What is the basic difference between the first two races of the film ‘Race’ 3 – इस ‘रेस’ के क्या मायने

फिल्म ‘रेस’ के तीसरे संस्करण में पहले दो रेस से क्या बुनियादी फर्क है? इतना ही है कि पहली दो रेस के निर्देशक अब्बास-मस्तान की जगह रेमो डिसूजा ने ले ली और शातिर केंद्रीय पात्र की भूमिका सैफ अली खान से सलमान खान ने झटक ली। रेस सीक्वल फिल्मों की महज एक कड़ी है। हाल-फिलहाल की बातें करें तो रॉक आन, फोर्स, कहानी, बाहुबली आदि आधा दर्जन से ज्यादा फिल्मों के दूसरे संस्करण आ चुके हैं। चार राज और चार गोलमाल आ चुकी हैं। पांचवी पर काम हो रहा है। रेस की तर्ज पर डॉन-3 और दबंग-3 की रूपरेखा बन रही है। कुछ में पिछली फिल्मों से कहानी का सूत्र जोड़ा गया है तो कुछ में पुराने नाम के साथ नई कहानी को चस्पा किया गया है। सीक्वल यानी एक फिल्म के मुख्य पात्रों और मूल कहानी से जुड़ी कई कड़ियां बनाने की हॉलीवुड की अवधारणा को मुंबइया फिल्मकारों ने अपनी सुविधा के मुताबिक तोड़-मरोड़ दिया है। यही वजह है कि सिर्फ शीर्षक दोहरा कर फिल्मों के कथित सीक्वल बनाना मजाक सा बन गया है।

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समस्या दो तरह की है भी। एक तो फिल्म के लिए उपयुक्त शीर्षक आसानी से मिलते नहीं। दूसरा विषय का अभाव। ऐसे में अगर किसी फिल्म में आजमाया गया फार्मूला सफल हो जाता है तो कहानी व पात्रों में फेरबदल के साथ उसी शीर्षक के संग फार्मूले को निचोड़ना ज्यादा सुविधाजनक हो जाता है। कुछ फिल्मकार यह कोशिश जरूर करते हैं कि एक ही शीर्षक पर बनी फिल्मों में कहानी के तार एक दूसरे से भले ही न जुड़ें, मुख्य पात्र वही रहें। रोहित शेट्टी की हर गोलमाल में अजय देवगन अनिवार्य रूप से रहे तो हेराफेरी या हाउस फुल की तीनों कड़ियों में अक्षय कुमार नजर आए। दोनों डॉन में शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा और बमन ईरानी को जगह मिली लेकिन दूसरी डॉन पहली फिल्म का विस्तार थी। राकेश रोशन ने भी यह सिलसिला अपनाए रखा हालांकि पहले उनकी योजना कृश बनाने की नहीं थी। कोई मिल गया में एलियन (किसी अन्य ग्रह से आया व्यक्ति) के संपर्क में आने से मंदबुद्धि नायक में आए चमत्कारिक बदलाव को पसंद कर लिया गया तो उसकी कहानी को विस्तार देकर उन्होंने दो कृश बना डालीं।

हिंदी फिल्मों में सीक्वल का प्रयोग सबसे पहले हरमेश मल्होत्रा ने किया था। नब्वे के दशक में उन्होंने इच्छाधारी नागिन के इंसान से प्रेम की कहानी पर नगीना बनाई। फिर उन्होंने नगीना की कहानी को निगाहे में आगे बढ़ाया। श्रीदेवी पुराने रूप में रहीं। ऋषि कपूर की जगह सनी देओल प्रेमी बन गए। निर्देशन से नाता तोड़ने के बाद अपने भाई मुकेश भट्ट के साथ मिलकर महेश भट्ट ने फिल्म बनाने का कारखाना खोल लिया। सेक्स को प्रधानता देकर उन्होंने राज व मर्डर जैसी फिल्में बनाईं राज पारलौकिक शक्तियों पर केंद्रित थी तो मर्डर में अवैध संबंधों पर जोर दिया गया। दोनों ही फिल्में चल गईं तो उन्हीं विषयों को निचोड़ कर उसी शीर्षक से कई फिल्में बना डालीं। प्रेम में धोखा खाने के बाद नायिका के हिंसक प्रतिशोध पर उतर आने का फार्मूला हेट स्टोरी में हिट क्या हुआ कि उसे उसी शीर्षक की और तीन फिल्मों में दोहरा दिया गया। नाम बदलने का जोखिम नहीं उठाया गया। पहली फिल्म की लोकप्रियता का फायदा बाद की फिल्मों में उठाने के लिए ऐसा किया गया। 1920 भी इसीलिए दो बार बनी। बाल ठाकरे के जीवन से प्रभावित होकर राम गोपाल वर्मा ने सरकार बनाई। फिल्म सफल हो गई तो उसका सीक्वल बन गया। यह सही मायने में सीक्वल था क्योंकि पहली फिल्म की कहानी को दूसरी में आगे बढ़ाया गया था। दूसरा भी हिट हो गया तो तीसरी सरकार बनाने का मोह भला कैसे छूटता? यह जरूर है कि तीसरी कोशिश बेकार हो गई। एक था टाइगर का विस्तार टाइगर जिंदा है सफल रहा है तो जाहिर है तीसरी बार टाइगर आाने की गुंजाइश बढ़ गई है।

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