हिंदी न्यूज़ – आतंकवाद से जीतना है तो लड़ाई का नजरिया बदलना होगा: लेफ्टिनेंट डीएस हूडा-War on Terror Pit Islam Against Rest of the World. It’s Time to Battle This Narrative, Writes Lt Gen DS Hooda

15 जुलाई को अफगानिस्तान में यूनाइटेड नेशन असिस्टेंस मिशन (यूएनएएमए) ने अफगानिस्तान में हुई जनहानि पर अपनी मिड-ईयर रिपोर्ट जारी की. यूएनएएमए की रिपोर्ट के अनुसार 1 जनवरी 2018 से 30 जून तक अफगानिस्तान में 1692 नागरिक मारे गए हैं जबकि 3430 घायल हुए हैं.

रिपोर्ट की पहली लाइन में कहा गया है, “पिछले साल की तरह इस साल के पहले छह महीनों में भी नागरिकों के जीवन और आजीविका को नष्ट करने वाला सशस्त्र सघर्ष जारी रहा.”

13 जुलाई को पड़ोसी देश पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान में चुनावी रैली के दौरान एक विस्फोट हुआ जिसमें 130 लोग मारे गए और 200 घायल हो गए. आईएसआईएस ने इस विस्फोट की जिम्मेदारी ली है.

दक्षिण एशिया आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित है. आंतकवाद पर यूएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में 104 देशों पर 11000 आतंकवादी हमले हुए. हालांकि इनमें से 55 प्रतिशत हमले 5 देशों (ईरान, अफगानिस्तान, भारत, पाकिस्तान और फिलिपींस) पर हुए जिनमें से तीन दक्षिण एशिया में हैं.आतंकवाद कोई नई घटना नहीं है. डेविड रेपोपोर्ट ने आधुनिक आतंकवाद के चार चरण बताए हैं. पहला अराजकतावादी चरण जो कि 1870 के दौरान रूस में पैदा हुआ. पहले विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवाद के विरुद्ध आतंकवाद के दूसरे चरण की शुरुआत हुई और अधिकतर उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के साथ ही यह चरण समाप्त हो गया.

तीसरा चरण लेफ्ट का चरण था जिनके हीरो चे ग्वेरा और इनके द्वारा तैयार संगठन जैसे पीएलओ, जर्मन रेड आर्मी और शाइनिंग पथ थे. आतंकवाद के चौथ चरण की शुरुआत ईरान की क्रांति से होती है जिसे धार्मिक चरण कहते हैं.

आतंकवाद का यह चरण सबसे विनाशकारी और टिकाऊ रहा. जबकि यह अमेरिका के ग्लोबल वॉर ऑन टेरर (जीडब्ल्यूओटी) से पहले का है, यह इससे काफी प्रभावित हुआ है. कई मायनों में जीडब्ल्यूओटी ने आतंकवाद के वर्तमान चरण को को बनाए रखने में मदद की और इसे और अधिक हिंसक बनाया. 2001 के बाद स्थिति तेजी से बिगड़ गई.

ये भी पढ़ें: पाकिस्तानी अखबारों ने सरकार द्वारा आतंकवाद को कुचलने के दावे को बताया झूठ

लेकिन अगर इससे कोई सबसे ज्यादा पीड़ित हुआ तो वो नागरिक हैं. आतंकवाद के खिलाफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे गए नगारिकों की मौत की स्पष्ट संख्या का तो पता नहीं लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यह संख्या एक मिलियन हो सकती है. लड़ाई के परिणामस्वरुण 10 मिलियन से अधिक नागरिक विस्थापित हुए हैं.

हमें इस वैश्विक युद्ध में विजय प्राप्त क्यों नहीं हो पा रही?  पहला कारण है उद्देश्य का स्पष्ट न होना. अमेरिका जीडब्ल्यूओटी का नेतृत्व कर रहा है, लेकिन उसके पास कोई निश्चित रणनीतिक दृष्टि नहीं है. आतंकवाद को हराने की रणनीति अब शासन बदलने की रणनीति में बदल गई है जिसके लिए कुछ चुनिंदा आतंकवादी संगठनों को निशाना बनाया जाता है.

9/11 के बाद राष्ट्रपति जॉर्ज बुस ने वैश्विक पहुंच के आतंकवादी संगठनों को नष्ट करने के बारे में बात की. वहीं ट्रंप की सुरक्षा नीति के बारे में बात करते हुए रक्षा सचिव मैटिस ने कहा कि महान शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा आतंकवाद नहीं है. अब अमेरिका का सर्वाधिक ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा पर है.

आतंकवाद के संसाधनों के आवंटन में भी काफी असंगतता रही है. 2009 में ओबामा ने अफगानिस्तान में 30 हजार सैनिकों के की वृद्धि की घोषणा की. उसी भाषण में उन्होंने कहा कि हमारे सैनिक 18 महीने बाद वापस आ जाएंगे. इस प्रकार तालिबान को यह स्पष्ट किया गया कि उन्हें बस अमेरिका के सैनिकों के लौटने का इंतजार करना है

ये भी पढ़ें: मैंने ‘हिंदू आतंकवाद’ कभी नहीं कहा ‘संघ आतंकवाद’ कहा : दिग्विजय सिंह

कुछ समय में आतंकवाद से लड़ने के लिए नैतिक ढांचे को और कमजोर कर दिया गया और भू-राजनीति और राष्ट्रीय हित प्रमुख कारक बन गए. 2003 में इराक में अमेरिका के प्रवेश की वजह से मिडिल ईस्ट में अस्थिरता आई और इसकी वजह से आईएसआईएस का जन्म हुआ.

