हिंदी न्यूज़ – Opinion: पंजाब के सियासी मैदान का ‘कप्तान’ बनने की तैयारी में सिद्धू- is Navjot Sidhu Planning to be Captain of Punjab

नवजोत कौर
गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले में जज रणजीत सिंह कमिशन की रिपोर्ट पंजाब विधानसभा के पटल पर रखे जाने के बाद सियासी भूचाल आ गया. रिपोर्ट में न सिर्फ तत्कालीन अकाली भाजपा सरकार की भूमिका को संदेह के घेरे में रखा गया है, बल्कि अकालियों और डेरे के बीच लिंक का भी ज़िक्र है. इसके साथ ही कोटकपुरी और बहबलकलां की हिंसा के लिए पंजाब पुलिस को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. जाहिर है इस रिपोर्ट पर हंगामा तो होना ही था और यह भी तय था कि अकाली खुद को बेकसूर बताएंगे और कांग्रेस सरकार उन्हें घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी.

ये बात बतानी इसलिए ज़रूरी थी, क्योंकि ये उस कहानी की एक भूमिका भर है, जिसकी सियासी ज़मीन पंजाब में तैयार हो रही है और शायद नवजोत सिंह सिद्धू भी इसी पल का इंतज़ार कर रहे थे. बादल परिवार से उनकी तल्खी जगज़ाहिर है. बीजेपी छोड़ने के पीछे एक कारण यह परिवार भी था. गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले को लेकर सदन में जो हंगामा हुआ, उसमें सबसे ज्यादा शोर पंजाब सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ही मचाते दिखे. इस दौरान कई बार वह अमर्यादित भी होते दिखे. सिद्धू अपने अंदाज़ में शेर-ओ-शायरी करते हुए प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर बादल को घेरते और बिक्रम मजीठिया को फ्लाइंग किस करते दिखाई दिए.

मामला काफी संवेदनशील है और इसी वजह से सदन में अकाली-बीजेपी, आप और कांग्रेस यानी सभी पार्टियां इस पर गंभीर चर्चा कर रही थीं. हालांकि इस दौरान सिद्धू का अंदाज़-ए-बयां कुछ और ही था या कहें कि मुद्दे को उठाने का तरीका अपने अंदाज़ में था. कहना गलत नहीं होगा कि वह अपने इसी अंदाज़ के लिए जाने भी जाते हैं.बादल परिवार को घेरते हुए सिद्धू ने उन पर ‘धर्म के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण’ का सीधा आरोप लगाया. विपक्ष के वॉकआउट के बाद सिद्धू को बिल्कुल खुला मैदान मिल गया, तो उन्होंने सियासी बल्ले से बयानों के चौके-छक्के मारने शुरू कर दिए. ज़ाहिर है सरकार उनकी है और रिपोर्ट में पिछली बादल सरकार की भूमिका संदिग्ध बताई गई है. सिद्धू के लिए यह मौका अच्छा था.

सिखों की भावनाओं को समझाते हुए सिद्धू ने गुरु ग्रंथ साहिब की अहमियत बताते हुए इसे सिख कौम के लिए काला अध्याय और कलंक बताया. उन्होंने बाबा फरीद, रविदास, साईं बाबा, संत कबीर दास, विट्ठल नामदेव का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘न हिंदू, न मुसलमान. ये है पंजाब मेरी जान’. यानी ये साफ बताया कि एक तरफ नफरत और धर्म की सियासत है और दूसरी तरफ देशसेवा और कौम के लिए गुरुओं का संदेश. इसके जरिये उन्होंने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि दिखाने की कोशिश भी की.

अब ज़रा सिद्धू का वो अंदाज़ याद कीजिए, जब वह तमाम विवादों को नज़रअंदाज़ करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में पहुंचे. वहां वह जनरल बाजवा के गले भी मिले और उसे सही करार देते हुए न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि भारत वापस आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की और गले लगाने का कारण भी बताया, गुरु नानक देव के 550वें जन्मदिवस के मौके पर डेरा बाबा नानक से करतारपुर तक रास्ता खोलने की बात कही.

सिद्धू के पास शब्दों की कमी नहीं है और ना ही उन्हें अपने लिए किसी प्रवक्ता की ज़रूरत है, जो उनके किए काम पर सफाई दे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहली बार कागज़ से पढ़ते हुए सिद्धू ने बड़े सधे लफ्ज़ों में कहा, ‘सरहद तो अटल बिहारी वाजपेयी ने भी पार किया था, नरेंद्र मोदी ने भी. गोलियां तब भी चल रही थीं और अब भी चल रही हैं, लेकिन दोनों नेताओं की मंशा तनाव कम करने की थी, मेरा भी मकसद यही है. इमरान मेरे दोस्त है और मुझे उम्मीद है कि रिश्तों पर जमी बर्फ बातचीत के ज़रिये पिघल सकती है.’

सिद्धू की ये पाकिस्तान यात्रा भी दो संदेश देती है. पहला सिखों और पंजाब के लिए धार्मिक यात्रा का जो उनकी भावनाओं से जुड़ा है और दूसरा भारत और पाकिस्तान में बातचीत का. अब सिद्धू का ये अंदाज़-ए-बयां और बॉडी लैंग्वेज बहुत कुछ कह गया. सदन में कैप्टन अमरिंदर की तारीफ, गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर विपक्ष को खरी खरी, सरहद पार से देश और पंजाब को भावुक और सियासी संदेश.

इंसान महत्वाकांक्षी होता है और ये गलत भी नहीं है, क्योंकि ये महत्वाकांक्षा ही इंसान के लिए जीत के नए रास्ते खोलती है. ऐसे में सिद्धू के इस रुख से सवाल उठ रहा है कि क्रिकेट से राजनीति में आया यह नेता क्या खुद को कप्तान की कुर्सी के लिए तैयार कर रहा है या फिर कोई बड़ी सियासी पारी की तैयारी में है?

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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