हिंदी न्यूज़ – क्या 2019 के चुनावी रण के लिए RSS को तैयार कर रहे मोहन भागवत!-Mohan Bhagwat’s Thrust Towards Inclusivity Signals RSS Ready to Evolve Ahead of Election Season

(भवदीप कांग)

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के ‘भविष्य का भारत-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण‘ कार्यक्रम के आखिरी दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई मुद्दों पर अपने विचार रखें. भागवत ने संघ की तरफ से बीजेपी की राजनीति में हस्तक्षेप की बात को सिरे से खारिज तो किया, लेकिन आने वाले चुनावों को लेकर उन्होंने इशारे-इशारे में अपनी मंशा भी जाहिर कर दी. केंद्र में मोदी सरकार को साढ़े चार साल हो चुके हैं. अगले साल फिर चुनाव की बारी है. भले ही मोहन भागवत इनकार कर रहे हों, लेकिन, यह हकीकत है कि संघ ने लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी को जीताने के लिए पूरा जोर लगा दिया था. अब 2019 के लोकसभा चुनाव में भी संघ की बड़ी भूमिका देखी जा रही है.

OPINION | हिंदू ही नहीं हर भारतीय का सम्मानः गेम चेंजर साबित हो सकता है भागवत का ये बयान

कुछ खास पहलुओं के आधार पर देखें, तो आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ‘पीपी’ मोहन राव भागवत में कुछ हद तक संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की छवि दिखती है.भले ही मोहन भागवत के काम करने के तरीकें अलग हो, लेकिन आत्मीयता के मामले में उनमें अपने पूर्ववर्ती आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय बालासाहेब देवरस की झलक भी दिखती है.

‘भविष्य का भारत-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण’ कार्यक्रम के पीछे संघ का मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाना था. इस कोशिश में मोहन भागवत कामयाब हुए भी.
अपने भाषण में भागवत ने जहां एक तरफ आरक्षण का मुद्दा उठाया, धारा 370 पर बात की, तो वहीं डॉ. हेडगेवार की जीवन और उनके दर्शन को हाइलाइट करना नहीं भुले. लेकिन, भागवत गुरुजी गोलवलकर की बात भूल गए, जिन्होंने अपने जीवन और कर्म से तीन दशक तक संघ की सेवा की.

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- अवैध तरीके से धर्मांतरण गलत

मोहन भागवत का ये कदम कुछ सियासी और अनिवार्य भी था. गोवलकर ने भारत के संविधान की आलोचना की थी. जबकि, 17 सितंबर को नागपुर हेडक्वार्टर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि आरएसएस संविधान का सम्मान करता है और उसे अहमियत देता है. सरसंघचालक ने आरएसएस को खास तौर पर समावेश और गैर-सांप्रदायिकता के रूप में प्रोजेक्ट किया. साथ ही लिंगभेद और जातीय-राष्ट्रवाद के विवादित मुद्दों को हल करने को लेकर तत्परता के संकेत दिए.

मोहन भागवत ने गौ-रक्षकों की हिंसा पर अपनी राय दी. उन्होंने इसे धर्म के नाम पर किया गया अधर्म करार दिया. गोरक्षा और इससे जुड़ी हिंसा पर एक सवाल के जवाब में संघ प्रमुख ने कहा कि गोरक्षा में जुड़े लोगों को मॉब लिंचिंग से जोड़ना ठीक नहीं है. गोरक्षा कैसे होगी, इस पर भागवत ने कहा, किसी प्रश्न पर हिंसा करना अपराध है और उस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए परंतु गाय परंपरागत श्रद्धा का विषय है.

वहीं, एससी/एसटी कानून के बारे में भागवत ने कहा कि अत्याचार दूर करने के लिए एक कानून बना, यह अच्छी बात है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. उसका दुरुपयोग होता है इसलिए संघ मानता है कि उस कानून को ठीक से लागू करना चाहिए और उसका दुरुपयोग रोकना चाहिए. इस तरह से सर संघचालक ने चुनावी माहौल को देखते हुए ऐसे संघ की छवि सबके सामने रखनी चाही, तो हर मुद्दों और हर समस्याओं को लेकर चिंतित और इसका समाधान चाहता है.

वैचारिक रूप से मोहन भागवत गोवलकर से इतर बालासाहेब देवरस की ओर ज्यादा झुके नज़र आते हैं. देवरस ऐसा महसूस करते थे कि शाखा का विकास करने और पब्लिक पॉलिसी एक्टिविज़्म में ही सीमित रहने के अलावा संघ के पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है. उनके नेतृत्व में संघ के अग्रणी संगठनों जैसे वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, सरस्वती शिशु मंदिर ने समाज में काफी लोकप्रियता पाई और मजबूती से अपनी पैठ बनाई. देवरस ने भी जातिवाद और क्षेत्रवाद को दरकिनार कर सामाजिक समरसता पर जोर दिया था. भागवत ने भी अपने उद्बोधन में यही किया.

इमरजेंसी के दिनों में देवरस ने अलग-थलग पड़े आरएसएस में नई चेतना जगाई और उसे राजनीति के मुख्यधार में लेकर आए. 1980 में जनता पार्टी के छोटे से कार्यकाल के दौरान कैडर को थोड़ी बहुत प्रशासनिक शक्तियां भी मिली.

भागवत बालासाहेब देवरस की सोशल इंजीनियरिंग से भी काफी प्रभावित हैं. देवरस के कार्यकाल के दौरान संघ अगड़ी जातियों से निकलकर पिछड़ों और दलितों, आदिवासियों को एक अभियान के तहत खुद से जोड़ने की रणनीति के साथ आगे बढ़ा. भागवत भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं. भागवत के नेतृत्व में संघ परिवार काफी हद तक राजनीतिक हो गई है. अब पब्लिक पॉलिसी और पॉलिटिकल एक्टिविज्म के बीच एक बारीक लाइन है, जिसे नज़रअंदाज किया जा सकता है.

देवरस के बाद से आरएसएस ने खुद को पहले से और ज्यादा बदलते समय के साथ साथ ढाल लिया है और आगे बढ़ा है. समय के साथ-साथ संघ के विचारक जैसे भावराव देवरस (बालासाहेब के भाई), मोरपंत पिंगले, नानाजी देशमुख और केएन गोविंदाचार्य ने संघ को नए विचार दिए. इस लचीलेपन ने संघ को पहले से ज्यादा राजनीतिक, संतुलित और सूचनात्मक होने में मदद की.

इसका लाभ भी संघ को मिला. सोशल इंजीनियरिंग के इसी मंत्र से आज की भारतीय जनता पार्टी की राजनीति चलती नज़र आती है.

(राइटर सीनियर जर्नलिस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं.) 

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *