हिंदी न्यूज़ – हत्या के समय इंदिरा गांधी को लगी गोलियों में से एक खुद क्यों खाना चाहते थे धवन? । Know everthing about R K Dhawan close associate of Indira Gandhi died on monday

लोकतंत्र कई कमाल करता है. भारतीय लोकतंत्र और राजनीति में इसी तरह की एक मिसाल थे आरके धवन. जो दरियागंज की टाइपिंग की दुकान से उठकर केंद्रीय मंत्री तक बने और देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक इंदिरा गांधी के खासमखास रहे. धवन के जाने पर कुछ कांग्रेसी नेताओं ने ट्वीट किए और उनके चाहने वालों ने एक-आध निजी अखबारों में विज्ञापन छपवा दिये.

लेकिन सोमवार को दिल्ली में 81 बरस की उम्र में चल बसे धवन सत्ता के कभी सत्ता के शीर्ष पर हुआ करते थे. किसी जमाने में थे तो वे महज क्लर्क, लेकिन सत्ता के गलियारों में मुख्यमंत्रियों तक के भाव तय कर दिया करते थे. न आरके धवन ने कभी गांधी परिवार छोड़ा न कभी गांधी परिवार ने इनको पूरी तरह भुलाया. यही कारण है कि जब राजीव बोफोर्स घोटाले के आरोपों से घिरे हुए थे, वे आरके धवन को ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बनाकर अपनी सरकार में वापस ले आये.

इंदिरा गांधी की हत्या के षड़यंत्र में शामिल होने का आरोप लगा
यूं तो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एमपी ठक्कर को हत्या की जांच के लिए नियुक्त किया. प्रधानमंत्री बनने के दो महीने के अंदर ही राजीव गांधी ने धवन को निकाल दिया. धवन पर इंदिरा गांधी की हत्या में शामिल होने के आरोप लग रहे थे. दरअसल सारी ही सिक्ख लॉबी को शक की निगाहों से देखा जा रहा था.कैरवां पत्रिका से धवन ने इस बारे में बात की थी. जिसके एक लेख में धवन को कोट किया गया था, ‘मेरी इच्छा थी कि मुझे एक गोली लग गई होती ताकि मुझे एक सुप्रीम कोर्ट के जज के क्रोध का सामना न करना पड़ता. मेरे बारे में अप्रिय बातें और टिप्पणियां की गईं.’ उन्हें और उनके परिवार को निगरानी में रखा गया, और उनके घर आने वाले हर इंसान से पूछताछ की जाती थी. रातोंरात धवन को उसी शहर में राष्ट्रद्रोही बना दिया गया था, जिसमें वे सबसे ताकतवर इंसान हुआ करते थे.

इंदिरा गांधी के खासमखास रहे
आरके धवन, इंदिरा गांधी के पीए 1962 में बने और 1984 में उनकी मौत तक उनके साथ ही रहे. इमरजेंसी के दौरान प्रधानमंत्री आज किससे मिलेंगी, इस फैसले में उनकी अहम भूमिका रहती थी. इमरजेंसी के दौरान जो कुछ युवा इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के सबसे करीबी थे. उनमें अंबिका सोनी और कमल नाथ जैसे लोगों के साथ आरके धवन का नाम भी है. इन लोगों के महत्व को देखते हुये इन्हें ‘द पैलेस गार्ड्स’ (महल के रक्षक) कहा जाने लगा था.

पंजाब यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट धवन 1990 में राज्य सभा के सदस्य भी चुने गये. और कई संसदीय समितियों का हिस्सा भी रहे. किताब ‘विद ग्रेट ट्रुथ एंड रिगार्ड : ए स्टोरी ऑफ द टाइपराइटर इन इंडिया’ में धवन के शक्तिशाली होने के किस्सों का जिक्र है. इस किताब को वरिष्ठ पत्रकार रामा लक्ष्मी ने लिखा है. किताब में उन्होंने लिखा है, ‘इंदिरा गांधी से नजदीकियां होने के चलते कांग्रेस पार्टी में उनकी बहुत इज्जत थी.’

संजय गांधी को चुनाव लड़ने का दिया था सुझाव
इमरजेंसी के दौरान धवन के जरिए ही संजय गांधी अपने फैसले लागू कराते थे. संजय गांधी को चुनाव लड़कर सरकार में किसी मंत्रीपद को ले लेने का सुझाव भी धवन ने ही दिया था. एक बार इंदिरा गांधी के ज्वाइंट सेक्रेटरी रहे बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा था, ‘जल्द ही (इमरजेंसी के बाद) सारी ही अप्वाइंटमेंट जिन्हें प्रधानमंत्री को तय करना होता था महल के रक्षकों (द पैलेस गार्ड्स) के जरिए ही तय की जाती थी. इसके बाद जब फाइलें उनके (प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के) पास पहुंचती थीं, तो वे उन्हें पढ़ने की जहमत भी नहीं उठाती थीं.’

धवन ने कांग्रेस की कई पीढ़ियां देखीं
उसके बाद से सोनिया गांधी के वक्त तक धवन कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक रहे. और वे राज्य सभा भी गये.

लगभग सारी जिंदगी एक बैचलर के तौर पर गुजारने के बाद, काम में हमेशा व्यस्त रहने वाले धवन ने जिंदगी के आखिरी मुकाम पर अपनी मित्र सरला से 16 जुलाई, 2012 को 74 साल की उम्र में शादी कर ली.

यह भी पढ़ें : इस घटना के बाद इंदिरा गांधी ने की थी इमरजेंसी की घोषणा, तस्वीरों से जानें आपातकाल की पूरी कहानी

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *