हिंदी न्यूज़ – टैगोर की जिंदगी में लगातार आता रहा प्यार, पर कादंबरी की बात ही अलग थी- Love Story of Rabindra Nath Tagore with his Sister in Law

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की शख्सियत इतनी बड़ी और इतने आयाम लिए हुए है कि उनके संपर्क में आने वाली महिलाओं का उनके प्रति आकृष्ट होना स्वाभाविक प्रतीत होता है. ये सही है कि वो अपने जीवन में कई प्यार के अफसानों से गुजरे, लेकिन कादंबरी से उनके प्रेम में जो ऊष्मा, स्नेह और भावनाओं का प्रबल आवेग था, वो अलग ही था. हो सकता है कि कुछ लोग ये जानकर अचंभित हों कि ये कादंबरी कौन थीं. जो शायद उन्हीं के लिए बनीं थीं.

19वीं सदी में टैगोर परिवार बंगाल के सबसे ज्यादा अभिजात्य और समृद्ध परिवारों में एक था. कुलीन पिराली ब्राह्मण परिवार. भारतीय पैमानों के हिसाब से समय से कहीं आगे का जीवन जीने वाला परिवार. सभी बहुएं खासी पढ़ी-लिखी थीं. रविंद्रनाथ टैगोर की एक बड़ी भाभी जनांदिनी देवी उच्च शिक्षित और आधुनिक महिला थीं. वो अपने तीन बच्चों के साथ बगैर पति के तब पानी के जहाज से अकेले ही इंग्लैंड की यात्रा पर चली गईं, जब वो गर्भवती थीं. वो उस जमाने में फैशन ट्रेंडसेटर कही जाती थीं.

टैगोर परिवार जिस विशाल बंगले में रहता था, वहां रोज साहित्य की महफिलें जमती थीं, नृत्य और नाटिकाएं होती थीं. एक से एक बड़ी शख्सियतें मेहमान के रूप में आती थीं. टैगोर परिवार के कई व्यावसाय थे. उनका बड़ा स्टेट था. टैगोर के बाबा प्रिंस द्वारिकानाथ उद्योगपति और जमींदार थे. वो ब्रितानी किंग के बहुत करीब थे. अपने समय में वो देश के सबसे धनी भारतीय थे. अंग्रेज अधिकारी उनकी मेहमानवाजी का आमंत्रण स्वीकार करने के लिए लालायित रहते थे.

कादंबरी उनसे दो साल बड़ी उनकी भाभीवो तब आठ साल के थे. उनके परिवार में दस साल की एक लड़की आई- कादंबरी. बड़े भाई यतींद्रनाथ की पत्नी के रूप में. यतींद्र उससे दस साल बड़े थे. आते ही उसकी पहली दोस्ती पति से कहीं ज्यादा अपने देवर रविंद्र से हुई. रविंद्र 14 भाई बहन थे. कादंबरी चंचल थी, गंभीर थी और ज्यादा बोल्ड. समझदार थी और प्रतिभाशाली भी. ससुराल में उसने आगे की पढ़ाई करनी शुरू की. चाहे नाटिकाओं में अभिनय की बात हो या फिर कविताओं पर चर्चा या फिर हॉर्स राइडिंग जैसे साहसिक कामों की… हर जगह वो आगे होती थीं. यतींद्र अपने कामों में कादंबरी को शायद ही समय दे पाते. दूसरे कादंबरी के व्यक्तित्व के सामने उनकी अपनी शख्सियत भी दबी हुई थी. लिहाजा कादंबरी और रविंद्र के बीच पनप रही मैत्री समय के साथ दोनों को करीब लाती गई.

जब रविंद्रनाथ टैगोर की मां का निधन हुआ तो कादंबरी अपने दोस्त सरीखे देवर की संरक्षिका बन गईं. यही वो समय था जब उन्होंने पहले उन्हें मां सरीखा स्नेह दिया और फिर ये प्यार प्रेमी-प्रेमिका के प्रबल आवेग के बंधन में बांधने लगा. टैगोर ने अपने जीवन में ज्यादातर जितनी रोमांटिक कविताएं लिखीं या महिलाओं की जितनी पेंटिंग्स बनाईं, वो उन्हीं को केंद्र में रखकर तैयार हुईं. ये बात उन्होंने समय समय पर स्वीकार कीं.

