Prakash Mehra, who is the mainstream Hindi cinema heroism – हमारी याद आएगी : पांच बार घोषित हुई, मगर कभी बनी नहीं ‘कायर’

प्रकाश मेहरा (13 जुलाई,1929-17 मई, 2009): सत्तर के दशक में 70एमएम के परदे पर छाए अमिताभ बच्चन के दो हाथ बन गए थे मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा। बच्चन को लेकर बनी उनकी फिल्में देश के सिनेमाघरों में धूम मचा रही थीं। अमिताभ बच्चन को लेकर ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘शराबी’, ‘नमक हलाल’ जैसी फिल्में बनाने वाले प्रकाश मेहरा और अमिताभ को ही लेकर ‘मर्द’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ बनाने वाले मनमोहन देसाई के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और उनकी टिप्पणियां फिल्मी पत्रिकाओं की सुर्खियां बनती रही हैं। स्थिति यहां तक पहुंची कि ‘मर्द, ‘मर्द’ बनाएगा और शराबी ‘शराबी’ जैसी टिप्पणियां भी हुर्इं। मगर सचाई कुछ और भी थी। जब भी मनमोहन देसाई जुहू के आसपास अपनी फिल्मों की शूटिंग करते थे, दोपहर का खाना प्रकाश मेहरा के घर खाते थे और एक नींद भी वहीं निकालते थे।

मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा वीरता का उपासक रहा है। उसकी ज्यादातर फिल्में नायक प्रधान होती हैं। नायक इंसाफ की लड़ाई लड़ता है, वीर होता है, कायर नहीं। इसीलिए हिंदी सिनेमा के इतिहास में ‘वीर’, ‘वीरता’, ‘बलवान’ से लेकर ‘बाहुबली’ जैसी फिल्में तो मिल जाती हैं, ‘कायर’ नहीं। शूरता की उपासक इंडस्ट्री में कौन बनाएगा कायर पर फिल्म? इसलिए अभी तक इस शीर्षक से कोई हिंदी फिल्म नहीं बनी है। याद आते हैं एक निर्माता-निर्देशक, जिन्होंने ‘कायर’ बनाने की कोशिश की थी। एक बार नहीं पांच बार। अलग-अलग कलाकारों को लेकर घोषणाएं की, मगर पांचों बार विफल रहे। यह निर्माता-निर्देशक थे प्रकाश मेहरा, जिनकी बुधवार को नौवीं पुण्यतिथि थी। ‘कायर’ प्रकाश मेहरा ने सबसे पहले ‘लावारिस’ (1981) की शूटिंग के आखिरी दिन अमिताभ बच्चन को लेकर शुरू की थी। सैनिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली इस फिल्म का पूरा एक सीन प्रकाश मेहरा ने फिल्माया था। फिल्म बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय की अनुमति जरूरी थी। इसमें वक्त लगना था इसलिए प्रकाश ने तुरत-फुरत एक दूसरी फिल्म ‘नमक हलाल’ (1982) अमिताभ बच्चन- शशि कपूर को लेकर शुरू कर दी। मगर ‘कायर’ फिल्माए गए उस एक सीन से आगे नहीं बढ़ी। प्रकाश भी ‘कायर’ को लगभग भूल गए। 1987-88 में प्रकाश को संजय दत्त का काम ‘ईमानदार’ फिल्म में अच्छा लगा, जो उनके सहायक रहे सुशील मलिक ने निर्देशित की थी। लिहाजा प्रकाश ने राजेश खन्ना और संजय दत्त को लेकर ‘कायर’ की घोषणा कर दी। मगर शीर्षक के अलावा इसमें सब कुछ अलग था। गुरु दत्त के सहयोगी लेखक-निर्देशक अबरार अल्वी ने इसकी कहानी लिखी थी। इससे पहले कि फिल्म का काम शुरू हो, वैसी ही कहानी पर दक्षिण की एक फिल्म रिलीज हो गई और ‘कायर’ फिर ठंडे बस्ते में चली गई।

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इसी बीच अक्षय कुमार उभर रहे थे। मेहरा ने उन्हें साइन किया। उनके साथ जीतेंद्र को जोड़ा और ‘कायर’ की घोषणा कर दी। मुंबई के निर्माता अकसर कई सितारों को साइनिंग अमाउंट देकर साइन कर लेते थे। अगर कलाकार चल गया तो फिल्म बनाते थे, वरना साइनिंग अमाउंट चला जाता था, जो थोड़ा-बहुत होता था। मगर अब ‘कायर’ की कहानी बदलती जा रही थी। सिर्फ शीर्षक भर ‘कायर’ था, जो मेहरा को पसंद था। यह फिल्म भी लटकी मगर ‘कायर’ शीर्षक प्रकाश मेहरा के दिमाग से नहीं निकला। 1996 में मेहरा ने अपने मित्र राज कुमार के बेटे पुरु राजकुमार को ‘कायर’ बनाया। बावजूद उन कच्चे-सच्चे किस्से कहानियों के कि राजकुमार ने ‘जंजीर’ में यह कह कर काम करने से इनकार कर दिया था कि निर्माता मेहरा के सिर से चमेली के तेल की बू आती है। हकीकत में तारीखों की समस्या इसका कारण थी। दोनों के बीच मित्रता (1987 में मेहरा ने राजकुमार को लेकर ‘मुकद्दर का फैसला’ बनाई थी) के कारण ही प्रकाश मेहरा ने उनके बेटे पुरु को फिल्मों में मौका दिया और ‘कायर’ की घोषणा की मगर इस फिल्म का शीर्षक भी अंत में उन्हें ‘बाल ब्रह्मचारी’ करना पड़ा। पांचवीं बार मेहरा ने एक बार फिर ‘कायर’ की घोषणा की अपनी ‘मुकद्दर का सिकंदर’ की उमराव जान रेखा के साथ नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी को लेकर। मगर यह संयोग ही था कि इस बार भी ‘कायर’ शीर्षक हाशिये पर चला गया और हैरी बावेजा से निर्देशित करवाई निर्माता प्रकाश मेहरा की यह फिल्म 2001 में ‘मुझे मेरी बीवी से बचाओ’ शीर्षक से रिलीज हुई।

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