हिंदी न्यूज़ – सरकार को घेरना या शक्ति प्रदर्शन, भारत बंद पीछे राहुल का मकसद क्या था?-What was Aim of Rahul Gandhi behind Bhart Bandh

(नवजोत कौर)

भारत बंद यानी हड़ताल और नाराजगी, जो हमेशा सरकार के ही खिलाफ होती है. देश में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों और डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपये को लेकर भारत बंद बुलाया गया था. जाहिर है इसकी अपील भी विपक्ष ही करती है, जो हर पल सरकार की नीतियों को कोसता रहता है. वैसे इसे ही एक मजबूत विपक्ष भी कहते हैं, जो सरकार को उसके गलत कामों (फैसलों)/ नीतियों के लिए सचेत करे. ऐसा पहले भी होता आया है. यूपीए के समय भी बीजेपी इन्ही मुद्दों को लेकर सड़कों पर थी.

लेकिन आज के भारत बंद को देख कर सवाल उठता है कि बंद किसके लिए?

बंद के दौरान एक बच्ची सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाई और उसकी मौत हो गई. पटना में जनअधिकार पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपनी गाड़ी से जा रहे लोगों पर हमला किया और गाड़ियां तोड़ी. उज्जैन में कांग्रसी कार्यकर्ताओं ने पेट्रोल पंप पर लोगों से और कर्मचारियों से मारपीट की और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. दोनों ही जगहों पर पार्टी के सर्वोच्च नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं का यह कह कर बचाव किया कि ये महंगाई से त्रस्त जनता का आक्रोश है जो सामने आया है.हालांकि, तमाम पार्टियों द्वारा शांतिपूर्ण बंद बुलाया गया था. अब यहां सवाल उठता है कि यह बंद जनता के लिए था या पार्टियों के लिए? क्योंकि कम से कम जनता तो कार्यकर्ताओं की हिंसा की शिकार ही हुई है.

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा कि 21 विपक्षी पार्टियां इस बंद में शामिल हो रही हैं. हालांकि, शामिल 20 पार्टियां ही हुई. बंद के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, मोदी सरकार को कोसते हुए सुनाई दिए कि अब पूरा विपक्ष एकजुट होकर सरकार को उखाड़ फेंकेगा. सवाल ये भी कि यह बंद राहुल गांधी का शक्ति प्रदर्शन था या जनता के लिए इंसाफ की मांग को लेकर आवाज़ उठाई गई थी?

बंद से किसे क्या मिला?

राहुल गांधी मंच से चीख-चीख कर इस बात को दोहरा रहे थे कि सरकार ने उद्योपतियों को फायदा पहुंचाया, राफेल पर सरकार के पास कोई जवाब नहीं है, किसान त्रस्त हैं. लेकिन राहुल मंच से पेट्रोल और डीजल के महंगे होने के फॉर्मूले को समझा नहीं पाए और जनता को इससे कैसे निजाद मिल सकती है ये भी नहीं बता पाए. हां विपक्ष एकजुट जरूर था तो साफ है कि बंद का मकसद सिर्फ शक्ति प्रदर्शन ही था. जनता को पेट्रोल-डीजल से फिलहाल राहत नहीं मिलने वाली.

अब जरा इस पर भी गौर कीजिए कि विपक्ष कितना एकजुट है? मंच से सपा और बसपा नदारत थे, ममता बनर्जी विरोध में तो थी लेकिन सड़कों पर नहीं. यूपीए की सहयोगी लेफ्ट भी विरोध में थी, लेकिन रास्ता अलग था. हां आम आदमी पार्टी के संजय सिह मंच से मोदी सरकार पर गरजते नजर आए तो सवाल अब ये कि 2019 के लिए क्या महागठबंधन की रुपरेखा तैयार हो पाएगी? कहावत है कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा, तो फिलहाल तो बिखरे ईंट-रोड़ों को जोड़ने के लिए एक मजबूत सीमेंट की जरुरत है और वो कब और कैसे मिलेगा कहा नही जा सकता.

वैसे ऐसा भी नहीं है कि महंगाई को लेकर इससे पहले प्रदर्शन नहीं हुए, हर बार विपक्ष ने सड़कों पर खूब तांडव बिखेरा है और सड़क और बंद से कई बार सत्ता के रास्ते भी निकले हैं, लेकिन जनता हमेशा की तरह इस बार भी खाली हाथ है.

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