कादंबरी नहीं चाहती थीं कि रवि की शादी हो
सुधीर कक्कड़ अपनी किताब यंग टैगोर में लिखते हैं, भाभी कादंबरी देवी उनका पहला प्यार थी, जिन्हें उन्होंने तीव्रता के साथ शुरुआत से आखिरी दिन तक प्यार किया. जब उनकी शादी होने वाली थी तो कादंबरी कतई नहीं चाहती थीं कि ऐसा हो. उन्होंने गुपचुप इस शादी को तोड़ने की भी कोशिश की, लेकिन जब ऐसा नहीं हो सका तो उन्होंने रविंद्र पर भरसक दबाव डाला कि वो इस शादी से इनकार कर दें, क्योंकि उन्हें लगता था कि इस शादी से उनके संबंधों में दूरियां आ जाएंगी. फिर उनके पास प्यारे देवर को लेकर क्या अधिकार रह जाएगा. सच बात ये थीं कि वो रविंद्रनाथ के लिए बहुत कुछ थीं. जिंदगी भर रहीं. वो उनके असर से कभी उबर नहीं पाए. वो कादंबरी को हेकेट कहते थे, यानि वो नाम जो ग्रीक लोगों की चांद की देवी का है.

दूसरी ओर रविंद्रनाथ टैगोर पिता की शादी की बात को भी नहीं टाल सके. पिता उनकी शादी इसलिए करना चाहते थे, क्योंकि दोनों के संबंधों की चर्चाएं बढ़ती जा रही थीं. इससे टैगोर परिवार की रेपुटेशन पर भी प्रभाव पड़ने लगा था. आखिरकार 20 साल की उम्र में उन्होंने 11 साल बड़ी भावतारिणी देवी से शादी कर ली. हालांकि उन्हें नहीं मालूम था कि इस शादी का परिणाम क्या होने वाला है. कृष्णा कृपलानी की किताब टैगोर ए लाइफ कहती है, वो शायद ही कोई काम अपनी पसंदीदा भाभी से पूछे बगैर करते थे. रविंद्र की मां नहीं थी तो कादंबरी के कोई बच्चा नहीं था. दोनों का प्यार अजीब सा ही था.

शादी के चार महीने बाद कादंबरी की खुदकुशी
शादी तो रविंद्रनाथ ने कर ली, लेकिन ये उनके लिए एक हादसा बन गई. शादी होते ही उनकी पत्नी ने भाभी और देवर के बीच संबंधों को भांप लिया. रिश्तों में जटिलताएं आने लगीं. शादी के चार महीने बाद निराश कादंबरी ने ज्यादा अफीम खाकर अचानक आत्महत्या कर ली. इस खुदकुशी का चर्चा बंगाल में खूब हुआ, लेकिन टैगोर परिवार ने कभी इस पर मुंह नहीं खोला. टैगोर इस घटना से टूट गए. उनकी हालत अजीब सी हो गई.

महात्मा गांधी के साथ रविंद्रनाथ टैगोर की फाइल फोटो

सुधीर कक्कड़ की किताब यंग टैगोर में उनकी हालत को बाद में खुद द्वारा लिखे गए इन शब्दों से उद्धृत किया है, ‘सी, माई क्वीन, हैज डाइड एंड माई वर्ल्ड हैज शट अगेंस्ट डोर ऑफ द इनर अपार्टमेंट ऑफ ब्यूटी… (वो, मेरी रानी, नहीं रही, और मन से निकलने वाले शब्द कहीं खो गए हैं…) इस हादसे के बाद टैगोर और उनकी पत्नी में दूरियां बढ़ गईं. ये नौबत आ गई कि पत्नी उन्हें छोड़कर वापस अपने पिता के घर चली गईं. हालांकि बाद में टैगोर और पत्नी के संबंध सामान्य हो गए. बाद में उनकी पत्नी उच्च शिक्षित हुईं और इंग्लैंड में भी उन्होंने जाकर पढ़ाई की. उन्होंने कुछ किताबों का अनुवाद भी किया. टैगोर को उनसे पांच बच्चे हुए.

पहला प्यार अन्ना यानि अन्नपूर्णा
17 साल की उम्र में रवि अहमदाबाद में अपने बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के पास गए, जो वहां आईसीएस थे. चार महीने बाद सत्येंद्रनाथ ने उन्हें मुंबई में अपने दोस्त डॉक्टर आत्माराम पांडुरंग के पास भेजा. उस परिवार के साथ वो 1878 में दो महीना ठहरा. ये परिवार पाश्चात्य के रंग में रंगा परिवार था. उसके साथ वो पहली बार इंग्लैंड गए. उसी दौरान उनकी करीबी पांडुरंग की बेटी अन्ना या अन्नपूर्णा से बढ़ी. वो उम्र में उनके बराबर या उनसे कुछ बड़ी थी. वो उन्हें अंग्रेजी बोलने का तरीका सिखाती थी ताकि इंग्लैंड में आसानी से रह सकें. अन्ना खूबसूरत और स्मार्ट थी. वो खुद पहली ही नजर में टैगोर के प्यार में पड़ गई. उसी दौर में टैगोर ने नलिनी शीर्षक से उस पर कविता लिखी. वह चाहती थी कि युवा टैगोर उस पर कविता लिखें. बाद में जब उन्होंने अपनी पहली किताब कवि कहानी लिखी, तो नलिनी इसकी नायिका थी. सत्येंद्र शुक्ला ने 12 सितंबर 1999 को ट्रिब्यून के रविवार अंक में गुरुदेव फर्स्ट लव के नाम से लंबा आर्टिकल लिखा, जिसमें लिखा गया है कि अन्ना किस तरह उनके प्रति आकर्षित थी. बाद के सालों में भी टैगोर उसे भूल नहीं पाए.

