हिंदी न्यूज़ – Why are Atal bihari vajpayee’s Coalition policy necessary for narendra Modi in Loksabha Elections2019-special 2019 में मोदी के लिए क्यों जरूरी हैं ‘अटल’?

मोदी विरोधी दलों की एकजुटता 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार ज्यादा है. बीजेपी की लगातार जीत की वजह से सबसे पुरानी पार्टी  कांग्रेस से लेकर सबसे नई पार्टी तक को अपने अस्तित्व की चिंता सता रही है, लेकिन जब से राज्य स्तर पर मोदी विरोधी दलों के गठबंधन के प्रयास शुरू हुए हैं, भगवा कैंप की चुनौती बढ़ गई है. ऐसे में अगर 2019 में बीजेपी को अपनी सरकार बनानी है तो उसे क्षेत्रीय दलों के साथ न सिर्फ गठबंधन बढ़ाना होगा बल्कि पुराने साथियों के साथ संबंध और प्रगाढ़ करने होंगे. वैसा काम करना होगा जैसा अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था. मतलब ये कि पीएम नरेंद्र मोदी को ‘अटल नीति’ पर चलना होगा.

अटल बिहारी वाजपेयी विचारधारा की दृष्टि से राजनीति के विपरीत धुव्रों को भी साधकर रखते थे. उनकी सरकार में दक्षिणपंथी विचारधारा के विरोधियों ने भी महत्वपूर्ण मंत्रालय अच्छी तरह संभाले. उनके समय में जॉर्ज फर्नांडीज जैसा समाजवादी नेता एनडीए का संयोजक था. अटल ने भारतीय राजनीति की तीन देवियों- मायावती, ममता और जयललिता को साधा. सियासी विश्लेषकों का कहना है कि विपरीत विचारधारा के लोगों को साथ लेकर चलना अटल बिहारी वाजपेयी की खूबी थी. अटल की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश में जुटी बीजेपी को 2019 में सत्ता पाने के लिए उनकी गठबंधन नीति को भी अपनाना पड़ेगा.

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इस समय बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के सामने चुनौती यह है कि उसके सहयोगी या तो साथ छोड़ रहे हैं या फिर आलोचक की मुद्रा में आ चुके हैं. सपा, बसपा, आरजेडी,  शिवसेना और इनेलो जैसे कई क्षेत्रीय दल अपना सियासी वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जो क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं वो भी इस जद्दोजहद में लगे हुए हैं कि कैसे कांग्रेस और बीजेपी से पार पाते हुए वापसी की जाए.वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया के मुताबिक “क्षेत्रीय पार्टियां कभी नहीं चाहतीं कि कांग्रेस या बीजेपी आगे बढ़ें. क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी मजबूत होंगे तो वो कमजोर होंगी. क्षेत्रीय दलों की ताजपोशी कमजोर कांग्रेस और कमजोर बीजेपी ही कर सकते हैं. इसलिए क्षेत्रीय दल अपना वजूद बचाने के साथ-साथ इस कोशिश में लगे हुए हैं कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों मजबूत न होने पाएं.”

हालांकि इस वक्त सबसे ज्यादा 45 पार्टियां एनडीए से जुड़ी हुई हैं. फिर भी क्षेत्रीय दलों को जोड़े रखने की चुनौती सत्तारूढ़ पार्टी पर ही ज्यादा हैं. क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों का साथ कम होते ही 2019 में बीजेपी के लिए खतरा काफी बढ़ जाएगा.

इस समय बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना पार्टी से नाराज है. तेलगू देशम पार्टी न सिर्फ एनडीए छोड़ गई है बल्कि मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा भी खोले हुए है. अकाली दल हरियाणा में अलग चुनाव लड़ने की बात कर रहा है. बिहारी में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का कुछ भरोसा नहीं कि वह किसके साथ रहेगी. यूपी में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर आए दिन बीजेपी नेताओं पर निशाना साधते रहते हैं. पार्टी के दलित सांसदों की नाराजगी जग जाहिर हो चुकी है. इन्हें मनाना 2019 के लिहाज से काफी जरूरी है. शायद ये ‘अटल’ गठबंधन नीति से मान जाएं.

