cannes film festival 2018: Hindustan and pakistan and manto – कान फिल्म समारोह: हिंदुस्तान और पाकिस्तान और मंटो

71वें कान फिल्म समारोह के अनसर्टेन रिगार्ड खंड में दिखाई गई नंदिता दास की उर्दू फिल्म मंटो का चौतरफा स्वागत हुआ है। फिल्म के प्रदर्शन के बाद यहां हाउसफुल डेबुसी थियेटर में दर्शकों ने खड़े होकर नंदिता दास और उनकी टीम का अभिनंदन किया। मंटो का मुख्य किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाया है। उर्दू के नामवर लेखक सआदत हसन मंटो (1912-1955) के जीवन के अंतिम सात-आठ सालों की घटनाओं और उनकी पांच बहुचर्चित कहानियों को फिल्म का आधार बनाया गया है।

उनकी कहानी दस रुपए से फिल्म शुरू होती है जिसमें एक कमसिन पार्टटाइम वेश्या सरिता अंत में अपने तीन अमीर ग्राहकों के साथ पूरा दिन बिताने के बाद उनके दस रुपए लौटा देती है और कहती है कि जब कोई काम ही नही हुआ तो पैसे किस बात के लूं। यह 1946 का बंबई है जहां मंटो बांबे टाकीज में फिल्में लिखने का काम करते हैं । जहां अशोक कुमार और के आसिफ हैं तो इस्मत चुगताई, रजिंदर सिंह बेदी , ख्वाजा अहमद अब्बास और प्रगतिशील लेखक संघ के दूसरे लेखक हैं । देश आजाद हो रहा है और चारों ओर हिंदू-मुसलिम दंगे हो रहे हैं। मंटो के सबसे करीबी दोस्त और तब के सुपर स्टार श्याम (श्याम सुंदर चड्ढा) को खबर मिलती है कि रावलपिंडी में उनके चाचा दंगों मे मारे गए हैं ।

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गुस्से में वे मंटो से कहते हैं कि सारे मुसलमानों को मार डालना चाहिए । मंटो पूछते हैं कि क्या मुझे भी मार डालोगे? श्याम कहते है कि हां… यही वह घटना है जब पहली बार उन्हें लगता है कि वे इंसान नहीं मुसलमान हैं। वे कहते है कि जब मजहब दिल से उतरकर सिर पर चढ़ जाए तो टोपियां भी हिंदू-मुसलमान हो जाती हैं। मंटो और श्याम की दोस्ती एक मिसाल मानी जाती है। जब वे पाकिस्तान जाने का फैसला करते हैं तो बांबे पोर्ट पर श्याम ही उन्हें विदा करने आते हैं । रास्ते में अपने पसंदीदा पानवाले की दुकान से गुजारते हुए वे कहते हैं- मैं चाहता हूं कि जिंदगी भर इस शहर का कर्जदार रहूं । पानवाले का एक रुपया बकाया था। दोनो शराब का घूंट लेकर हिप्पतुल्ला कहते हुए विदा लेते हैं।

बाद की फिल्म लाहौर में मंटो की कहानी ठंडा गोश्त पर चले अश्लीलता के मुकदमे की कहानी है। कोर्ट में गवाही देते हुए फैज अहमद फैज कहते हैं कि यह कहानी साहित्य के मानदंडों पर खरी नहीं उतरती। मंटो कहते हैं कि अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसलिए कि यह जमाना ही नाकाबिले-बर्दाश्त है। मंटो को तीन सौ रुपए के जुर्माने की सजा होती है। गरीबी, अकेलेपन और लाहौर की तरक्कीपसंद लेखकों की उपेक्षा से मंटो टूट जाते हैं। चौतरफा निराशा और अति शराबखोरी से मात्र 42 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। लाहौर में उन्हे बार-बार अपना बंबई याद आता है। वे कहते भी थे कि अगर बंबई पाकिस्तान जाएगा तभी वे वहां जाएंगे।

फिल्म में मंटो की जिंदगी और उनकी कहानियां ऐसे घुल-मिल गई हैं कि लगता है कि दोनों एक हैं। मसलन, जब अपने परिवार को बचाने के लिए वे लाहौर मेंटल हॉस्पिटल के नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती होते हैं तो उन्हें अपनी प्रसिद्ध कहानी टोबा टेक सिंह सूझती है। फिल्म का अंतिम डायलाग है जिसमे मंटो ठंडी सांस लेते हुए कहते हैं- हिंदुस्तान और पाकिस्तान और मंटो । ‘हजार वाट का बल्ब’ में एक वेश्या अपने दलाल का इसलिए कत्ल कर देती है कि कई रातों से वह उसे सोने नहीं दे रहा था। ‘खोल दो’ में लगातार बलात्कार की शिकार मरणासन्न बेहोश सकीना डॉक्टर के कहने पर कि दरवाजे-खिड़कियां खोल दो, अपने सलवार का नाड़ा खोलकर सलवार नीचे खिसका देती है।

‘ठंडा गोश्त’ में ईशर सिंह दंगों के दौरान एक मुसलिम परिवार के सारे सदस्यों को मारने के बाद जिस लड़की के साथ बलात्कार करता है, वह पहले से ही मरी हुई है। वह नपुंसक बन जाता है। इन पांच कहानियों को प्रतीकात्मक रूप से फिल्म में पिरोया गया है । फिल्म में चालीस और पचास के दशक की बंबई और लाहौर हैं। सेट कलात्मक है और हर समय कोई न कोई बहस चलती रहती है । परेश रावल, ऋषि कपूर और जावेद अख्तर ने मेहमान भूमिकाएं की हैं । संगीत उस्ताद जाकिर हुसैन का है और साउंड डिजाइनर हैं ऑस्कर सम्मान पाने वाले रसूल पोकुटी। मंटो की पत्नी सफिया का किरदार अनूप सिंह की ‘किस्सा’ वाली रशिका दुग्गल ने निभाया है। बाकी छोटी-छोटी भूमिकाओं में तिल्लोतमा शोम, स्वानंद किरकिरे, दिव्या दत्ता, रणवीर शौरी, ताहिर राज भसीन, विनोद नागपाल, राजश्री देशपांडे, इनामुल हक आदि ने अच्छा काम किया है ।

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