on shakeel badayuni birthday stories of shakeel badayuni and naushad friendship – हमारी याद आएगीः ‘दर्द’ से शुरू, ‘संघर्ष’ पर खत्म हुई दोस्ती

शकील बदायूंनी (3 अगस्त, 1916 – 20 अप्रैल 1970)

शकील की पहली फिल्म ‘दर्द’ उमा देवी उर्फ टुन टुन की बतौर गायिका पहली फिल्म थी, जिसका गाना ‘अफसाना लिख रही हूं…’ खूब बजा था। नौशाद-शकील की फिल्म ‘बैजू बावरा’ का बीते कुछ सालों से खूब उदाहरण दिया जाता है कि इसका भजन ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ शकील ने लिखा था, नौशाद ने धुन बनाई थी और मोहम्मद रफी ने गाया था।

मगर ‘बैजू बावरा’ को यहीं तक सीमित कर देना नाइंसाफी है। संगीत प्रेमियों ने पहली बार इसमें दो धुरंधर गायकों उस्ताद आमिर खां और डीवी पलुस्कर (आज गावत मन मेरो झूम के) को सुना था। लोगों को भैरव (मोहे भूल गए सांवरिया), भैरवी (तू गंगा की मौज मैं), मालकौंस (मन तड़पत हरि दर्शन को आज), पीलू (झूले में पवन के आई बहार), दरबारी (ओ दुनिया के रखवाले…) जैसे भारतीय राग-रागनियों पर बनाए गए सुरीले गाने सुनने का मौका मिला था। शकील ने ‘मुगले आजम’ के गाने भी लिखे, जिसमें बड़े गुलाम अली खां ने गाया था। जब लता-रफी एक गाने के तीन-चार सौ रुपए ले रहे थे, तब खां साहब को दस हजार एक गाने के दिए गए थे। यह भी याद आता है कि नौशाद ने किस तरह से ‘मुगले आजम’ के निर्माता के आसिफ के रुपए खिड़की से बाहर उछाल दिए थे क्योंकि वह पैसे के अहंकार के दम पर काम करवाना चाहते थे।

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शकील-नौशाद के साथ दिलीप कुमार जॉनी वाकर ने भी खूब पतंगें उड़ाई। शकील-नौशाद के शिकार के किस्से याद आते हैं और आंखों के सामने नौशाद के घर में मसाला भरकर रखे दो शेर घूमने लगते हैं, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। नौशाद किस तरह से डॉक्टर के कहने पर शिकारी बने थे, यह किस्सा फिर कभी… शकील के बहाने नौशाद के बंगले की छत पर होने वाली गरमागरम बहसें भी याद आ जाती हैं। इसी छत पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक लोक गीत ‘प्रेम किया है कोई चोरी नहीं की…’ से प्रभावित ‘मुगले आजम’ का गाना ‘प्यार किया तो डरना क्या’ तैयार हुआ था, जिसे लता मंगेशकर ने किसी रिकॉर्डिंग रूम के बजाय बाथरूम में गाया था ताकि गूंज पैदा हो सके।

एक वाकया उस दौर का भी है जब एक डॉलर पौने पांच रुपए का हुआ करता था और महबूब खान अपने प्रिय अभिनेता दिलीप कुमार को लेकर ‘मदर इंडिया’ (1957) बनाने जा रहे थे। महबूब खान दिलीप कुमार को नरगिस के बेटे बिरजू की भूमिका देना चाहते थे, जो ‘मेला’ (1948), ‘अंदाज’ (1949), ‘बाबुल’, ‘जोगन’ (1950) जैसी फिल्मो में उनके हीरो रह चुके थे। दिलीप कुमार ने इनकार किया तो महबूब उन्हें डबल रोल देने के लिए तैयार हो गए थे। मगर पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि इस फिल्म के पहले ही महबूब खान और दिलीप कुमार के संबंध इतने बिगड़े कि उन्होंने फिर कभी साथ में काम नहीं किया।

‘मदर इंडिया’ बिना दिलीप कुमार के बनी मगर लोगों के दिमाग पर ऐसी छाई कि रिलीज के 40 साल बाद तक यह फिल्म देश के किसी-न-किसी हिस्से में चलती रही थी। नौशाद लखनऊ के थे और शकील वहां से लगभग पौने तीन सौ किमी दूर बदायूं के। उनकी जोड़ी ने फिल्मों में उत्तर प्रदेश के लोकसंगीत की खुशबू बिखेरी। नौशाद-शकील की आखिरी फिल्म ‘संघर्ष’ दिलीप कुमार वैजयंतीमाला की जोड़ी की भी आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म के बाद दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया। डायबिटीज और टीबी के कारण जब शकील अस्पताल में थे तब नौशाद ने उन्हें तीन फिल्में दस गुने मेहनताने पर दिलवा कर अपना फर्ज अदा किया था। आज न नौशाद हैं, न शकील मगर ‘मुगले आजम’, ‘मदर इंडिया’, ‘गंगा जमुना’, ‘बैजू बावरा’, ‘आन’ जैसी फिल्में उनकी उपस्थिति का एहसास कराती हैं।

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