगी।

गुलशन राय को अफसोस था कि उनके मित्र को ठग लिया गया है। लिहाजा उन्होंने अपनी कंपनी त्रिमूर्ति फिल्म्स बनाई और कहा कि गोल्डी उनके लिए एक फिल्म निर्देशित करें। इसके मुनाफे में वे उन्हें 33 फीसद हिस्सेदारी देंगे। गोल्डी ने कहा कि पैसों के बारे में बाद में बातचीत करेंगे क्योंकि उन्हें पैसे की बात करना पसंद नहीं। इस तरह बनी बतौर निर्माता गुलशन राय की पहली फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ (1970) बनी। फिल्म सुपर हिट हुई तो गुलशन राय ने गोल्डी को बुलाया और कहा कि मैं तो तुम्हें फिल्म के मुनाफे में 33 फीसद भागीदारी देने के लिए तैयार था। मगर तुमने ली नहीं। अब बताओ कि मेरी इस फिल्म का निर्देशन करने का तुम कितना पैसा लोगे? गोल्डी गुलशन राय को भी नासिर हुसैन बनते देख रहे थे।

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