हिंदी न्यूज़ – Opinion How Regional Parties’ Lack of Commitment Leaves Congress Hoping for a 2013 Redux to Win in 2019-OPINION: 2019 के रण में कांग्रेस के लिए क्यों ‘कमिटेड’ नहीं हो पा रही क्षेत्रीय पार्टियां

(भवदीप कांग)

‘अविश्वास प्रस्ताव’ पर  संसद में 12 घंटों तक चले बहस के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने विश्वास हासिल कर लिया. लोकसभा में विपक्ष का ‘अविश्वास प्रस्ताव’ गिर गया है. एनडीए सरकार को 325 सांसदों का ट्रस्ट वोट, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के पक्ष में 126 सासंदों ने वोट किए. संसद में ‘अविश्वास प्रस्ताव’ गिरने के साथ ही कांग्रेस का केंद्र से मोदी सरकार को को हटाने का सपना भी टूट गया. वहीं, यह भी साफ हो गया कि 2019 की जंग में क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस पर पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पा रही हैं. सीनियर जर्नलिस्ट भवदीप कांग इस पूरे मामले पर अपना नज़रिया रख रही हैं:-

राजनीति में ‘अविश्वास प्रस्ताव’ हमेशा से ही मनोरंजक रहे हैं. शुक्रवार को लोकसभा में पॉपकॉर्न-ड्रामा हुआ. दोनों पक्षों की ओर से जबरदस्त भाषणबाजी हुई. धारदार भाषणों के साथ मोदी सरकार पर वार करते हुए अचानक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कैमरे के फोकस से बाहर हो जाते हैं. वो अपनी सीट से उठते हैं और सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ बढ़ते हैं. राहुल पीएम को पहले तो उठने के लिए कहते हैं, जब पीएम नहीं उठते, तो खुद उनको गले लगा लेते हैं. बाद में पीएम मोदी राहुल को बुलाकर उनसे हाथ मिलाते हैं और कुछ कहते हैं. ये नज़ारा वैसा ही था, जैसे महाभारतकाल में कुंती पुत्र अर्जुन भीष्म पितामह का आशीर्वाद लेते हैं.

पीएम मोदी के ‘इमोशनल’ कार्ड से चित हुई कांग्रेस!हालांकि, मामले में ट्विस्ट तब आया, जब ‘अविश्वास प्रस्ताव’ पर वोटिंग कराई गई और फाइनल नंबर बताए गए. बीजेपी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को 325 वोट मिले, जबकि विपक्ष के पक्ष में सिर्फ 126 वोट आए. एनडीए ने उम्मीद से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया. वहीं, कांग्रेस का प्रदर्शन उम्मीद से भी खराब रहा. बीजू जनता दल (BJD) और शिवसेना के सांसदों ने वॉकआउट किया. वोटिंग में हिस्सा न लेकर एक तरह से इन दोनों पार्टियों ने एनडीए की मदद की. वहीं, विपक्षी एकता में फूट भी नज़र आई.

अगर कांग्रेस फेंस-सीटर्स के भरोसे जीत की उम्मीद कर रही थी, तो इसमें उसे घोर निराशा हाथ लगी. ऐसा लगता है कि ये सिलसिला 2019 की जंग में भी जारी रहेगा. क्योंकि, हाल के दिनों में कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय पार्टियों में कमिटमेंट इश्यू देखा जा रहा है. क्योंकि, शुक्रवार को कई क्षेत्रीय पार्टियों ने ‘ना-ना’ करते हुए भी एनडीए को वोट किया. ऐसे में 2019 की लड़ाई के लिए कांग्रेस के ‘महागठबंधन’ को वास्तविक रूप लेने में अभी काफी फासला तय करना होगा. कांग्रेस को कई विरोधाभास का भी सामना करना होगा. जैसे कि तेलुगू देशम पार्टी (TDP) सांसद जयदेव गल्ला कहते हैं, ‘यह कांग्रेस ही थी, जिसने आंध्र प्रदेश का ‘एक अवैज्ञानिक तरीके से’ बंटवारा कर दिया था.’ कांग्रेस के लिए टीडीपी की तरह और भी कई विरोधाभास हैं.

कांग्रेस को उम्मीद थी कि एक नए और सुधरे हुए राहुल गांधी की इमेज से वह ये ‘जंग’ जीत लेगी. राहुल गांधी का ये बदला रूप ज्यादातर लोगों को पसंद आ रहा है. नए राहुल गांधी जुझारू हैं, मज़ाकिया हैं और आकर्षक भी. वो अच्छी धार के साथ बोलते हैं. शब्दों पर जहां जरूरत पड़े, वहां जोर देते हैं. आक्रामक तरीके से देखते हैं और कुल मिलाकर खुद को ‘एंग्री यंगमैन’ की तरह दिखाने की कोशिश करते हैं. राहुल गांधी ने नोटबंदी, जीएसी, पूंजीवाद, बेरोजगारी और राफेल डील को लेकर पीएम मोदी पर जुबानी हमले किए. यहां तक तो सब ठीक था.

