हिंदी न्यूज़ – मुजफ्फरपुर मामला : गुनहगार, पहेरदार और शर्मसार सब औरत!

कहते हैं गुनाह का कोई चेहरा नहीं होता. घटनाओं को एक नज़र से देखने वाले और तुरंत राय कायम कर लेने वाले समाज के सामने मुजफ्फरपुर की घटना एक नज़ीर पेश करती है कि गुनाह का न सिर्फ कोई चेहरा होता है बल्कि कोई लिंग भी नहीं होता है. गुनाह करने की तलब किसी के भीतर भी जाग जाती है. मुजफ्फरपुर बालिका आवास गृह की घटना में ऊपर से नीचे तक महिलाएं ही महिलाएं जुड़ी हैं. जो शर्मसार हो रही हैं या की जा रही हैं वो भी महिलाएं ही हैं.

मुजफ्फरपुर में सील पड़े बालिका आवास गृह के बाहर जब मैं पहली बार पहुंचती हूं, तो मुलाकात एक महिला सिपाही और महिला एसएचओ से होती है. ज़ाहिर है मामला बच्चियों से जुड़ा है इसलिए महिला थाने में ही केस गया और ज़मीनी स्तर पर जो तमाम तरह की कार्यवाही हो रही है, उसे महिला थाना ही देख रहा है. लेकिन फिर महिला एसएचओ ज्योति कुमारी से बातचीत में पता चलता है कि केस को सुलझाने के काम में मुजफ्फरपुर की एसएसपी हरप्रीत कौर ने कोई रुकावट नहीं आने दी. नाम सुनते ही मेरे मुंह से निकला, एसएसपी भी महिला हैं. इस पर आसपास खड़े लोगों ने एक सुर में कहा – यह महज़ एक संयोग है कि इस वक्त जिले की एसएसपी एक औरत हैं.

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वैसे एसएसपी कौर को मुजफ्फरपुर की जिम्मेदारी लिए अभी तीन महीने ही हुए हैं. एक मई को उन्होंने कार्यभार संभाला था और 31 मई को उनके सामने यह केस आ गया. न्यूज़ 18 से बातचीत में कौर कहती हैं ‘ज्वाइन करने से पहले मुजफ्फपुर में क्राइम होते रहने की बात पता थी. हम तो पुलिस विभाग से हैं इसलिए लड़कियों से जुड़े केस आते रहते हैं लेकिन ये केस थोड़ा अलग है, इसमें छोटी-छोटी बच्चियों हैं इसलिए यह बड़ी जटिलता वाला केस है.’हरप्रीत कौर के अलावा इस केस में बाकी के चेहरे भी ज्यादातर औरतों के ही हैं. केस में एक मंत्री का नाम उछला है. सामाजिक कल्याण मंत्री मंजू वर्मा, जिनके पति चंदेश्वर वर्मा पर इस मामले में शामिल होने का आरोप लगाया जा रहा है. मंजू वर्मा ने कहा है कि अगर उनके पति दोषी पाए जाते हैं, तो वह इस्तीफा दे देंगी. लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें और उनके पति को इसलिए टार्गेट किया जा रहा है क्योंकि वह कुशवाहा जाति से हैं. उधर ब्रजेश ठाकुर की ओर से उनकी बेटी निकिता आनंद मीडिया के सामने पैरवी कर रही हैं.

यहां मामला इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि इस पूरे केस को महिला आयोग देख रहा है और उधर अपने पति के सामने ढाल की तरह खड़ी हैं मंत्री मंजू वर्मा. ऐसे में अगर सबूत चंदेश्वर वर्मा के खिलाफ मिलते हैं तो क्या महिला आयोग उन्हें उचित सज़ा देने के लिए ज़ोर दे पाएगा. इस पर बिहार महिला आयोग की अध्यक्ष दिलमणि मिश्रा कहती हैं ‘फिलहाल जांच चल रही है. जो भी होगा वो बचेगा नहीं, फिर वो मंत्री ही क्यों न हो.’

इसके अलावा, अगर कोर्ट के दस्तावेज़ को देखेंगे तो वो औरतों के नाम से भरी पड़ी है. पहले पहल ब्रजेश के अलावा जिन सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है वह सब वो औरतें हैं. क्योंकि वो एक बालिका गृह था इसलिए वहां ज्यादातर काम की जिम्मेदारी औरतों के हाथों में ही थी. इनमें से एक महिला के पति ने बातचीत में कहा – ‘वहां काम करने वाली सब औरतें गुनाहगार नहीं हैं. मेरी पत्नी 10 से 5 वहां नौकरी करती थी, लेकिन उसको भी पुलिस ने जबरन पकड़कर रखा है. उसके बच्चों को रो-रोकर बुरा हाल है.’

इसके अलावा जिला बाल संरक्षण इकाई, मुजफ्फरपुर की पूर्व सहायक निदेशक का नाम रोज़ी रानी हैं जिन्हें लापरवाही और कर्त्व्यहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया गया है. यह एक विडंबना ही है कि ब्रजेश ठाकुर का अख़बार प्रात: कमल भी औरतों पर होने वाले शोषण से लेकर उनकी उपलब्धियों से जुड़ी खबरों से भरा रहता है. जब मैंने इस अख़बार के पिछले कुछ अंक उठाकर देखे तो उसमें से एक में बच्चियों के मेरिट में आने की ख़बर हेडलाइन थी.

इस मामले में आरोपियों को बचाने वाले या उन्हें मासूम बताने वालों का एक तर्क ये भी है कि जिन बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है वो पहले से गलत कामों में शामिल थी. ऐसे में हो सकता है उनके साथ पहले ही बलात्कार हो चुका हो. इस तरह के तर्कों को देने वालों में महिलाएं भी शामिल हैं. इस तरह इर्द गिर्द से आते बयान ये बताते हैं कि समाज में अभी भी बलात्कार या यौन शोषण की शिकार हुई औरतें और बच्चियां ही शर्मसार होती है.

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