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वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी अटल पर लिखी गई अपनी किताब में लिखते हैं “वाजपेयी ने देश की सबसे बड़ी गठबंधन सरकार चलाई थी और गठबंधन पर कभी अपना राजनीतिक एजेंडा थोपने की कोशिश नहीं की.” वह लिखते हैं कि गठबंधन सरकारों की बड़ी परेशानी सहयोगी दल होते हैं और उन्हें खुश रखना कोई भी फैसला करने से ज्यादा मुश्किल काम होता है. इसका सबसे ज्यादा खामियाजा वित्त मंत्री को भुगतना होता है तो नाराजगी प्रधानमंत्री को झेलनी होती है.

अमित शाह की कोशिश!

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की यह कोशिश है कि छोटे से छोटे दलों को भी अपने साथ जोड़ कर रखा जाए, उनकी नाराजगी दूर की जाए. इस समय एनडीए में 45 दल हैं. 2019 का चुनावी बिगुल बजा नहीं है फिर भी बीजेपी  ने नए साथियों की तलाश शुरू कर दी है. सूत्रों का कहना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने राज्य इकाईयों के प्रमुखों से संभावित दोस्तों की लिस्ट तैयार करने को कहा है.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी  ने ऐसी ही रणनीति अपनाई थी. माना जाता है कि बीजेपी की इतनी बड़ी जीत के पीछे क्षेत्रीय दलों से गठबंधन का बड़ा हाथ था. जब से यूपी में सपा-बसपा ने हाथ मिलाया है तब से बीजेपी  की चिंता काफी बढ़ गई है क्योंकि यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं जो किसी पार्टी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचा सकती है. इसीलिए शाह ने यूपी में मिशन 74 का नारा दिया है. पिछले चुनाव से एक सीट ज्यादा जीतने का नारा. लेकिन क्या यह गठबंधन बिना संभव है?

ऐसे में पार्टी यह कोशिश कर रही है कि न सिर्फ अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को जोड़कर रखा जाए बल्कि एनडीए के कुनबे को और मजबूत भी किया जाए. ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह गठबंधन धर्म निभाकर घोर विरोधी विचारधारा वाले दलों को भी साथ में शामिल किया जा सकता है. इसलिए बीजेपी को छोटे दलों के साथ गठबंधन के दरवाजे और दिल दोनों खुला रखना होगा. क्योंकि 2019 में 2014 जैसी सफलता आसान नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली के मुताबिक ‘गठबंधन सरकार चलाने में वाजपेयी का व्यवहार बहुत काम आया. वाजपेयी के हर राजनीतिक दल में अच्छे रिश्ते रहे. उनको महागठबंधन में महारत हासिल थी. वह कैबिनेट की बैठक में भी बहुत कम बोलते और हर एक की बात सुनते थे.

बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली कहते हैं “ बीजेपी पहले भी अटल जी के बताए रास्ते पर चल रही थी, अब भी चल रही है और आगे भी चलती रहेगी. चाहे उनकी विकास परियोजनाएं हों या फिर गठबंधन नीति हो. अटल जी के समय पार्टी का जो उभार हो रहा था वो पीएम नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में निखरकर सामने आ गया है. हमारे वरिष्ठ नेताओं ने हमेशा अपने गठबंधन साथियों को खुश रखा है और आगे भी रखेंगे.”

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कैसे और कहां से होगी भरपाई?

-गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों जैसे पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर, ओडिशा में उसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य में उसे सीटें कम होने की चिंता सता रही है. क्योंकि यहां बीजेपी विरोधी गठबंधन मजबूत नजर आ रहा है.

-आंध्र प्रदेश में टीडीपी की भरपाई जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस कर सकती है और महाराष्ट्र में शिवसेना की भरपाई एनसीपी से हो सकती है. बिहार में अगर उपेंद्र कुशवाहा आरजेडी के साथ जाते हैं तो इसकी भरपाई अन्य छोटे दलों से हो सकती है.

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