हिंदी न्यूज़ – OPINION: क्यों राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी एक मत नहीं है?- OPINION | Why Family Line on Releasing Rajiv Gandhi Killers is Not the Party Line

(टीएस सुधीर)

कांग्रेस का मतलब गांधी परिवार नहीं है और न ही गांधी परिवार का मतलब कांग्रेस है. तमिलनाडु की ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक मुनेत्र कड़गम (AIADMK) सरकार की पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को छोड़े जाने की सिफारिश को लेकर कांग्रेस के रुख को इन्हीं बातों से समझा जा सकता है. पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ये साफ कर दिया कि आतंकवाद और आतंकवादियों पर कोई समझौता नहीं हो सकता है, और ये हत्या आतंकवादी साजिश के तहत की गई थी.

रविवार को तमिलनाडु सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को छोड़े जाने के लिए राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित से सिफारिश करने का फैसला किया. कहा गया कि राज्य सरकार सभी 7 दोषियों की रिहाई के लिए राज्यपाल से सिफारिश करेगी. राज्यपाल को भेजी गई सिफारिश में आजीवन कारावास की सजा काट रहे वी. श्रीहरण उर्फ मुरुगन, संथम, एजी पेरारिवलन, जयकुमार, पी. रविचंद्रन, रॉबर्ट पायस और नलिनी को रिहा करने के लिए कहा गया है. ये सब पिछले 27 साल से सज़ा काट रहे हैं. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव सभा के दौरान एक आत्मघाती महिला ने विस्फोट करके हत्या कर दी थी. इस आत्मघाती विस्फोट में राजीव गांधी के अलावा 14 लोगों की और मौत हुई थी जिसमें कांग्रेस के कार्यकर्ता और पुलिसवाले थे.

संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत, भारत के राष्ट्रपति और राज्यों के गवर्नर किसी की सजा को खत्म कर सकते हैं या माफ कर सकते हैं. 6 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल से राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी करार दिए गए एजी पेरारिवलन की दया याचिका पर विचार करने को कहा था. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वो राजीव गांधी हत्याकांड के 7 दोषियों को रिहा करने के तमिलनाडु सरकार के प्रस्ताव का समर्थन नहीं करती है, क्योंकि इन मुजरिमों की सजा की माफी से ‘खतरनाक परंपरा’ की शुरुआत होगी.पिछले दिनों राहुल और प्रियंका गांधी ने कहा था कि उन्होंने अपने पिता के हत्यारों को माफ कर दिया है. लेकिन ये मानवीय आधारों पर परिवार का फैसला है.

यहां ये तर्क दिया जा रहा है कि एक राजनीतिक संगठन के तौर पर कांग्रेस भावनात्मक विचार नहीं रख सकती वो भी तब जबकि पार्टी के अध्यक्ष इसके शिकार हुए थे. यहां एक चिंता ये भी है कि अगर कांग्रेस इस मुद्दे पर गांधी परिवार का समर्थन करती है तो आरोप लगाया जाएगा कि कांग्रेस आतंकवादियों को लेकर नरम है. कांग्रेस को डर है कि ऐसे में बीजेपी आतंकवाद और राष्ट्रवाद के मुद्दे का फायदा उठा सकती है.

कांग्रेस की तमिलनाडु इकाई इस मामले पर अलग-अलग राय रखती है. टीएनसीसी के पूर्व प्रमुख ईवीकेएस एलांगोवन ने कहा कि कांग्रेस में इसको लेकर कोई भ्रम नहीं है क्योंकि गांधी ने दोषी को माफ़ कर दिया है. चेन्नई स्थित कांग्रेस प्रवक्ता खुशबू सुंदर का मानना है कि इन्हें रिहा करना सही कदम है, लेकिन इन्हें चुनाव से पहले इनकी रिहाई पर थोड़ा संदेह है. दूसरी तरफ, राज्य इकाई के अध्यक्ष एस थिरुनवुक्करसर का मानना है कि रिहाई एक गलत मिसाल पेश करेगी.

दिलचस्प बात ये है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक पक्ष वही हैं जो बीजेपी का है. यानी उन्हें रिहा नहीं किया जाना चाहिए. एनडीए सरकार ने कई बार ये दोहराया है कि वो अभियुक्तों के रिहाई के पक्ष में नहीं है. साल 2016 में भी जब जयललिता ने कहा कि वो अभियुक्तों को रिहा करने के लिए तैयार थीं, तो केंद्र ने उस वक्त भी मना कर दिया था. बीजेपी का तर्क है कि ये मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है. ये एक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र था और उसे माफ करना गलत परंपरा का हिस्सा है. इससे ऐसा लगेगा कि भारत एक नरम राज्य है जो पूर्व प्रधानमंत्री को मारने वाले आतंकवादियों को माफ करने के लिए तैयार है.

तमिलनाडु में एक और चिंता ये है कि अगर इन्हें माफ कर दिया जाता है तो कुछ लोग इसका जश्न भी मना सकते हैं. ये सारे लोग युवाओं के रोल मॉडल साबित हो सकते हैं.

इस मुद्दे पर दोनों राष्ट्रीय दलों का रुख क्षेत्रीय राजनीतिक को प्रभावित कर सकती है. खास कर कांग्रेस के लिए ये मुद्दा काफी पेंचीदा है. कांग्रेस की सहयोगी DMK ने इस मुद्दे पर AIADMK का समर्थन किया है. DMK की राय ये है कि जेल लोगों को सुधारने के लिए हैं जिसने अपराध किया है.

माना जा रहा है कि इसके बहाने जैन आयोग की रिपोर्ट का मुद्दा एक बार फिर से उठ सकता है. साल 1997 में जैन आयोग ने कहा था कि एम करुणानिधि और DMK 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के बाद भी एलटीटीई को प्रोत्साहित कर रहे थे. ये अहम है कि सात में से पांच दोषी श्रीलंका के नागरिक हैं और उनमें से कुछ एलटीटीई में अहम पोस्ट पर थे. इस मुद्दे पर DMK का रुख आतंकवादी संगठन के लिए सहानुभूति वाला माना जाएगा. हालांकि DMK और कांग्रेस ने सत्ता के लिए पहले भी हाथ मिलाया है लेकिन चुनावी साल में इस गठबंधन पर असर पड़ सकता है और तमिलनाडु में नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं.

AIADMK सरकार अपने पूर्व मुखिया जयललिता की इच्छा के मुताबिक काम कर रही है. लेकिन वो इसे चुनावी समीकरणों के हिसाब से भी दिख रही है. चुनाव में AIADMK को इसका फायदा मिल सकता है.
मानवीय स्टैंड लेना थोड़ा अजीब होगा. इस साल मई में तुतीकोरिन के 13 स्थानीय लोगों की इसलिए मार दिया गया क्योंकि वो स्वच्छ वायु और पानी की मांग कर रहे थे. ये भी कहा जा रहा है कि अगर ये हत्यारे तमिल नहीं होतो तो क्या AIADMK सरकार इऩ्हें बचाने के लिए सामने आती? ये साफ है कि सभी संगठन वोट की राजनीति कर रही है.

लेकिन ये साफ है कि राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित कोई भी फैसला केंद्र से सलाह लेने के बाद ही लेंगे. ये सिर्फ राजीव गांधी का केस नहीं है विस्फोट में मारे गए बाक़ी लोग भी इसके खिलाफ आवाज़ उठा सकते है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनकी निजी राय है)

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