पीएम मोदी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान विपक्षी एकता में दिखी फूट

चीजें तब बदलने लगी, जब राहुल गांधी ने राफेल डील को लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को निशाने पर ले लिया. कांग्रेस अध्यक्ष ने निर्मला सीतारमण पर राफेल डील को लेकर देश से झूठ बोलने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि इस डील को लेकर भारत-फ्रांस के बीच कोई सीक्रेट पैक्ट नहीं थी. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने खुद ये बात उन्हें बताई है. रक्षामंत्री ने पीएम के इशारे पर देश से झूठ बोला.

राहुल के इस बयान के कुछ देर बाद ही मीडिया में फ्रांस सरकार की प्रतिक्रिया आई. फ्रांस की मैक्रों सरकार ने साफ किया कि भारत-फ्रांस के बीच सीक्रेट पैक्ट है. ऐसे में राफेल डील को लेकर डिटेल सार्वजनिक नहीं की जा सकती है. फ्रांस सरकार के बयान ने कांग्रेस को अजीब स्थिति में डाल दिया. कांग्रेसियों के लिए चीजें साफ थी, या तो उनके अध्यक्ष ने सदन में झूठ बोला या फिर फ्रांस सरकार गलत है. बीजेपी का कहना है कि राहुल गांधी ने सदन में झूठ बोला. इसके लिए बीजेपी राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात भी कह रही है.

बाद में सदन में बोलते हुए पीएम मोदी ने भी राहुल गांधी को आड़े हाथ लिया. मोदी ने कहा कि राहुल ने असल बात को तोड़-मरोड़ कर सदन में रखा और देश की सुरक्षा को लेकर खेल खेलने की कोशिश की, जो कि बेहद बचकाना था.

पीएम मोदी ने राहुल गांधी के पुराने भाषणों को लेकर भी उनपर निशाना साधा. पीएम ने कहा, ‘वो कहते हैं कि पीएम मोदी 15 मिनट तक बोलने के लिए खड़े नहीं हो पाएंगे. लेकिन मैं खड़ा हूं. मैं अच्छे कामों के लिए पिछले चार साल से खड़ा ही हूं.’ इसके बाद पीएम मोदी ने कांग्रेस पर एक के बाद एक कई वार किए. मोदी ने कहा कि इकोनॉमिक फ्रंट पर कांग्रेस एक अक्षम और लापरवाह रही है. उसके शासनकाल में देश की कोई भी विदेश नीति नहीं थी. विकास का कोई भी काम नहीं था. सिर्फ घमंड चरमसीमा पर था.

यहां तक की RaGa-NaMo hug यानी सदन में राहुल गांधी का पीएम मोदी को झप्पी देना और बाद में अपनी सीट पर बैठकर किसी को आंख मारना भी चर्चा में रहा. इस बर्ताव के लिए लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने राहुल गांधी को हिदायद भी दी.

मोदी ने यह भी कहा, ‘यूपीए चेयरपर्सन मैडम सोनिया गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव को लेकर भरोसा दिखाया था. वोटिंग नंबर को लेकर उन्होंने कहा था कि कौन कहता है कि कांग्रेस के पास नंबर नहीं है? लेकिन हुआ क्या, हमारे पास 272 का समर्थन था. हमें 325 विश्वास मत मिले. अगर कांग्रेस की तैयारी पूरी नहीं थी, तो अविश्वास प्रस्ताव ही क्यों लेकर आए?’

राजनीतिक विचारक हैरान है कि आखिर विपक्ष ने पीएम मोदी को आम चुनाव के पहले विश्वास मत दिखाने क्यों दिया? क्या कांग्रेस ‘अविश्वास प्रस्ताव’ के जरिये एनडीए सरकार की ताकत आंकना चाह रही थी? क्या कांग्रेस इस प्रस्ताव के जरिये अपनी कमजोर कड़ियां भी तलाश रही थी?

सदन में शुक्रवार को राहुल गांधी का भाषण पूरी तरह से मोदी पर केंद्रित था, लेकिन पीएम मोदी ने अपना भाषण विपक्ष, राहुल गांधी के अलावा देश और जनता पर भी फोकस रखा. राहुल गांधी यहीं पीएम मोदी से हार गए.

संसद में मोदी सरकार के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ फेल होने के बाद भले ही कांग्रेस बैकफुट पर आ गई हो, लेकिन अभी भी उसे 2003 का इतिहास दोहराने की उम्मीद है. तब अटल सरकार के खिलाफ अविश्वास मत में भले कांग्रेस फेल साबित हुई, लेकिन अगले साल के आम चुनाव में लोगों की विश्वास जीतने में कामयाब रही थी.

बता दें कि साल 2003 में अटल सरकार के खिलाफ भी कांग्रेस नीत विपक्ष ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. मगर कांग्रेस अपने पक्ष में वोट जुटाने में नाकमयाब रही थी और अटल सरकार विश्वास जीतने में सफल हो गई थी. बाद में 2004 में हुए आम चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी.

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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