When the musician Naushad did the lion’s prey – हमारी याद आएगी – नौशाद: एक संगीतकार का शिकारी बनना

कल, 5 मई को संगीतकार नौशाद की 13वीं पुण्यतिथि है। उनसे जुड़ा 1952 का एक किस्सा है। फिल्मकार महबूब खान और संगीतकार नौशाद लंदन में फिल्म ‘आन’ (प्रदर्शन 4 जुलाई, 1952) के संपादन और उसे रंगीन बनाने के काम में लगे थे। मुंबई से उन्हें लगातार फोन आ रहे थे कि यहां सिनेमाघरों के सामने लोग खटिया बिछा कर पहले टिकट खरीदने का इंतजार कर रहे हैं कि कब देश की पहली ईस्टमैन कलर फिल्म प्रदर्शित हो। लंदन की एक इमारत के बेसमेंट में नौशाद और महबूब खान संपादन के दौरान खूब तकरारें भी कर रहे थे। ‘आन’ नौशाद की महबूब खान के साथ पांचवीं फिल्म थी। यह 16 एमएम में गेवा कलर में फिल्माई गई थी और लंदन में इसे 35 एमएम में बड़ा करने के साथ ही ईस्टमैन कलर में तैयार करने का काम चल रहा था। फिल्म में पहली बार सौ वादकों का आर्केस्ट्रा इस्तेमाल करने वाले नौशाद का मानसिक संतुलन काम की आपाधापी में बिगड़ने लगा था। वह बीमार पड़ गए और लंदन में ‘आन’ के प्रीमियर से पहले मुंबई आ गए।

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भारत आकर हालात और बिगड़ गए। नौशाद पागलों जैसी हरकतें करने लगे। बादल गरजते, तो वह पलंग या टेबल के नीचे छुप जाते थे। अपने गाने बजने पर वह घर वालों से पूछते थे कि यह किसका गाना बज रहा है। निर्माता उन्हें साइन करने आते, तो वह अंदर छुप जाते थे और कहते थे कि वे उन्हें मारने आए हैं। परिवार वाले परेशान हो गए। डॉक्टर, वैद्य, हकीम बदलते जा रहे थे और मर्ज बढ़ता जा रहा था। डॉक्टरों ने उन्हें सलाह दी कि वे कुछ दिन फिल्मजगत से दूर हो जाएं। उनका मानना था कि लगातार शारीरिक मेहनत से उनकी नस-नाड़ियां कमजोर पड़ गई हैं इसलिए कुछ रोमांच का, साहस का, मेहनत का काम करें। मछली पकड़ें, शिकार खेलें या ऐसा ही कुछ करें।

सलाह के मद्देनजर और फिल्मजगत को यह बात पता न चले इसलिए नौशाद ने पंचगनी में एक बंगला किराए पर ले लिया। वहीं रहकर असंतुलित मानसिक स्थिति में ही उन्होंने ‘बैजू बावरा’ (प्रदर्शन 5 अक्तूबर 1952) का मशहूर भजन ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज…’ की धुन तैयार की। ‘शबाब’ (1954) और ‘उड़नखटोला’ (1955) की कहानियां लिखीं। इस दौरान जब भी बादल गरजे, बिजली चमके, डर के मारे नौशाद की हालत दीवानों की तरह हो जाती थी।

डॉक्टरों के कहने पर आखिर नौशाद ने शिकार पर जाना तय किया। पहले छर्रे वाली बंदूक चलानी सीखी। फिर 12 बोर की बंदूक से निशाना लगाना सीखा। इस दौरान उन्हें पीछे से एक आदमी पकड़े रहता था। शिकार पर उनके साथ जाने के लिए जो टीम बनी थी उसमें कोई दर्जी था, कोई लोहार था, कोई घड़ीसाज था। एक पुलिस कमीश्नर सरफराज अहमद पठान भी इस टीम में थे, जो हर शनिवार को नौशाद के साथ रहती थी। इस टीम ने महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश (खंडवा) के जंगलों की खूब खाक छानी। टीम ने जंगल में शिकार के लिए मचान बनाई। उस पर नौशाद बैठे।

रात में शेर का इंतजार हो रहा था। अचानक बिजली चमकने लगी। बादल गरजने लगे। बरसात शुरू हो गई। डर के मारे नौशाद की घिग्गी बंध गई।सरफराज ने उन्हें हिम्मत दिलाते रहे। तड़के नीम अंधेरे शेर आया, तो अहमद ने उन्हें फायर करने के लिए कहा, मगर नौशाद के हाथ कांप रहे थे। हिम्मत करके उन्होंने गोली दाग दी। सुबह उजाला होने के बाद लोग आए और उन्होंने देखा कि शेर मचान से कुछ दूर पर मरा हुआ पड़ा है। इस घटना के बाद नौशाद का दीवानापन और डर खत्म हो गया। मगर इस दीवानेपन में ‘मन तड़पत हरि दर्शन को…’ जैसा अद्भुत भजन सिनेमा प्रेमियों को सुनने को मिला। बकौल नौशाद ‘उस दौर में मुझे पता नहीं था कि मुझसे यह सब काम कौन करवा रहा है…’

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