हिंदी न्यूज़ – सुप्रीम कोर्ट का फैसला, समलैंगिकता अब अपराध नहीं, जानिए कब क्या हुआ…

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने गुरुवार को एकमत से भारतीय दंड संहिता के 158 साल पुराने Section 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना अपराध था. अदालत ने कहा कि यह प्रावधान संविधान में प्रदत्त समता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने परस्पर सहमति से स्थापित अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे में रखने वाले, Section 377 के हिस्से को तर्कहीन, सरासर मनमाना और बचाव नहीं करने योग्य करार दिया.

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जानिए कब क्या हुआ?2001: समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक संस्था नाज़ फाउंडेशन ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की. याचिका में मांग की गई थी कि आपसी सहमति से अगर दो वयस्क समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो उसे अपराध न माना जाए.

2 सितंबर 2004ः समलैंगिक संबंधों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट्स ने पुनर्विचार याचिका डाली.

3 नवंबर, 2004: हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया.

दिसंबर, 2004: समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की.

3 अप्रैल, 2006: सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हाईकोर्ट को फिर से विचार करने के लिए कहा और इसे हाईकोर्ट को वापस कर दिया.

4 अक्टूबर, 2006: हाईकोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का विरोध करने वाली वरिष्ठ बीजेपी नेता बीपी सिंहल द्वारा दायर की गई याचिका पर विचार करने की अनुमति दे दी.

18 सितंबर, 2008: केंद्र ने इस मुद्दे पर कोई फैसला लेने के लिए और समय मांगा क्योंकि गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के विचारों में विरोधाभास था. हाईकोर्ट ने याचिका को नामंज़ूर कर दिया और कोर्ट में अंतिम बहस शुरू हो गई.

25 सितंबर, 2008: समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट ने कहा कि सरकार इसे अपराध घोषित करके समलैंगिक लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं कर सकती.

26 सितंबर 2008ः स्वास्थ्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में अलग-अलग शपथ पत्र दाखिल करने की वजह से हाईकोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाई.

26 सितंबर 2008ः केंद्र सरकार ने कहा कि समलैंगिक संबंध अनैतिक हैं और विकृत मानसिकता की पहचान हैं. इसको अपराध की श्रेणी से हटा देने की वजह से सोसायटी में गिरावट आएगी.

15 अक्टूबर, 2008: हाईकोर्ट ने इस मामले में धर्म के आधार पर तर्क देने के लिए केंद्र को फटकार लगाई और कहा कि वो वैज्ञानिक तर्कों के साथ आए.

नवंबर, 2008: सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि इस मामले में फैसला लेने का अधिकार मूल रूप से संसद के पास है.

7 नवंबर 2008ः हाईकोर्ट ने समलैंगिक अधिकारों के लिए दाखिल की गई याचिका पर फैसला देने का अधिकार सुरक्षित रखा.

2 जुलाई, 2009: हाईकोर्ट ने समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट की याचिका को अनुमति दे दी और आपसी सहमति से बनाने जाने वाले समलैंगिक संबंधों को वैधानिक घोषित कर दिया.

9 जुलाई, 2009: दिल्ली के एक ज्योतिषी सहित कई धार्मिक संस्थाओं ने, योग गुरु रामदेव के शिष्य आदि ने भी इस फैसले का विरोध किया.

15 फरवरी, 2012: सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सुनवाई शुरू कर दी.

27 मार्च, 2012: सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को सुरक्षित रखा.

11 दिसंबर, 2013: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 2009 में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने वाले फैसले पर रोक लगा दिया.

20 दिसंबर, 2013: समलैंगिक संबंधों पर रोक वाले फैसले के खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की..

28 जनवरी, 2014: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा इसके समलैंगिक संबंधों पर रोक लगाने वाली फैसले की पुनर्विचार याचिक को खारिज कर दिया.

22 अप्रैल, 2014: नाज़ फाउंडेशन द्वारा क्यूरेटिव पेटीशन डाले जाने के बाद अपने सामने मामले को पेश करने को कहा.

18 दिसंबर, 2015: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाला निजी सदस्य बिल पेश किया. बीजेपी बाहुल्य वाली लोकसभा में बिल का विरोध हुआ.

2 फरवरी, 2016: सुप्रीम कोर्ट ने सीजेआई से क्यूरेटिव पेटीशन पर विचार करने के लिए पांच जजों की एक संवैधानिक बेंच बनाने की सिफारिश की.

29 जून, 2016: सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 में पांच एलजीबीटी समुदाय के लोगों द्वारा दाखिल की गई याचिका पर विचार करने के लिए संवैधानिक बेंच गठित करने के लिए कहा. याचिका में कहा गया था कि राइट टू सेक्सुअलटी, यौन स्वतंत्रता के अधिकार और सेक्सुअल पार्टनर चुनने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार माना जाए. इसमें कहा गया था कि धारा 377 इसका उल्लंघन करता है.

22 जुलाई, 2016: धारा 377 को चुनौती देने वाली एक याचिका ट्रांसजेंडर समुदाय के द्वारा दाखिल की गई.

10 जुलाई, 2018: धारा 377 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू की.

17 जुलाई, 2018: सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित किया.

6 सितंबर, 2018: सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया

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