लंदन में डॉ. स्कॉट की बेटी दिल दे बैठी
ये भी बताया जाता है कि लंदन में कुछ समय के लिए वह अकेले डॉ. स्कॉट के साथ पेइंग गेस्ट के तौर पर ठहराए गए. जल्द ही वो उनके परिवार के सदस्य की तरह बन गए. डॉ. स्कॉट की दो बेटियां थीं. उनमें से एक को इस युवा कवि से प्यार हो गया. बाद में अपने परिपक्व बरसों में गुरुदेव ने अपने करीबी दिलीप कुमार राय से कहा, वह मानते हैं कि उनके जीवन में आने वाली स्त्रियां पूर्व जन्मों में जरूर उनके साथ रही होंगी. हालांकि ये प्यार शायद ही शारीरिक रहा हो. बाद में इंद्रनील चौधरी ने एक लेख लिखा, गुरुदेव शारीरिक रिश्तों को लेकर संवेदनशील थे. उन्हें डर लगता था कि कहीं वो नाकाम ना हो जाएं. हालांकि इस लड़की और अन्ना से उनका पत्र व्यवहार बाद में भी होता रहा. जब उन्होंने लंदन से अपने पत्रों में पश्चिमी महिलाओं की आजादी और यूरोप में महिलाओं संबंधी आंदोलन की तारीफ करते हुए पत्र पिता को लिखे तो पिता ने उन्हें तुरंत वापस बुला लिया और अनुशासित पुत्र की तरह वो वापस आ गए.

सुंदर और चार्मिंग रेनू को 200 खत लिखे
उनकी जिंदगी में रेनू अधिकारी नाम की युवती भी आईं. बाद में उसकी शादी आरएन मुखर्जी से हुई. रेनू से उनका संपर्क लंबे समय तक बना रहा. वो काफी सुंदर और चार्मिंग महिला थीं. वो भी गुरुदेव से उतना ही प्यार करती थीं. टैगोर ने उन्हें 200 पत्र लिखे थे.

अर्जेंटीनाई विधवा के आए करीब
जब वो अर्जेंटीना के ब्यूनस आर्यस प्रवास के लिए गए, तो वो वहां एक बड़े बंगले में रुके, जो प्लेट नदी के किनारे था. उसी दौरान वो एक महिला विक्टोरिया के प्रति संवेदनाएं महसूस कर लगे. 63 साल की विधवा के करीब आए, लेकिन ये भी कहा जाता है कि वो जब वहां गए थे तब उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था. वह डॉक्टरों की सलाह पर वहां गए थे. वहां वो जिस बंगले में रुके थे, वहां विक्टोररिया ओकाम्पो नाम की चार्मिंग महिला ने उनकी बहुत तीमारदारी हुई. वहां ना केवल वो स्वस्थ हो गए, बल्कि विक्टोरिया के करीब भी आ गए. विक्टोरिया ने बाद में इस बारे में विस्तार से लिखा भी कि टैगोर किस कदर उसकी जिंदगी बन गए. जब वो वहां से लौटे तो अगले साल उनकी कविताओं की पुस्तक पूरबी प्रकाशित हुई. उनकी कुछ कविताएं उन्होंने विजया नाम देते हुए ओकाम्पो के लिए लिखी. ये प्यार में पगी हुई चहकती शामों और मूड्स की कविताएं थीं.

ये कहा जा सकता है कि टैगोर के जीवन में बहुत सी युवा महिलाएं आईं, जिनके साथ उन्होंने प्यार को जिया, लेकिन कहना चाहिए कि इस प्यार को आज के दौर के बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड जैसे रिश्ते भी नहीं कह सकते. टैगौर ताजिंदगी प्यार को जीते रहे और अपने जिंदगी में आई महिलाओं को अपनी कविताओं के माध्यम से याद करते रहे. लेकिन वो कादंबरी को कभी नहीं भूल पाए.

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