हिंदी न्यूज़ – atal bihari vajpayee relations with rajiv gandhi indira gandhi and Manmohan singh

अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती उन चुनिंदा नेताओं में की जाती है जो चाहे विपक्ष में रहे या फिर सरकार में लेकिन विरोधी नेताओं से भी उनके काफी बेहतर संबंध रहे. विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी की संसद में तारीफ की थी. नरसिम्हा राव से उनके रिश्ते अच्छे थे और राजीव गांधी की तारीफ करने में भी उन्होंने कभी कंजूसी नहीं की. मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक चारू मजुमदार की मौत पर भी अटल ने सार्वजनिक रूप से उन्हें श्रद्धांजलि दी थी. अटल ने एक बार कहा था कि वो 1952 से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन कभी किसी पर कीचड़ नहीं उछाला. उन्हें राजनीति में भी मानवीय मूल्यों का पक्षधर माना जाता था.

नेहरु ने भी की थी अटल की तारीफ
1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर से पहली बार लोकसभा सदस्‍य बनकर पहुंचे तो सदन में उनके भाषणों ने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को बेहद प्रभावित किया था. विदेश मामलों में वाजपेयी की जबर्दस्‍त पकड़ को देखकर पंडित नेहरू ने भी उनकी कई मौकों पर तारीफ की थी. वरिष्‍ठ पत्रकार किंशुक नाग ने अपनी किताब ‘अटल बिहारी वाजपेयी- ए मैन फॉर ऑल सीजन’ में भी इसका ज़िक्र किया है. किंशुक के मुताबिक दरअसल एक बार जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पर आए तो पंडित नेहरू ने वाजपेयी से उनका विशिष्‍ट अंदाज में परिचय कराते हुए कहा, “इनसे मिलिए. ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं. मेरी हमेशा आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूं.”

इसी किताब में 1977 की एक घटना का जिक्र है जिसके मुताबिक 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो जब कार्यभार संभालने के लिए साउथ ब्‍लॉक के अपने दफ्तर पहुंचे तो उन्‍होंने गौर किया कि वह पर लगा पंडित नेहरू की तस्‍वीर गायब है. उन्‍होंने तुरंत अपने सेकेट्री से इस संबंध में पूछा. पता लगा कि कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर वह तस्‍वीर वहां से हटा दी थी. वो शायद इसलिए क्‍योंकि पंडित नेहरू विरोधी दल के नेता थे. लेकिन वाजपेयी ने आदेश देते हुए कहा कि उस तस्‍वीर को फिर से वहीं लगा दिया जाए.

इंदिरा गांधी को कहा था ‘दुर्गा’
ये किस्सा 1971 का है जब भारत-पाकिस्तान का युद्ध ख़त्म ही हुआ था और बांग्लादेश के रूप में एक नया राष्ट्र बना था. इस दौरान अटल विपक्ष के नेता थे और इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री. अटल ने विपक्ष के नेता के तौर पर एक कदम आगे जाते हुए इंदिरा को ‘दुर्गा’ करार दिया था. 1971 के युद्ध में पाक के 90,368 सैनिकों और नागरिकों ने सरेंडर किया था.

अटल बिहारी वाजपेयी ने सदन में कहा था कि जिस तरह से इंदिरा ने इस लड़ाई में अपनी भूमिका अदा की है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है. सदन में युद्ध पर बहस चल रही थी और वाजपेयी ने कहा कि हमें बहस को छोड़कर इंदिरा की भूमिका पर बात करनी चाहिए जो किसी ‘दुर्गा’ से कम नहीं थी.

राजीव गांधी को कहा था ‘शुक्रिया’
1987 में अटल बिहारी वाजपेयी किडनी की समस्‍या से जूझ रहे थे. हालांकि आर्थिक साधनों की तंगी के चलते अमेरिका जाकर इलाज कराना उनके लिए संभव नहीं था. हुआ यूं कि तत्कालीन पीएम राजीव गांधी को किसी ने अटल की इस समस्या की सूचना दे दी. राजीव ने तुरंत अटल को बुलावा भेजकर अपने ऑफिस में बुलाया और कहा कि वे उन्हे संयुक्‍त राष्‍ट्र में न्‍यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और वे इस मौके का लाभ उठाकर वहां अपना इलाज भी करा सकते हैं.

मशहूर पत्रकार करण थापर ने अपनी हाल में प्रकाशित किताब ‘द डेविल्‍स एडवोकेट’ में भी बताया है कि साल 1991 में राजीव गांधी की हत्‍या के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उनको याद करते हुए इस बात को पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि ‘मैं न्‍यूयॉर्क गया और इस वजह से आज जिंदा हूं.’ दरअसल न्‍यूयॉर्क से इलाज कराकर जब वह भारत लौटे तो इस घटना का दोनों ही नेताओं ने किसी से भी जिक्र नहीं किया. कहा जाता है कि इस संदर्भ में उन्‍होंने पोस्‍टकार्ड भेजकर राजीव गांधी के प्रति आभार प्रकट किया था.

नरसिम्हा राव ने भेज दिया विपक्ष का नेता!
साल 1993 में जिनेवा में मानवाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया गया. तब तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हा राव देश ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को संयुक्त राष्ट्र संघ में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया था.

नरसिम्हा राव के इस फैसले से देश ही नहीं दुनिया के नेता भी हैरान रह गए थे. दरअसल साल 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी और अटल विदेश मंत्री बने तो तब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था. ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी अंतरराष्ट्रीय मंच से हिंदी में भाषण दिया गया हो, नरसिम्हा राव नही अटल की इस पहल से खासा प्रभावित हुए थे और उन्होंने ये फैसला लेकर सबको चौंका दिया.
मनमोहन को मनाने पहुंच गए अटल
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय भले पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को जाता है, लेकिन उन्हें राजनीति की पेचीदगियों से वाकिफ करने में अटल बिहारी वाजपेयी का भी योगदान माना जाता है. नरसिम्हा राव कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को तब विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से काफी सियासी प्रहार झेलने पड़ते थे. एक वक्त तो नौबत ऐसी आ गई कि मनमोहन सिंह ने नाराज़ होकर वित्त मंत्री पद से इस्तीफे तक का इरादा कर लिया था.

हालांकि तब नरसिंह राव खुद वाजपेयी के पास पहुंचे और उन्हें नाराज़ मनमोहन से मिलकर उन्हें समझाने का आग्रह किया. अटल भी मनमोहन सिंह के पास गए और उन्हें समझाया कि इन आलोचना को खुद पर न लें, वह तो बस विपक्षी नेता होने के नाते सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं. प्रधानमंत्री पद पर अपने एक दशक के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह ने साथी सांसदों की सलाह और आलोचनाओं को बेहद धीर-गंभीर अंदाज में सुना, लेकिन बोला बेहद कम. बस साल 2009 के आम चुनावों के वक्त ही एक बार ऐसा देखने को मिला जब मनमोहन सिंह ने आलोचनाओं का जवाब दिया. तब पीएम पद के लिए बीजेपी उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी चुनावी अभियान के दौरान बार-बार उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ बता रहे थे. इसके जवाब में मनमोहन सिंह ने कहा था, ‘करगिल युद्ध की तपिश में ‘लौह पुरुष’ तुरंत ही पिघल गए.’ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में गृह मंत्री रह चुके आडवाणी को बीजेपी तब लौह पुरुष के नाम से प्रचारित कर रही थी.

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