हिंदी न्यूज़ – करुणानिधि : दक्षिण भारत की राजनीति केे ‘भीष्म पितामह’-DMK chief Karunanidhi died know everything about him

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी DMK प्रमुख एम करुणानिधि के लिए उनकी 94 साल की उम्र एक संख्या मात्र रह गई थी. आजादी के बाद से भारतीय राजनीति के लगभग सारे मुकाम इस शख्सियत के सामने से होकर गुज़रे थे. इस उम्र में भी करुणानिधि ही DMK के कर्ताधर्ता हुआ करते थे. उन्होंने 26 जुलाई को ही डीएमके प्रमुख के रूप में 50 साल पूरे किये थे.

कभी तमिल फिल्मों में स्क्रिप्ट लिखने वाले लेखक करुणानिधि तमिलनाडु की राजनीति के नायक कैसे बने यह किस्सा भी किसी फिल्मी किस्से से कम दिलचस्प नहीं है. और बाद में राजनीति के इस नायक को कोई टक्कर दे सका तो वे तमिल फिल्मों के असली महानायक एमजीआर और उनकी शिष्या जयललिता ही थे. लेकिन 1969 से लेकर 1977 का दशक ऐसा था जब करुणानिधि और तमिलनाडु की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे. करुणानिधि पिछले 62 सालों में एक भी चुनाव नहीं हारे थे. फिलहाल वे थिरुवारुर सीट से MLA थे.

1924 में थिरुक्कुवालाई गांव में जन्में करुणानिधि का घर अब म्यूजियम में बदल दिया गया है. जहां उनकी पोप से लेकर इंदिरा गांधी तक के साथ की तस्वीरें लगी हैं. दक्षिण भारत की राजनीति में तस्वीरों की जगह बहुत ऊपर है. करुणानिधि का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था. लेकिन बालक करुणानिधि पढ़ने में बहुत तेज था. उनका समुदाय पारंपरिक रूप से संगीत वाद्ययंत्र ‘नादस्वरम’ बजाता था. तो जाहिर है करुणानिधि को भी संगीत सीखना ही था.

संगीत की जगह राजनीति का सबक सीख आये करुणानिधिकरुणानिधि ने बचपन में ही संगीत सीखने के दौरान जातिभेद का पहला पाठ पढ़ लिया था. क्योंकि उन्हें उनकी जाति के चलते कम वाद्ययंत्र सिखाये जाते थे. और यह बात उन्हें बुरी लगती थी. साथ ही तथाकथित निचली जाति के बालकों को कमर के ऊपर कोई कपड़ा पहनकर मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था. ऐसे में बालक करुणानिधि का मन संगीत में कहां लगना था? उनका यही मन राजनीति की ओर मुड़ गया. पहले वे ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से जुड़े. और द्रविड़ लोगों के ‘आर्यन ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ आंदोलन में शामिल हो गये.

उसके बाद साल 1937 में जब हिंदी को तमिलनाडु में अनिवार्य भाषा के तौर पर लाया जा रहा था. करुणानिधि इस कदम के विरोध में उठ खड़े हुये. उनकी उम्र थी मात्र 14 साल. और वे इसी उम्र में कर रहे थे तमिलनाडु में हिंदी का विरोध और लिख रहे थे विरोध के लिये नारे. इस तरह से कूटनीति के साथ ही कलम के इस सिपाही ने 14 साल की उम्र में अपने करियर का आगाज कर दिया.

तीन पत्नियां और छ: बच्चे
करुणानिधि की तीन शादियां हुई थीं. उनकी पहली पत्नी का नाम पद्मावती अम्माल था. जिनसे उन्हें एक बेटा हुआ जिसका नाम एमके मुथू है. पद्मावती का निधन मुथु के जन्म के आसपास ही हो गया था. उनकी उम्र अब 70 साल है. आर्थिक हालत खस्ताहाल. वो चेन्नई के बाहरी इलाके में किसी किराए के मकान में रहते हैं. करुणानिधि और उनके बीच संबंध पिछले कई दशकों से करीब खत्म से ही हैं. बीच में उन्होंने करुणानिधि के विरोधियों से भी हाथ मिला लिए थे.

इसके बाद उनकी शादी दयालु अम्मा से हुई. जिनसे इस कपल को चार बच्चे हुए, एमके अलागिरि, एमके स्टालिन, एमके तमिलारसु और सेल्वी. उनकी तीसरी पत्नी का नाम राजाथिअम्माल हैं, जिनसे उन्हें एक बेटी (कनिमोझी) हैं.

पेरियार और अन्नादुराई

कलम और जुबान दोनों का जलवा
उन्होंने ही द्रविड़ आंदोलन के पहले छात्र संगठन ‘तमिलनाडु तमिल मनावर मंडलम’ की स्थापना की. और एक 10 अगस्त, 1942 को अखबार शुरू किया. जिसका नाम था ‘मुरासोली’. इसके बाद वे कोयम्बटूर में रहते और नाटक लिखते थे. इसी दौरान उनकी धारदार शैली पर नज़र गई ‘पेरियार’ और ‘अन्नादुराई’ की. पेरियार किसी परिचय के मोहताज नहीं और अन्नादुराई वे सीएन अन्नादुराई हैं, जिन्होंने दक्षिण भारत की एकता के आधार पर 1962 में अलग ‘द्रविड़नाडु’ की आवाज उठा दी थी. जिसके खिलाफ कानून तक बनाना पड़ा था. ये दोनों उस दौर में तमिल राजनीति के महारथी हुआ करते थे.

करुणानिधि के लेखन और बात रखने की असाधारण क्षमता से प्रभावित होकर इन्होंने करुणानिधि को अपनी पार्टी की पत्रिका ‘कुदियारासु’ का संपादक बना दिया गया. लेकिन देश की आजादी के साथ ही पेरियार और अन्नादुराई के रास्ते अलग हो गए और करुणानिधि अन्नादुराई के साथ उनके रास्ते पर चले आये. 1949 में दोनों ने नई पार्टी बनाई. नाम था ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (DMK).

करुणानिधि पार्टी के कोषाध्यक्ष बने. लेकिन पूरी तरह राजनीति में उतर चुके करुणानिधि ने फिल्मों से भी रिश्ता नहीं तोड़ा और 1952 में उन्होंने ‘परासाक्षी’ नाम की एक फिल्म भी बनाई. जो उनकी आर्यन ब्राह्मणवादी विरोधी विचारधारा पर आधारित थी. वैसे करुणानिधि का नाम तो 1947 से लेकर 2011 तक आई कई तमिल फिल्मों से जुड़ा है. बहरहाल, 1957 में वे अपनी पार्टी की ओर से चुनावों में उतरे और पहली बार तमिलनाडु के कुलिथालई क्षेत्र से चुनकर विधानसभा पहुंचे. उस वक्त करुणानिधि DMK के टिकट से विधानसभा पहुंचे मात्र 15 विधायकों में से एक थे.

दस साल के भीतर ही राजनीति पलटी और 1967 में उनकी पार्टी पूर्ण बहुमत में आ गई. अन्नादुराई राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन गये. और इसके बाद से वहां की राजनीति में कांग्रेस की कभी वापसी नहीं हो सकी. ज्यादा से ज्यादा उसे एक सहयोगी का दर्जा मिला. करुणानिधि के सितारे बुलंद थे. सत्ता खुद उनके करीब आना चाहती थी. सत्ता संभालने के दो साल बाद ही 1969 में अन्नादुराई की मौत हो गई और नंबर दो यानि करुणानिधि मुख्यमंत्री बन गये. 1971 में हुए चुनावों में फिर से करुणानिधि जीतकर आये.

करुणानिधि और अन्नादुराई

राजनीति का यह नायक फिल्मी नायक से खा गया मात
1971 की जीत के बाद करुणानिधी ने अपना नया साथी बनाया था तमिल फिल्मों के महानायक एमजी रामचंद्रन को. लेकिन दोनों का साथ ज्यादा नहीं चला और एमजीआर ने अलग होकर अपनी नई पार्टी बना ली, ‘अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ यानि AIDMK. अब 1977 में ये फिल्मी लेखक और नायक राजनीतिक अखाड़े में आमने-सामने थे. लेकिन फिल्मी नायक को यह लेखक टक्कर नहीं दे पाया और इसके बाद करुणानिधि की राजनीति कमजोर पड़ती गई और उनकी पार्टी हारती गई.