सीरिया में रूस और अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ कम लड़ रहे हैं और क्षेत्र में खुद को स्थापित करने के लिए अधिक जोर लगा रहे हैं. इस प्रकिया में उन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से विभिन्न आतंकवादी समूहों की मदद की है.

यमन में सऊदी अरब का हस्तक्षेप बड़े शिया-सुन्नी संघर्ष की एक अभिव्यक्ति है. नागरिकों पर किए गए अत्याचारों के अतिरिक्त इस संघर्ष ने यमन में अलकायदा को मजबूत किया है.

इस माहौल में  वैश्विक आतंक से लड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहमति हो सकती है? इसके लिए एकमात्र संगठन जिसे हम देख सकते हैं वह संयुक्त राष्ट्र है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र को बुरी तरह काट दिया गया है. अमेरिका और ब्रिटेन ने 2003 में सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना इराक पर आक्रमण करके अंतर्राष्ट्रीय संस्था के रूप में  संयुक्त राष्ट्र को कमजोर कर दिया.

2011 में संयुक्त राष्ट्र ने नागरिकों की रक्षा के लिए लीबिया में नाटो के नेतृत्व वाले मिशन को मंजूरी दी. परिणास्वरुप गद्दाफी की सत्ता छिन गई और उसे मौत के घाट उतार दिया गया लेकिन इसकी वजह से पूरा लीबिया अराजकता में घिर गया. लीबिया मे जो हुआ उसकी वजह से संयुक्त राष्ट्र ने सीरिया में दखल देने से इनकार कर दिया और आज सीरिया की कहानी सबसे अधिक दुखद है, जहां 4 लाख से अधिक मौत हो चुकी हैं.

ये भी पढ़ें: मैंने कभी भी आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दिया: जाकिर नाइक

संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादियों के खिलाफ कोई भी अभियान शुरू करने से इंकार कर दिया है. 2015 और 2018 की अपनी दो रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र साफ कर चुका है कि वह आतंकवादियों के खिलाफ किसी भी अभियान में शामिल नहीं होगा.

क्या यह खतरे का मुकाबला करने का तरीका है? मेरे विचार में जवाब “वैश्विक स्तर पर सोचने और स्थानीय रूप से लड़ने” में निहित है. निश्चित तौर पर आतंकवाद से लड़ने के लिए वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है. ग्लोबलाइजेशन और टेक्नोलॉजी के विकास ने आतंकवाद की काफी मदद की है. सूचना प्रौद्योगिकी की वजह से आतंकवादियों को वैश्विक स्तर पर अपना संगठन चलाने और पूरी दुनिया से आतंकी भर्ती करने में मदद मिली है. वहीं ग्लोबलाइजेशन की वजह से उनका एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना काफी आसान हो गया है.

इसलिए आज आतंकवादी संगठनों की जांच के लिए टेक्नोलॉजी शेयरिंग, आतंकवादियों की फंडिंग रोकने, खूफिया जानकारी एक दूसरे को देने और न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी की सुरक्षा के लिए वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है. लेकिन युद्ध स्थानीय सेनाओं द्वारा ही लड़ा जाना चाहिए.

किसी दूसरे देश में विदेश सैनिकों को भेजना बड़ी समस्या है क्योंकि सैनिक वहां की स्थानीय परिस्थितियों से परिचित नहीं होते हैं जिससे की स्थिति बिगड़ जाती है. 2001 में जब अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान पहुंचे तो तालिबान से परेशान जनता ने उनका स्वागत किया लेकिन सैनिकों को स्थानीय परिस्थितियों का पता न होने और उनके अंधाधुंध इस्तेमाल ने जल्द ही स्थानीय लोगों को अमेरिकियों के खिलाफ खड़ा कर दिया.

इसके साथ ही इस बात पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है कि आतंकवाद क्यों फल-फूल रहा है? ये कारण सामाजिक, आर्थिक, जातीय या मनोवैज्ञानिक हो सकते हैं और इनका समाधान एक आकार में फिट नहीं हो सकता है.

उत्तर केवल स्थानीय स्तर पर ही मिल सकते हैं. वैश्वकि शक्तियो को केवल स्थानीय सरकारों पर इन कारणों को हल करने के लिए दबाव डालना चाहिए.

नरेटिव आतंकवाद से लड़ने के लिए मुख्य हथियार है. वैश्विक नरेटिव सरल और भ्रामक भी हो सकता है. जैसे कि आज एक इंप्रेशन बन गया है कि इस्लाम बाकी दुनिया के लिए एक खतरा है.

इसके परिणामस्वरूप सबसे शांतिपूर्ण समाजों में भी कट्टरपंथी की शुरुआत हुई है. ऐसे में अगर आतंकवाद से जीतना है तो स्थानीय नरेटिव पर ध्यान देने की जरूरत है. यह बात जम्मू-कश्मीर पर भी लागू होती है.

ये भी पढें: जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को समाप्त करना एक मात्र लक्ष्य: राजनाथ

9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध शुरू किया गया है. अब इस वाक्य को विराम देने की आवश्यकता है. निश्चित रूप से आतंकवाद से लड़ने के लिए वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता है, लेकिन जमीन और रणनीति स्थानीय होनी चाहिए.

(लेखक भारतीय सेना के उत्तरी कमान के पूर्व चीफ हैं, इनकी ही लीडरशिप में भारतीय सेना ने 2016 में पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं. )

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *