हिंदी न्यूज़ – एडल्ट्री मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा Supreme Court’s five-judge Constitution bench reserves the verdict on validity of Adultery under the Indian Penal Code

एडल्ट्री कानून पर सुनवाई पूरी, सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केन्द्र से यह सवाल किया.

News18Hindi

Updated: August 8, 2018, 8:52 PM IST

सुप्रीम की पांच सदस्यीय जजों की बैंच ने ल्ट्री से संबंधित कानून पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है. सुप्रीम कोर्ट धारा 497 की वैधता या खारिज करने के मुद्दे पर फैसला बाद में सुनाएगी. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र से जानना चाहा कि व्याभिचार संबंधी कानून से जनता की क्या भलाई है क्योंकि इसमें प्रावधान है कि यदि स्त्री के विवाहेत्तर संबंधों को उसके पति की सहमति हो तो यह अपराध नहीं होगा.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केन्द्र से यह सवाल किया. केन्द्र ने संविधान पीठ से कहा कि व्यभिचार अपराध है क्योंकि इससे विवाह और परिवार बर्बाद होते हैं.

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं. अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पिंकी आनंद ने यह कहते हुये केन्द्र की ओर से बहस शुरू की कि विवाह की एक संस्था के रूप में पवित्रता को ध्यान में रखते हुये ही व्याभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है.

इस पर, संविधान पीठ ने कहा, ‘‘इसमें विवाह की पवित्रता कहां है, यदि पति की सहमति ली गयी है तो फिर यह व्याभिचार नहीं है.’’ पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘यह सहमति क्या है. यदि ऐसे संबंध को पति की समहति है तो यह अपराध नहीं होगा. यह क्या है? धारा 497 में ऐसी कौन सी जनता की भलाई निहित है जिसके लिये यह (व्याभिचार) अपराध है.’’संविधान ने ये टिप्पणियां उस वक्त कीं जब केन्द्र ने व्याभिचार को अपराध की श्रेणी में बनाये रखने की दलील देते हुये कहा कि इससे विवाह की पवित्रता को खतरा रहता है. अतिरिक्त सालिसीटर जनरल ने कहा कि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर करने संबंधी विदेशी फैसले पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए और भारत में प्रचलित सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये वर्तमान मामले में फैसला करना होगा.

पीठ ने दंड संहिता के इस प्रावधान में तारतम्यता नहीं होने का जिक्र करते हुये कहा कि विवाह की पवित्रता बनाये रखने का जिम्मा पति पर नहीं सिर्फ महिला पर ही है. इस मामले में पहली नजर में न्यायालय का मत था कि अपराध न्याय व्यवस्था ‘लैंगिक तटस्था’’ के सिद्धांत पर काम करती है लेकिन धारा 497 में इसका अभाव है.

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