दस साल ऐसे ही रहने के बाद 1987 में एमजीआर की मृत्यु के साथ एक बार फिर DMK की आशाएं जागीं. पर 1989 में विधानसभा में साड़ी खींचे जाने की घटना के बाद एमजीआर की शिष्या और अभिनेत्री रही जे जयललिता (जो जाति से ब्राह्मण ही थीं) करुणानिधि के तमाम दावों के बाद भी सत्ता में आ गईं. 1991 में हुए चुनावों में AIDMK ने 224 सीटें जीतीं. और अम्मा के जादू के चलते DMK की सीटें इकाई अंकों में सिमट गईं.

इसके बाद कभी करुणानिधि तो कभी जयललिता, तमिलनाडु की राजनीति टेनिस बॉल की तरह दोनों के बीच घूमती रही. पिछली आधी सदी से करुणानिधि दक्षिण भारतीय उत्तर-भारत के प्रभुत्व की विरोधी और ब्राह्मणवाद विरोधी राजनीति के प्रतीक बने हुए हैं. उनके ऐसे ही आक्रामक तेवर हैं जो उन्होंने गुरू सी एन अन्नादुराई और वैचारिक आदर्श पेरियार से विरासत में पाये थे. पेरियार से करुणानिधि बेहद प्रभावित थे और भगवान के अस्तित्व से उनका सीधा इंकार था. पर दुखद है कि एक दौर आया जब करुणानिधि को ही उनके अनुयायी भगवान मानकर उनकी पूजा करने लगे. वैसे सितंबर, 2007 में दिया उनके भाषण का यह वाक्य उनकी शैली और विचारों की एक नज़ीर पेश करता है –

“लोग कहते हैं कि सत्रह लाख साल पहले एक आदमी हुआ था. उसका नाम राम था. उसके बनाए पुल (रामसेतु) को हाथ ना लगायें. कौन था ये राम? किस इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएट हुआ था? कहां है इसका सबूत?”

करुणानिधि जानते थे कि उत्तर भारतीय प्रभुत्व वाली कट्टर हिंदुत्व समर्थक राजनीति को इससे बहुत मिर्ची लगने वाली है. करुणानिधि के समर्थकों को उनका यह स्टाइल पसंद था. उनके समर्थक ‘कलईनार’ यानि कलाकार कहा करते थे. तमिलनाडु में पेरियार की रोपी और अन्नादुराई और करुणानिधि की संभाली गई गैर ब्राह्मणवादी, हिंदी विरोधी राजनीति का बोलबाला आज तक रह सका क्योंकि उसे करुणानिधि से मजबूत आधार मिला. जिसके बारे में रजनीकांत के अपनी पार्टी लांच करने के वक्त ‘आध्यात्मिकता को तवज्जो’ देने की बात कही थी. जिसके बाद कहा जा रहा था कि लोगों में दशकों से चली आ रही इस राजनीति के प्रति बोरियत पैदा हो रही है और रजनीकांत को इसका फायदा मिलेगा.

तमिलनाडु विधानसभा में साड़ी खींचे जाने के बाद जयललिता

बहरहाल देखना ये है कि जयललिता और करुणानिधि दोनों के जाने के बाद क्या कोई इस राजनीतिक विरासत को इसी पैनेपन के साथ आगे ले जा सकेगा? और भले ही करुणानिधि नास्तिक रहे हों और उनकी पार्टी के विधायकों को 1989 में विधानसभा में जयललिता की साड़ी खींचने के चलते ‘कौरव’ कहा गया हो. लेकिन 76 साल तक दक्षिण भारत की राजनीति में सक्रिय रहने वाले इस शख्स की किसी ‘महाभारत’ आख्यान के किरदार से तुलना हो सकती है तो वे ‘भीष्म पितामह’ ही हैं.

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