हिंदी न्यूज़ – क्या होता है हाउस अरेस्ट, ये आम गिरफ्तारी से कितना अलग…what is house arrest, how it different from arrest

देश के अलग अलग शहरों से गिरफ्तार किए गए पांच बुद्धिजीवियों को सुप्रीम कोर्ट ने छह सितंबर तक नजरबंद रखने के आदेश दिए हैं. जिन लोगों को हाउस अरेस्ट किया गया है, उनमें वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस शामिल हैं. आखिर क्या होती है ये नजरबंदी, जिसे हाउस अरेस्ट भी कहा जाता है.

क्या हाउस अरेस्ट
इसका मतलब ये है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसके घर पर ही रखा जाता है. उसे थाने या जेल नहीं ले जाया जाता. वो हाउस अरेस्ट के दौरान अपने घर पर ही रहेगा. घर के बाहर पुलिस का पहरा होगा. वहीं से उस पर नजर रखी जाएगी.

क्या इसका आईपीसी में उल्लेख हैआईपीसी में हाउस अरेस्ट यानि नजरबंदी का कोई उल्लेख नहीं है और ना ही सीआरपीसी में इसके बारे में कुछ कहा गया है.

ये भी पढ़ें – …तब अमेरिका और ब्रिटेन से ज्यादा धनवान था भारत

किस बात पर पाबंदी होती है
हाउस अरेस्ट के दौरान फोन और मोबाइल संपर्क खत्म किए जा सकते हैं. बाहरी लोगों से मिलने और बात करने पर आमतौर पर पाबंदी होती है. केवल अपने घर के लोगों और वकील से बातचीत की इजाजत होती है.

इंटरनेट इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगा दी जाती है. इसका इस्तेमाल भी अनुमति पर हो सकता है. नजरबंदी के दौरान घर पर कॉल्स आ तो सकती है लेकिन उसको उठाकर सीधे बात करने की मनाही होती हैं. उन्हें रिकार्डर से जोड़ दिया जाता है. जिनकी पुलिस अधिकारी जांच करते हैं.

हाउस अरेस्ट में घर से निकलने पर मनाही
हाउस अरेस्ट में गिरफ्तार हुआ व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकल सकता. अनुमति पर ही वो घर से बाहर जा सकता है.

ये भी पढ़ें – जानें तड़का कैसे बना देता है आपकी दाल को ज्यादा हेल्दी

कैसा होता है रुटीन 
हाउस अरेस्ट के दौरान जेल मैन्यूल लागू नहीं होता. यानि सुबह देर से सोकर उठ सकते हैं. किताबें पढ़ सकते हैं. लिखने का काम कर सकते हैं. अखबार पढ़ने पर कोई पाबंदी नहीं होती और ना टेलीविजन देखने पर कोई रोक होती है. पसंद का खाना सकते हैं. इसमें खाना जेल से नहीं आता बल्कि आपको घर का खाने की छूट होती है.

ये भी पढ़ें – आखिर क्यों मचा है आर्टिकल 35A पर कोहराम? जानें पूरा मामला

किन लोगों को हाउस अरेस्ट किया जाता है
अपने देश में हाउस अरेस्ट आमतौर पर उन लोगों को किया जाता है कि जो राजनीति से जुड़े होते हैं. घरों के अंदर ऐसे उपकरण भी लगाए जा सकते हैं जिससे हाउस अरेस्ट शख्स पर नजर रखी जा सके. लेकिन हाउस अरेस्ट के मामले बहुत कम होते हैं. वैसे दुनियाभर में सरकारें अपने विरोधियों को हाउसअरेस्ट करती रही हैं. म्यांमार में आंग सान सू की 10 सालों से कहीं ज्यादा समय तक अपने घर में नजरबंद रहीं.

Bhima Koregaon case, voices of protests raise from political circles to social institutions, evidence found in Bhima Koregaon case, भीमा-कोरेगांव केस, राजनीतिक गलियारों से लेकर सामाजिक संगठनों तक उठे विरोध के स्वर, भीमा-कोरेगांव मामले में मिले सबूत

भीमा-कोरेगांव मामला: राजनीतिक गलियारों से लेकर सामाजिक संगठनों तक विरोध के स्वर हुए मुखर
(image credit: PTI)

पहली बार कब हुआ
- पहली बार जजों ने नजरबंदी को जेल के विकल्प में 17वीं शताब्दी में. 1633 में गैलिलियो को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया था.
- अमेरिका में 20वीं सदी के आखिर में मॉनिटर करने वाले इलैक्ट्रॉनिक डिवाइस के आने के बाद घर में ही नजरबंद करने के मामले ज्यादा हो गए.
-इलैक्ट्रॉनिक डिवाइस के साथ अमेरिका में 1983 में हाउस अरेस्ट की पहली सजा कोर्ट ने सुनाई थी.

चर्चित हाउस अरेस्ट
- म्यांमार में आंग सान सू की को अपने देश में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के चलते जुलाई 1989 से लेकर नवंबर 2010 तक हाउस अरेस्ट रखा गया था. छह साल बाद 1995 में उन पर से नजरबंदी हटाई गई लेकिन वर्ष 2000 में फिर उन्हें हाउस अरेस्ट कर दिया गया. दो साल बाद वो रिहा हुईं लेकिन सरकार की आलोचना करने पर वर्ष 2003 में फिर नजरबंदी में भेज दी गईं. कुल मिलाकर वो 14 सालों तक हाउस अरेस्ट रहीं.
– कंबोडिया के पूर्व राष्ट्रपति पोल पाट को वियतनाम के हमले के बाद नजरबंद कर दिया गया
- 05 जनवरी 2005 को चिली के पूर्व तानाशाह आगुस्तो पिनोचेज नजरबंद कर दिया गया.
– चीन में ये काम बडे़ पैमाने पर होता है. चीन के राजनीतिक विद्रोहियों और असंतुष्टों को आमतौर पर उनके घरों में कैद कर दिया जाता है. इसमें चीन की बड़ी से बड़ी शख्सियतें शामिल रही हैं.
- इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुहार्तो को एक साल के लिए वर्ष 2000 में एक साल के लिए नजरबंद कर दिया गया था.
– इटली में हाउस अरेस्ट बहुत सामान्य है. अमेरिका में सिविल राइट्स एक्टिविस्ट को हाउस अरेस्ट किया जाता रहा है.

ये भी जानें
अरेस्ट वॉरंट या गिरफ़्तारी के आदेश
किसी अभियुक्त को गिरफ्तार करने के लिए कोर्ट अरेस्ट वॉरंट यानि गिरफ्तारी का आदेश जारी करता है. अरेस्ट वारंट के तहत संपत्ति की तलाशी ली जा सकती है. उसे जब्त किया जा सकता है. अपराध किस तरह का है, उसके आधार पर यह जमानती और गैर-जमानती हो सकता है.
संज्ञेय अपराध की सूरत में पुलिस अभियुक्त को बिना अरेस्ट वॉरंट के गिरफ़्तार कर सकती है. पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर अदालत में पेश करना होता है.

सर्च वारंट 
सर्च वॉरंट वह कानूनी अधिकार है जिसके तहत पुलिस या फिर जांच एजेंसी को घर, मकान, बिल्डिंग या फिर व्यक्ति की तलाशी के आदेश दिए जाते हैं.
पुलिस इसके लिए मजिस्ट्रेट या फिर जिला कोर्ट से इजाजत मांगती है. अपराध के सबूतों का पता लगाने के लिए कोर्ट से इसकी इजाजत मांगी जाती है. अपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 91, 92 और 93 के तहत जांच एजेंसी इसकी इजाजत मांगती है. अगर पुलिस अपने क्षेत्र से बाहर सर्च वॉरंट चाहती है तो उसे स्थानीय कोर्ट से संपर्क करना होता है.

ट्रांजिट रिमांड या प्रत्यर्पण की मांग
इसमें गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर अभियुक्त को संबंधित कोर्ट में पेश करना होता है. अगर गिरफ़्तारी क्षेत्र से बाहर हुई हो या फिर कोर्ट में प्रस्तुत करने में वक्त ज्यादा लग सकता है. ऐसी सूरत में स्थानीय कोर्ट में ट्रांजिट रिमांड के लिए पेशी की जाती है. सीआरपीसी की धारा 76 के मुताबिक यह जरूरी होता है. मजिस्ट्रेट कोर्ट से ट्रांजिट रिमांड मिलने के बाद ही पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को अपने क्षेत्र में ले जा सकती है.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *