हिंदी न्यूज़ – OPINION: राहुल के लिए पीएम मोदी हैं बड़ी चुनौती, चुनाव जीतने के लिए अपनाने होंगे नए तरीके-Narendra modi is a big challenge for rahul, in lok sabha election 2019

News18.com

Updated: September 12, 2018, 11:27 AM IST

(आशुतोष)

2019 के लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. हर किसी की ज़ुबान पर एक ही बात है कि क्या मोदी सरकार दुबारा सत्ता में वापस आएगी या नहीं. पिछली बार की बात और थी जब 2014 के चुनावों में लगभग स्पष्ट था कि मोदी को बढ़त मिलेगी और कांग्रेस को नुकसान होगा. लेकिन इस बार परिस्थितियां ऐसी नहीं है. हालांकि बीजेपी को नुकसान होने से कांग्रेस को फायदा होगा ऐसी बात नहीं है. आगामी लोकसभा चुनाव दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण है.

राहुल गांधी हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैंठ सकते क्योंकि न सिर्फ इस चुनाव में सिर्फ कांग्रेस का भविष्य है बल्कि नेहरू गांधी परिवार का अस्तित्व भी दांव पर लगा है. माना जाता रहा है कि गांधी परिवार हमेशा कई धड़ों को एकसाथ लेकर चलने का काम करता रहा है. कांग्रेस का हारना आरएसएस के लिए फायदेमंद होगा क्योंकि कमज़ोर कांग्रेस ही अततः उसका लक्ष्य है.

ये भी पढ़ेंः …तो इस तरह राहुल गांधी पर ‘दबाव’ बना रही हैं बसपा सुप्रीमो मायावती!यह संयोग मात्र नहीं है कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते रहे हैं. घटना 29 अक्टूबर 2013 की है. नरेद्र मोदी उस वक्त प्रधानमंत्री के उम्मीदवार थे. सरदार वल्लभ भाई पटेल स्मृति स्मारक के उद्घाटन का मौका था जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपस्थिति में नेहरू की आलोचना की थी. उन्होंने कहा था, कि अगर नेहरू की जगह पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो आज का भारत कुछ और ही होता. हर भारतीय को इतिहास की इस घटना से दुख है. हालांकि मनमोहन सिंह ने इस बात का सिर्फ इतना कहकर उत्तर दिया कि सरदार पटेल सेक्युलर थे और भारत की अखंडता में उनको विश्वास था. ऐसा कह कर उन्होंने मोदी और आरएसएस की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया.

तब से करीब साढ़े चार साल बीत चुके हैं और ये दौर जारी है. इसी साल 7 फरवरी को संसद में राष्ट्रपति को धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए पीएम मोदी ने जवाहरलाल नेहरू पर भारत के बंटवारे का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अगर पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो कश्मीर की समस्या नहीं होती.

लेकिन पटेल और नेहरू का मुद्दा उठना नया नहीं है. इसके गहरे कारण हैं. पटले कांग्रेस के सदस्य थे. वह गांधी और कांग्रेस के प्रति हमेशा वफादार रहे. गांधी ने अपने उत्तराधिकारी और प्रधानमंत्री के रूप में गांधी की पहली पसंद नेहरू थे. हालांकि पार्टी पटेल के पक्ष में थी. फिर भी न ही पटेल ने इस पर सवाल उठाया और न ही कभी विरोध किया.

गांधी की मृत्यु के बाद पटेल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि नेहरू उनके नेता हैं. यह और बात है कि दोनों नेताओं के बीच चीन और कश्मीर सहित कई मुद्दों को लेकर वैचारिक मतभेद थे लेकिन पटेल की जो बात आरएसएस को सबसे ज़्यादा पसंद आती थी वह था मुसलमानों के प्रति उनकी सोच. पटेल का मानना था कि बंटवारे के बाद मुसलमानों पर ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी देशभक्ति को सिद्ध करें लेकिन नेहरू इससे उलट मानते थे कि बहुसंख्यकों की ज़िम्मेदारी है कि वो अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करें. आरएसएस को पटेल के विचार ज़्यादा अच्छे लगे और उन्होंने नेहरू पर मुसलमानों के तुष्टीकरण का आरोप लगाया.

आरएसएस का जिस भारत का सपना था उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं था. इसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र बनाना था. लेकिन बंटवारे के बाद भी आरएसएस को इसमें सफलता नहीं मिली क्योंकि उसे नेहरू के सेक्युलरिज़म के विचारों से लड़ना पड़ा.

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इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय में कांग्रेस काफी मज़बूत थी. लेकिन 1990 में बीजेपी के मज़बूत होने के साथ ही कांग्रेस के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं. 2014 के बाद से कांग्रेस के लिए स्थितियां और भी बदल गई हैं क्योंकि अब राहुल के सामने मुकाबले के लिए मोदी जैसा मज़बूत चेहरा है.

आगामी लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व की परीक्षा है. इसलिए राहुल को अगर कांग्रेस को बचाना है तो उन्हें अपना तरीका बदलना पड़ेगा. उन्हें लोगों को सपने बेचने पड़ेंगे, पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना होगा. अगर उन्हें लगता है कि उनकी उम्र अभी कम है इसलिए वो और भी पांच साल इंतज़ार कर सकते हैं तो ये उनकी भूल साबित होगी.

(लेखक भूतपूर्व आम आदमी पार्टी के नेता और जाने-माने पत्रकार हैं)

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