हिंदी न्यूज़ – mohan bhagwat Rss new version over 2019 loksabha elections – ये मोहन भागवत वाला RSS है… गुरुजी वाला नहीं!

राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ (RSS) के उन तमाम विरोधियों से सरसंघचालक मोहन भागवत ने सबसे बड़ा मुद्दा छीन लिया, जो बार-बार हर जगह यही कहते फिरते थे कि गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में मुसलमानों, ईसाइयों और मार्क्सवादियों को हिंदुओं का दुश्मन बताया गया है. भागवत ने साफ कहा कि ‘बंच ऑफ थॉट्स’ पढ़ने की बजाय आज के समाज को ‘श्री गुरुजी- व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ को पढ़ना चाहिए, जो कि गुरुजी के ही विचारों का संकलन है. इस किताब में हमेशा चिर-कालीन रहने वाले उनके विचार समाहित किए गए हैं.

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कहने को तो भागवत ने गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ का बचाव किया और ये कहा कि इस किताब को जब लिखा गया होगा, उस वक्त के सामाजिक हालात वैसे ही रहे होंगे. यानी संघ सुप्रीमो भागवत ने बड़ी ही चतुराई से गुरुजी की उस विवादित किताब से किनारा कर लिया, जो संघ और बीजेपी पर राजनीतिक हमले का सबसे बड़ा कारण बनती रही है. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि सरसंघचालक का ये रुख उन स्वयंसेवकों के कितना गले उतरेगा, जो सालों साल से रोज़ाना शाखा में आ रहे हैं और गुरुजी के इन ‘बंच ऑफ थॉट्स’ को आत्मसात करते रहे हैं? साफ है कि अबसे आने वाले कुछ दिनों तक शाखाओं में शारीरिक व्यायाम पर कम और बौद्धिक व्यायाम पर ज्यादा ज़ोर रहेगा.

पुराने संघी भले ही भागवत के बयानों से पसोपेश में पड़ जाएं या फिर नाराज़ ही क्यों ना हो जाएं, लेकिन एक बात तो तय है कि जो लोग आरएसएस को नहीं जानते हैं, वो जरूर इस भागवत वाली नई व्याख्या से प्रभावित हो सकते हैं!

दरअसल, तीन दिनों तक विज्ञान भवन में चला संघ का ज्ञान उन 17 से 23 वर्षीय युवाओं के लिए ज्यादा लगा, जो 2019 में पहली बार वोट डालेंगे. इन फर्स्ट टाइम वोटरों के मन में मोहन भागवत की अगुआई में संघ ने ये बात बार-बार बैठाने की कोशिश की है कि आरएसएस लोकतांत्रिक है. आरएसएस मुसलमानों की विरोधी नहीं है. ये अनुसूचित जाति के आरक्षण के हक में है. आरएसएस सबको साथ लेकर चलने वाली इन्कलूसिव और एकोमोडेटिव गैर-राजनीतिक संस्था है.

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यानी संघ से बड़ा, बेहतर और पूर्ण भारतीय कोई भी नहीं है. लेकिन, जो संस्था अपना मुखिया का चुनाव नहीं कर सकती, क्या वो पूर्णत लोकतांत्रिक कही जा सकती है?

साथ ही, जिस संस्था का चीफ मुसलमानों का नाम न लिए बगैर कहे कि देश में नई जनसंख्या नीति बनानी चाहिए और ये नीति पहले उस समाज पर लागू हो, जो लालन-पालन का इंतजाम किए बिना बच्चे पर बच्चे पैदा किए जा रहा है, क्या ये मुसलमानों को संघ के करीब ला पाएगा? इतना ही नहीं, आरएसएस का सबसे बड़ा पदेन अधिकारी यानी सरसंघचालक संघ की ही लगाई गई कक्षा में आरक्षण जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर कहे कि आरक्षण बुरा नहीं, आरक्षण पर होने वाली राजनीति बुरी है वो स्वयंसेवकों को खुश कर रहा था या नाराज़? वो ‘बुलावे पर संघ के द्वारा भेजे गये संगठन मंत्री’ की पार्टी बीजेपी की सरकार के आरक्षण संबंधी नीति को निशाने पर ले रहा था या नहीं? यही सब तो बौद्धिक के विषय होने वाले हैं आने वाले कई महीनों तक.

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पहले दिन कांग्रेस की तारीफ करना, पीएम मोदी के दिए नारे ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे की सरेआम मुखालफत और ये कहना कि हम मुक्त की नहीं युक्त की बातें करते हैं. फिर दूसरे दिन मुसलमानों को हिंदुत्व के लिए ज़रूरी बताना और आखिरी दिन बीजेपी के लिए भागवत का ये कहना कि 92 सालों से आरएसएस ने किसी भी पार्टी की राजनीतिक तौर पर कोई मदद नहीं की है, तो क्या ये सभी बयान इस चुनावी साल में मोदी-शाह की बीजेपी की मदद करेंगे? या फिर ये राहुल गांधी की ‘झप्पी वाली सियासत’ का ही दबाव था कि गुरुजी की आरएसएस अब राजनीतिक हार-जीत के दबाव में आकर भागवत की न्यू आरएसएस बन गई है, जो हर कीमत पर पॉलिटिकली करेक्ट दिखना चाहती है. जो हर कीमत पर 2019 के चुनाव पर नज़र रखकर अपना पुराना चोला (निकर) उतारकर नई ड्रेस (पैंट) पहन रही है, ताकि न्यू वोटर के सहारे बीजेपी की नैया पार लगवाई जा सके.

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