हिंदी न्यूज़ – OPINION: जब नरसिम्हा राव ने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान वाजपेयी को दी वो पर्जी – Narasimha Rao Passed on a Chit to Vajpayee During His Swearing-in. Here’s Why

(अशोक टंडन)

साल 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनने में पूर्व प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ दोस्ती भी काम आई थी. दरअसल 1996 में चुनावों के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी को लग रहा था कि शायद अमेरिका उन्हें प्रधानमंत्री न बनने दे और उनके खिलाफ वो लॉबिंग कर सकता है. इस बात के सबूत दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के मेल से भी मिलते हैं जो उस वक्त वाशिंगटन को भी भेजे गए थे.

ऐसा ही एक मेल वाजपेयी और तत्कालीन अमेरिकी राजदूत फ्रैंक विस्नर के बीच बातचीत पर आधारित है. ये बातचीत 1996 के चुनाव से पहले हुई थी.

वाशिंगटन को भेजी अपनी एक रिपोर्ट में विस्नेर ने वाजपेयी को अगले भारतीय प्रधानमंत्री के तौर पर नकार दिया था. दरअसल उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी की बॉडी लैंग्वेज से ऐसा लग रहा था कि वो न्यूक्लियर टेस्ट कर सकते हैं.जब तक गैर-बीजेपी पार्टियां किसी दूसरे नेता के नाम पर सहमति बनाते तब तक तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने वाजपेयी को प्रधान मंत्री नियुक्त कर लिया और उन्हें सदन में बहुमत साबित करने के लिए कह दिया.

पूर्व प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव राष्ट्रपति के फैसले से निश्चित रूप से खुश थे. वो जानते थे कि उनके दोस्त वाजपेयी को आगे क्या करना है. राष्ट्रपति भवन में बिना वक्त गवाएं उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान वाजपेयी को चुपचाप एक नोट थमा दिया. इस में लिखा था, “अब मेरे अधूरे काम को पूरा करने का समय है”. ये काम कुछ और नहीं बल्कि पोखरण में परमाणु परीक्षण था जो पी.वी. नरसिम्हा अपने कार्यकाल के दौरान नहीं कर सके थे.

लेकिन वाजपेयी जब तक ये ऐतिहासक काम यानी भारत को परमाणु शक्ति बनाते उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया. नरसिम्हा राव खुद अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान परमाणु परीक्षणों को रोकने के लिए अमेरिकी दबाव की रणनीति का शिकार हुए थे.

नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव (एनएसए) और न्यूक्लियर प्रोलिफेरैशन इंटरनेशनल हिस्ट्री प्रोजेक्ट (एनपीआईएचपी) द्वारा जारी किए गए कुछ दस्तावेजों के मुताबिक, वाशिंगटन ने भारतीय टेस्ट साइट पर कड़ी नजर रखी थी. इसके अलावा परीक्षण को रोकने के लिए कोशिशें भी की गई. इन दस्तावेजों के मुताबिक पोखरण पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी की भी नज़र थी.

अमेरिकी खुफिया एजेंसी के मुताबिक अब ये सारी जानकारी सार्वजनिक हो गई है. इन दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि भारत 1995 के आखिर में पोखरण में परमाणु परीक्षण की तैयारियों में लगा था. जब सैटेलाइट तस्वीरों से ये साफ हो गया था कि भारत परमाणु परीक्षण की योजना बना रहा है उस वक्त अमेरिकी राजदूत विस्नर ने नरसिम्हा राव के कार्यालय को चेतावनी दी कि वो इससे पीछे हट जाएं.

विस्नर ने पीएम राव के मुख्य सचिव एएन वर्मा से भी मुलाकात की, और उन्हें टेस्ट साइट की सैटेलाइट तस्वीरें दिखायी. इसके अलावा उन्होंने वॉर्निंग दी कि परीक्षण भारत के खिलाफ “बैकफायर” कर सकता है. बाद में दिसंबर के मध्य में, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने राव से फोन पर बात की और प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया कि भारत “जिम्मेदारी से” काम करेगा.

इन दस्तावेजों ने ये भी खुलासा हुआ कि अमेरिका ने भारत को परमाणु परीक्षण रोकने के लिए जापान से भी मदद मांगी थी. बाद में पीएम राव परमाणु परीक्षणों से पीछे हट गए थे. शायद यही वजह है कि उन्होंने 1996 में वाजपेयी को शपथ ग्रहण के दौरान ये संदेश दिया था.

1996 और 1998 के बीच, दो लगातार प्रधान मंत्री एचडी देवेगौड़ा और आईके गुजराल ने परमाणु परीक्षणों के बारे में कभी सोचा भी नहीं. 1998 के मिड टर्म इलेक्शन के बाद वाजपेयी एक बार फिर से गद्दी पर लौटे और उन्होंने 11 मई और 13 मई 1998 को पोखरण में परमाणु परीक्षणों का आदेश दे दिया. भारत न्यूक्लियर क्लब में शामिल हो गया. जिसके बाद अधिकांश पश्चिमी शक्तियों ने भारत पर गंभीर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. किसी को समझ नहीं आया कि उनकी सरकार पोखरण परीक्षणों के एक साल के भीतर क्यों गिर गई.

दस्तावेजों के मुताबिक अमेरिकी खुफिया एजेंसी भी इस बात से हैरान थी कि भारत के परमाणु परीक्षणों की तैयारियों को लेकर उन्हें कोई जानकारी नहीं मिल सकी थी.

इन दस्तावेजों के मुताबिक “सेटेलाइट की तस्वीरों से शुरुआती जानकारी मिल सकती थी लेकिन समय पर इसका विश्लेषण नहीं किया गया था”. अमेरिकी खुफिया ने ये भी माना था कि 1995 के अनुभव को देखते हुए वाजपेयी सरकार ने सावधानियां बरती थी. उस वक्त वाजपेयी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा के सख्त निर्देशों के तहत परमाणु परीक्षणों की तैयारियों को छुपाने के लिए कई तरह के कैंपेन चलाए गए थे.

वाजपेयी सरकार को न सिर्फ आर्थिक प्रतिबंधों से जूझना पड़ा बल्कि उन पर आंतरिक और बाहरी हमले भी गिए गए. इसके बाद करगिल में जीत और फिर जिस तरह से इंडियन एयरलाइंस के अपहरण कांड को उन्होंने संभाला चारों तरफ वाजपेयी सरकार की तारीफ हुई. एक बार फिर से उन्हें जीत मिली और एनडीए को पूरे पांच साल के कार्यकाल के लिए निर्णायक जनादेश मिला. पहली बार कोई गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री पांच साल तक सत्ता में रहा.

(लेखक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सलाहकार थे, ये उनकी निजी राय है)

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