हिंदी न्यूज़ – Opinion: ‘मुस्लिमों की पार्टी’ बताकर पीएम मोदी ने खड़ी की कांग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत

(भवदीप कांग)
‘कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है…’ हाल के दिनों यह लाइन खूब सुर्खियों में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजमगढ़ की रैली में जब यह बात कही तो कांग्रेस की तरफ से तुरंत ही प्रतिक्रिया आई. कुछ कांग्रेसी नेताओं ने इसे ‘घटिया कदम’ बताया, कुछ इसे आने वाले चुनावों को सांप्रदायिक रंग देने की खतरनाक कोशिश करार दे रहे हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसे बेहद चालाकी भरा सियासी कदम मान रहे हैं, जिसने कांग्रेस को खासी मुश्किल में डाल दिया.

यह टिप्पणी रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जा रही है, वर्ना पीएम मोदी इस पर अपना जरा भी वक्त ज़ाया नहीं करते. कांग्रेस के लिए इस तरह के प्रोपेगेंडा लंबे वक्त से सिरदर्द बने हुए हैं. कांग्रेस हाल के दिनों में अपनी मध्यमार्गी रणनीति को थोड़ा किनारे करते हुए प्रगतिशील लेफ्ट की तरफ झुकती दिखी है. हालांकि पार्टी इससे अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने में उस तरफ सफल भी नहीं हो पाई और उस पर मुस्लिमों को तरजीह देने के आरोप लगने लगे.

ये भी पढ़ें- कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी कहने पर अखिलेश ने पीएम मोदी को दिया ये जवाबऐसा कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की बातों को यहां तोड़ मरोड़कर पेश किया गया. सूत्रों के मुताबिक, राहुल ने पिछले दिनों मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात के दौरान कहा था कि कांग्रेस मुस्लिमों के साथ खड़ी है, क्योंकि वह कमजोर हैं और उनकी पार्टी हमेशा ही समाज के कमजोर तबके के साथ खड़ी रही है.

इससे पहले इस साल की शुरुआत में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि बीजेपी लोगों को यह समझाने में सफल रही है कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है.

पीएम मोदी ने आजमगढ़ रैली के अपने भाषण में कहा था, ‘कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है, मुझे इससे कोई हैरानी नहीं हुई. मैं तो बस यह पूछना चाहता हूं कि क्या उनकी पार्टी बस मुस्लिम पुरुषों की है या फिर मुस्लिम औरतों की भी?’ पीएम मोदी के इस बयान से यही अर्थ निकला कि कांग्रेस अल्पसंख्यक समर्थक और महिला विरोधी पार्टी है और इससे बीजेपी को हिन्दू समर्थक, महिला हितैषी का जामा पहना दिया गया.

आजमगढ़ की रैली में पीएम मोदी की ये टिप्पणी ‘ट्रिपल तलाक बिल’ को लेकर थी. कांग्रेस इस विधेयक को राज्यसभा की प्रवर समिति में भेजने की मांग कर रही थी. वहीं बीजेपी ने कांग्रेस पर कठमुल्लों के दवाब में झुकते हुए इस बिल पर रोड़े अटकाने का आरोप लगाया. बीजेपी इस दौरान शाह बानो केस का भी जिक्र जोरशोर से उछालती रही है. यह मामला लंबे वक्त से कांग्रेस के गले की फांस बन रहा है, जहां पार्टी ने संसद में हासिल भारी बहुमत के सहारे उस मुस्लिम महिला के हित में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था.

पीएम मोदी का सीधे राहुल गांधी पर हमला था. इस दौरान एक पुरानी कहावत याद दिलाई जा रही है- ‘बापे पूत परापत घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा.’ कहा जा रहा है कि पिता ने शाह बानो मामले में फैसला पलटा और अब बेटा ट्रिपल तलाक के खिलाफ उठाए जा कदमों में रोड़े अटका रहा है.

कांग्रेस को भी यह पूरी तरह पता है कि उसे अल्पसंख्यक हितैषी पार्टी का तमगा देकर ही बीजेपी फायदा उठाती है. वहीं कांग्रेस पूरे भारत में फैलाव वाली  पार्टी रही है, जिसमें सभी वर्ग, समूह और विचारधाराओं के लोग जुड़े रहे हैं. हालांकि मंडल और कमंडल की राजनीति ने कई नए चेहरों को उभारा. इससे बीजेपी जहां बड़ी संख्या में हिन्दू वोटरों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रही, वहीं कांग्रेस के पाले से दलित, मुस्लिमों और ओबीसी वोट छिटकते चले गए.

कांग्रेस ने इस बीच अल्पसंख्यकों को रिझाने की भरसक कोशिश की, लेकिन इससे उसे फायदा कम नुकसान ज्यादा हो गया. पार्टी इससे मुस्लिमों का खोया जनाधार तो हासिल नहीं कर सकी, साथ ही उसके सेक्यूलर चेहरे पर बट्टा भी लग गया. लोकसभा चुनावों के बाद एके एंटनी की रिपोर्ट में भी इस ओर खास तौर से इशारा किया गया था, हालांकि कांग्रेस के एक धड़े का कहना है कि यह रिपोर्ट पर केरल पर ही लागू होती है, देश के बाकी हिस्सों पर नहीं.

कांग्रेस के लिए एक बड़ी मुसीबत यह है कि पार्टी वोटरों के साथ खुद को जोड़ने की ही संघर्ष कर रही है. हल्के वाम झुकाव से मध्यमार्गी रणनीति पर वापसी ने उसे लेकर उलझन ही बढ़ाई है. कांग्रेस की तरफ से जब राहुल गांधी को शिव भक्त और जनेऊधारी ब्राह्मण की तरह पेश किया गया, तो पार्टी के वाम उदारवादी समर्थन उखड़ गए. हालांकि सोनिया गांधी ने दबे लफ्ज़ों में यह स्वीकार भी किया था कि गुजरात में राहुल का ‘टेंपल रन’ एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था.

भारत की आबादी में अल्पसंख्यकों का पांचवां हिस्सा है और कई जगहों पर चुनावी नतीजे तय करने में उनकी अहम भूमिका रहती है (हालांकि 2014 के चुनाव में मोदी लहर के आगे यह फैक्टर फीका साबित हुआ). देश की मुस्लिम आबादी कांग्रेस पर तभी दोबारा भरोसा करेगी जब उसे पार्टी की धर्मनिरपेक्षता पर यकीन हो. हालांकि इस बीच कांग्रेस को अपने तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी शांत बनाए रखना होगा, क्योंकि उनके बयानों से बीजेपी की प्रोपेगेंडा मशीन को ही ईंधन मिलता है और कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी होती है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

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