अरुंधति रॉय बोलीं- जब भी लिखो तो सुसाइड बॉम्बर की तरह, जिसकी गूंज देर तक सुनाई दे – Arundhati Roy Says That Write Like A Suicide Bomber, Whose Echo Heard for A Long Time

बुकर पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखिका अरुंधति रॉय ने लंबी खामोशी के बाद जब लेखकों और पाठकों से रूबरू हुईं, तो कहा, “जब भी लिखो तो सुसाइड बॉम्बर की तरह, जिसकी गूंज देर तक सुनाई दे।” उन्होंने कहा, “आप बचो या न बचो, लेकिन आपकी बातें जनमानस को मथती रहें। सोचने को विवश करती रहें।” राजकमल प्रकाशन ने 28 फरवरी की शाम अपना 69वां स्थापना दिवस निराले अंदाज में मनाया, जिसमें अरुंधति रॉय (उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए 1997 में बुकर पुरस्कार से सम्मानित) ने खुलकर अपनी बातें रखीं। ‘वक्त की आहट’ विषय पर बेबाक वार्ता नई दिल्ली के हैबिटेट सेंटर में हुई। अपनी बातें हिंदी में शुरू करते हुए अरुंधति ने स्पष्ट कहा कि वह बोलने और लिखने के लिए सबसे ज्यादा इंग्लिश में सहज हैं। लेकिन हिंदी समझती हैं, इसलिए हिंदी की किताबें पढ़ती भी हैं।

उन्होंने कहा, “अगर मैं हिंदी में बात करूंगी तो सही तरीके से अपनी बात नहीं रख पाऊंगी। मैं कभी भी वैसी लेखक नहीं रही, जो अपनी पहली किताब सफल होने पर, दूसरी किताब लिखने के बारे में सोचते हैं। मेरी हर अगली किताब आसपास से जुड़े अनुभवों से बनती है।” अरुंधति ने कहा, “20 साल तक अपनी दुनिया में जीते हुए और निबंध इत्यादि लिखते हुए मैं अनुभवों को जोड़ रही थी। मेरी पहली किताब परिवार के बारे में थी, भले ही टूटा हुआ सही, लेकिन उसने आपको एक परिवार का अहसास कराया। लेकिन नई किताब में उसका उल्टा है… ये उन लोगों के बारे में है, जिनका दिल टूट गया है, बेघर हैं, लेकिन शाब्दिक अर्थों में नहीं।” उन्होंने समझाया कि कैसे एक कहानी का ढांचा खुद कहानी जितना ही जरूरी होता है और कैसे वह एक दुनिया बनाकर अपने पाठकों के सामने उसे प्रस्तुत करती हैं।

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अरुंधति ने कहा, “ये ऐसी किताब नहीं है, जिसे आप दस मिनट में समझकर दूसरों को बता सकते हैं… इसके लिए आपको खुद को किताब में खोना पड़ेगा और फिर खुद ही रास्ता खोजना होगा।” उन्होंने कहा कि वह कभी अपने लिखे पर सफाई नहीं देतीं। उनकी टिप्पणी ‘आप जब भी लिखो, तो एक सुसाइड बॉम्बर की तरह लिखो’ पर उन्हें खूब तालियां मिलीं। अरुंधती ने कहा कि वह अपने उपन्यासों का बचाव नहीं करतीं, लेकिन अपने कथेतर के लिए खूब बहस करती हैं। अपनी रची कहानियों के बारे में उन्होंने कहा कि कुछ सच ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ कहानी में ही कही जा सकती है और कहानी उतनी ही सच होती है, जितनी कोई धुन… जहां आप भावनाओं से खेल रहे होते हैं। लेखक उसमें सच का दावा नहीं कर सकता, लेकिन पाठक उस सच को समझ लेता है।

राजकमल प्रकाशन समूह अरुंधति रॉय की पांच किताबों का अनुवाद हिंदी में प्रकाशित कर चुका है और उनकी हालिया प्रकाशित किताब ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ के भी हिंदी और उर्दू संस्करण अपने 70वें साल में प्रकाशित करने वाला है। प्रोफेसर व अनुवादक अलोक राय ने अरुंधति की पहले उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ से लेकर उनके अब तक के काम पर रोशनी डाली। इस अवसर पर राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी ने राजकमल के संस्थापक प्रकाशक ओम प्रकाश को याद किया, जिन्होंने हिंदी प्रकाशन को एक आधुनिक अंदाज में ढाला। राजकमल के अविस्मरणीय स्तंभ रहीं शीला संधु भी याद की गईं। अशोक माहेश्वरी ने कहा, “मैं गर्व से कहता हूं कि पिछले पांच सालों से ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित होने वाले बांग्ला, मराठी, गुजराती और हिंदी के लेखक राजकमल के ही हैं।”

माहेश्वरी ने दो नए पुरस्कारों की घोषणा भी की। एक पुरस्कार हर साल भारतीय भाषाओं में काम करने वाले किसी एक सर्वश्रेष्ठ स्वतंत्र प्रकाशक को दिया जाएगा और दूसरा बेस्ट बुक सेलर को दिया जाएगा। राजकमल प्रकाशन के संपादक व निदेशक सत्यानंद सिंह निरुपम ने कुछ नई योजनाओं की घोषणा की। पत्रिका ‘आलोचना’ का नया संपादक मंडल घोषित किया गया, जिसमें आशुतोष कुमार और संजीव कुमार को शामिल किया गया। राजकमल प्रकाशन का इतिहास लिखने की अहम जिम्मेदारी मोहन गुप्त को सौंपी गई और यह घोषणा भी की गई कि इस साल से मैथिली, उर्दू और भोजपुरी में भी किताबें प्रकाशित की जाएंगी। साथ ही महत्वपूर्ण श्रृंखला ‘प्रतिनिधि शायरी’ भी पाठकों के लिए लाई जाएगी। इस मौके पर उपेंद्र झा और मुकेश कुमार को ‘पाठक-मित्र सम्मान’ भी दिया गया।

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