हिंदी न्यूज़ – अफसरगिरी के बाद नेतागिरी में कितने पास और कितने फेल, Bureaucracy in Indian politics, Arvind Kejriwal, Shashi Tharoor, Captain Amarinder

आईएएस, आईपीएस, आईएफएस हों या फिर सेना और खुफिया एजेंसी के अफसर. रिटायरमेंट के बाद दर्जनों अफसरों ने नेतागिरी में भी हाथ आजमाय हैं. शशि थरूर, अजीत जोगी, यशवंत सिन्हा, अरविन्द केजरीवाल, सत्यपाल सिंह हों या फिर सेना के अफसर वीके सिंह, कैप्टन अमरिंदर सिंह, राजवर्धन सिंह राठौढ़, भूषण चंद्र खंडूरी या फिर रॉ के पूर्व प्रमुख संजीव त्रिपाठी सभी सियासी पारी खेल रहे हैं.

पीएल पूनिया, उदित राज और मीरा कुमार जैसे नामों के साथ ये फेहरिस्त बहुत लंबी हो जाती है. अभी कई और ऐसे नाम हैं जो केंद्र सरकार में मंत्री पद पर रहते हुए अपनी कामयाब सियासी पारी को अंजाम दे रहे हैं. ऐसा भी नहीं है कि अफसरगिरी के बाद नेतागिरी में सभी अधिकारियों को कामयाबी मिली हो. दर्जनों ऐसे नाम भी हैं जिन्होंने सियासत में कामयाबी न मिलने पर इससे किनारा कर लिया.

सियासत में सेना के अफसर
रिटायर्ड जनरल वीके सिंह आज केंद्र सरकार में विदेश राज्यमंत्री हैं. अन्ना आंदोलन से चमके वीके सिंह ने अपने पहले चुनाव में ही जीत दर्ज कराई थी. केन्द्र सरकार में ही दूसरा नाम है, कर्नल रिटायर्ड राजवर्धन राठौढ़ का. राठौढ़ को भी केंद्र सरकार में खेल राज्यमंत्री का पद मिला हुआ है.पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह भी सेना में रहे हैं. उत्तराखण्ड के सीएम रहे भुवन चंद खंडूरी तो मेजर जनरल के पद से रिटायर्ड होकर सियासत में आए थे.

अफसर के बाद सीएम की कुर्सी पर
कांग्रेस के अजीत जोगी और आप के नेता अरविंद केजरीवाल दो ऐसे नाम हैं, जो पहले अफसर हुआ करते थे, लेकिन सियासत में कदम रखने के बाद मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे. अरविंद केजरीवाल का तो मुख्यमंत्री बनना किसी चमत्कार से कम नहीं है.

बीजेपी में हैं रॉ के पूर्व प्रमुख
खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख संजीव त्रिपाठी अपने पद से रिटायर्ड होने के बाद बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. राजनाथ सिंह ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया था. 1972 बैच उत्तर प्रदेश कैडर के आइपीएस अधिकारी रहे संजीव त्रिपाठी कई साल तक रॉ से जुड़े रहे हैं.

केन्द्र में मंत्री तक बन रहे हैं आईएएस-आईपीएस
मुंबई पुलिस कमिश्नर रहे डॉ. सत्यपाल सिंह मानव संसाधन राज्यमंत्री हैं. केरल और दिल्ली में अफसर रहे अल्फोन्स कन्ननथानम भी केंद्र सरकार में मंत्री पद पर हैं. सांसद उदित राज भी अफसरगिरी के बाद नेतागिरी में एक चमकता हुआ नाम है. विदेश सेवा के अधिकारी रहे शशि थरूर तो नौकरी के बाद विदेश मंत्री बने थे. पीएल पूनिया ने भी आईएएस की नौकरी छोड़ सियासत में अपने आप को साबित किया. हरदीप सिंह पुरी, आरके सिंह और

यशवंत सिन्हा भी कुछ ऐसे ही नाम हैं.
अधिकारी से मंत्री बनने वालों की फेहरिस्त सिर्फ दिल्ली में ही नहीं है. यूपी ही नहीं दूसरे राज्यों में भी ऐसे दर्जनों अधिकारी हैं जो अधिकारी के पद से रिटायर्ड होकर या नौकरी छोड़कर सियासत में आए हैं. सपा नेता और कई सरकार में मंत्री रहे अहमद हसन पहले आईपीएस अधिकारी हुआ करते थे.

इनकी अफसरगिरी तो चली लेकिन नेतागिरी नहीं
एडीजी अजय सिंह ने रिटायरमेंट के बाद समाजसेवा के नाम पर जोर-शोर से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की. शुरुआती दिनों में तो वह काफी सक्रिय दिखे, लेकिन यह सक्रियता कुछ दिनों तक ही सीमित रही.

पूर्व आईजी मंजूर अहमद ने नौकरी के बाद कांग्रेस की सदस्यता स्वीकारी और पहले कांग्रेस के टिकट पर लखनऊ से मेयर का चुनाव लड़ा. हारने के बाद वह कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का भी चुनाव लड़े, लेकिन हार गए. कांग्रेस छोड़ बीएसपी में गए, लेकिन बहुत दिनों तक वहां भी नहीं रह पाए और सियासत से किनारा कर गए.

पूर्व पीपीएस शैलेंद्र कुमार सिंह कांग्रेस से लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन हार गए.  वर्तमान में एनजीओ चला रहे हैं. पूर्व पीसीएस बाबा हरदेव सिंह भी कई साल सियासी पारी खेलने के बाद किनारा कर गए हैं.

पूर्व आईजी एसआर दारापुरी ने रिटायर होने के बाद दलितों के उत्थान की राजनीति शुरू की. राबर्ट्सगंज सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. वर्तमान में ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) से जुड़े हुए हैं.

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