हिंदी न्यूज़ – राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर कितनी गंभीर है कांग्रेस और बीजेपी-How serious is Congress and BJP about women’s involvement in politics

(नीरज कुमार)

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तरफ से प्रधानमंत्री को पत्र और केन्द्र सरकार की तरफ से कांग्रेस को दी गई चुनौती से वर्षों से संसद में लंबित महिला आरक्षण बिल को एक बार फिर सुर्खियां मिली हैं, लेकिन देश की दो बड़ी पार्टियों के संगठन में महिलाओं की स्थिति का आंकड़ा चौंकानेवाला है. दोनों पार्टियों के शीर्ष संगठन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 7 से 12 फीसदी के बीच ही है.

सुर्खियों में महिला आरक्षण बिल

महज चंद दिनों पहले राहुल गांधी ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से महिला आरक्षण बिल को पारित कराने की मांग की तो जवाब में केन्द्र सरकार की तरफ से रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस को महिला आरक्षण बिल समेत देश की आधी आबादी से जुड़े दूसरे बिलों को पारित कराने की भी चुनौती दे डाली. देश की दोनों बड़ी पार्टियां लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण की वकालत करती हैं, लेकिन पार्टी संगठन में महिलाओं की संख्या से महिलाओं को सशक्त करने की इनकी गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है. राहुल गांधी से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी महिला आरक्षण बिल को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा था, लेकिन तब सरकार की तरफ से कांग्रेस को किसी तरह की चुनौती नहीं दी गई थी.ये भी पढ़ें: महिला आरक्षण बिल के बदले तीन तलाक-हलाला पर हमें सपोर्ट करें: राहुल गांधी से सरकार

कांग्रेस संगठन में महिलाओं का संख्याबल

कांग्रेस और बीजेपी भले ही महिला आरक्षण की बात करें लेकिन संगठन की सच्चाई दोनों पार्टियों की पोल खोलती है. कांग्रेस की बात करें तो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में अध्यक्ष से लेकर ज्वाइंट सेक्रेटरी तक कुल 88 पदाधिकारी हैं, लेकिन इनमें महिलाएं सिर्फ 11 हैं यानी 13 फीसदी से भी कम. सबसे चौंकानेवाली बात ये है कि देशभर में कांग्रेस के कुल प्रदेश अध्यक्षों और कार्यकारी अध्यक्षों की संख्या 47 है, लेकिन एक भी महिला कांग्रेस की अध्यक्ष नहीं है. कांग्रेस के 12 महासचिवों में सिर्फ 1 महिला महासचिव है, यानी 10 फीसदी से कम. कुल 13 प्रभारियों में सिर्फ दो महिलाएं प्रभारी हैं, यानी 20 प्रतिशत से कम प्रतिनिधित्व. कांग्रेस की कुल 57 सचिव में सिर्फ 7 महिलाएं हैं, यानी 15 फीसदी से कम प्रतिनिधित्व. एआईसीसी में प्रमुख विभागों और सेल की संख्या 21 है, लेकिन यहां भी महिलाओं की संख्या राजनीति में आनेवाली महिलाओं को उत्साहित नहीं करेगी. 21 विभागों और सेल में कुल सदस्य संख्या 217 है, लेकिन महिलाओं की संख्या सिर्फ 24 है, यानी 10 प्रतिशत से कम. कांग्रेस के अंदर कुल प्रवक्ताओं की संख्या 35 है लेकिन इनमें महिलाएं सिर्फ 5 हैं, यानी 15 प्रतिशत से भी कम. कांग्रेस वर्किंग कमेटी जो की पार्टी की निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी इकाई है, इसकी सदस्य संख्या 51 है, लेकिन सोनिया गांधी समेत महिलाओं की संख्या महज सात है. कांग्रेस के 5 फ्रंटल संगठन हैं, लेकिन राष्ट्रीय महिला कांग्रेस को छोड़कर किसी की अध्यक्ष महिला नहीं है. हर बार और बार-बार महिलाओं की बात करनेवाली पार्टी भागीदारी बढ़ाने की बात तो करती है लेकिन नतीजा सबके सामने है.

बीजेपी संगठन में कहां खड़ी हैं महिलाएं?
देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी पर नजर डाली जाए तो बीजेपी में राष्ट्रीय पदाधिकारियों में अध्यक्ष से लेकर ऑफिस सचिव तक कुल संख्या 48  है, लेकिन महिलाओं की संख्या सिर्फ 5 है, यानी दस फीसदी से भी कम महिलाएं. राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में बीजेपी अध्यक्षों की कुल संख्या 36 है, लेकिन सिर्फ एक महिला अध्यक्ष हैं. बीजेपी में संसदीय बोर्ड फैसला लेनेवाली पार्टी के अंदर की सबसे बड़ी इकाई है जिसमें सदस्य संख्या 11 है, लेकिन यहां सुषमा स्वराज के रूप में सिर्फ एक महिला हैं. बीजेपी के 9 राष्ट्रीय प्रवक्ताओं में सिर्फ एक महिला प्रवक्ता हैं. राज्यों के प्रभारी और सह-प्रभारियों की संख्या 47 है, लेकिन सिर्फ इनमें सिर्फ 3 महिलाएं हैं, यानी 10 फीसदी से भी कम. बीजेपी के 6 उपाध्यक्षों में एक महिला है. बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर पर कुल सात मोर्चे हैं, जिनमें से दो की अध्यक्ष महिला हैं जो कि कुछ बेहतर है.

बीजेपी और कांग्रेस को सीख लेने की ज़रूरत
आंकड़ों से साफ है कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण की बात करनेवाली दोनों पार्टियों को संसद से पहले अपने संगठन में झांकने की जरूरत है. ऐसे में फिलहाल दोनों पार्टियों से यहीं गुजारिश की जा सकती है कि मानसून सत्र में जब महिला आरक्षण बिल का नाम दोनों पार्टियों के नेताओं और प्रवक्ताओं के ज़ुबां पर आए तो संगठन में नेताओं की भागीदारी में महिलाओं का भी नाम आए. इसके अलावा कई पश्चिमी देशों में राजनीतिक पार्टियों के अंदर महिलाओं को आरक्षण का प्रावधान है, जिसका असर वहां की संसद में भी देखा गया है. उम्मीद करते है कि भारत की दो बड़ी पार्टियां इन देशों से सबक लेंगी.

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