हिंदी न्यूज़ – OPINION: ‘आज समाज संघ को सुनना चाहता है और अपनी कसौटी पर कसना चाहता है’-Rashtriya Swayamsevak Sangh opinion of people are changing about RSS today everyone knows about RSS

OPINION: 'आज समाज संघ को सुनना चाहता है और अपनी कसौटी पर कसना चाहता है'

OPINION: ‘आज समाज संघ को सुनना चाहता है और अपनी कसौटी पर कसना चाहता है’
(image credit: PTI)

News18Hindi

Updated: September 23, 2018, 5:35 PM IST

(राजीव तुली)

दिल्ली में 17 से 19 सितंबर तक आरएसएस की ओर से आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान माला को लेकर जैसी अपेक्षित थी, बहुत हद तक वैसी ही प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. कुछ भी अनपेक्षित नहीं है. कई राजनीतिक संगठनों ने इसे लेकर विशाल हृदय का परिचय नहीं दिया. परंतु एक बड़ा परिवर्तन ये हुआ कि मीडिया ने इसे सहर्ष ग्रहण ही नहीं किया बल्कि जहां-जहां संभव हुआ इस व्याख्यान माला को स्वीकार भी किया. 1925 में प्रारंभ हुए संघ की छह पीढ़ियां बीत गयी. संघ की एक शाखा से प्रारंभ हुआ संगठन आज वट वृक्ष हो गया. इस काल खंड में तीन प्रतिबंध लगने के बावजूद कोई सत्ता या सरकार संघ को समाप्त या संघ की ग्राह्यता को कम नहीं कर पायी. संघ की स्थापना के बाद से ही लगातार इसके समाप्त होने के कयास लगते रहे. संघ को लगातार विवादों में भी फंसाने के प्रयास होते रहे. गांधी जी की हत्या से लेकर संघ में महिलाओं की भागीदारी, अनुसूचित जाति जनजातियों की उपस्थिति, संघ का साम्प्रदायिक होना या फिर संघ का उच्च जातियों का समर्थक होना, इन सब विषयों पर भ्रम फैलाकर संघ को घेरने की कोशिशें होती रही हैं.

इस तीन दिवसीय व्याख्यान माला में सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने इन सब प्रश्नों के समुचित उत्तर दिए हैं. बहुत से लोगों को ऐसा लग रहा है मोहन भागवत जी ने बहुत कुछ बदल दिया है. संघ का स्वयंसेवक होने के नाते और अनुभव के आधार पर मैं ये कह सकता हूं कि इसमें बहुत कुछ नया नहीं है. जो बदला है वो केवल इतना कि आज समाज संघ को सुनना चाहता है और कसौटी पर कसना चाहता है. बहुत से पत्रकार मित्रों से पूछता हूं कि संघ को कैसे जानते हो, तो पता चलता है मीडिया के माध्यम से जानते हैं. संघ को संघ से जानने वाले कम ही मिलते हैं. आज एक बड़े वर्ग में संघ को संघ से जानने की इच्छा है और उन्होंने इस अवसर का उपयोग भी किया है.

जो संघ को साम्प्रदायिक कहते थे, उदाहरण देने के लिए विचार नवनीत को उद्धृत करते थे, वो बिना उस समय की परिस्थिति का अंदाज़ा लगाए हुए ये काम कर रहे थे. देश जब विभाजित और स्वतंत्र हुआ तो देश भर में मुस्लिम समाज को लेकर और यहां बचे हुए मुस्लिम समाज के प्रति एक बड़े वर्ग में कटुता थी. ये एक ऐतिहासिक सच है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उप कुलपति का बयान कोई भी पढ़ सकता है. उसी परिप्रेक्ष्य में श्री गुरुजी का भी लेखन है. परंतु मैंने संघ में ‘मुहम्मदिया हिंदू’ और ‘मसीही हिंदू’ जैसे शब्द सुने हैं. ये भी सुना है कि जब हिंदुओं में 33 कोटि देवी देवता हैं तो दो और से क्या अंतर पड़ता है. अंतर तब पड़ता जब ज़ोर से ज़बरदस्ती से या लालच से मत परिवर्तन करवाया जाता है. इसी प्रकार अनुसूचित जाति जन जाति को लेकर प्रश्नों के उत्तर 1973 में संघ के तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवरास ने इसी प्रकार के एक व्याख्यान माला में स्पष्ट किए थे. उनका कथन ‘यदि अस्पृश्यत पाप नहीं है, तो कुछ भी पाप नहीं है’, संघ के स्वयंसेवकों के लिए ध्रुवतारे की तरह है. इस कथन को सार्थक होते भी यदि कहीं देखा जा सकता है तो वो है संघ की शाखा और संघ के स्वयंसेवकों का व्यवहार.संघ के प्रशिक्षण शिविरों में जहां एक कमरे में 20 स्वयंसेवक एक साथ रहते खाते पीते और शिक्षण लेते हैं, किसी को भी साथ वाले की जाति, मत, पंथ, सम्प्रदाय का पता नहीं होता. और बाला साहब देवरस के इसी कथ्य को सार्थक करने के लिए देश भर में 177000 सेवा कार्य संघ के स्वयंसेवक चला रहे हैं. और एक बात यहां ध्यान देने वाली ये भी है की ये सब बिना सरकारी अनुदान के समाज के सहयोग से ही चलते हैं. संघ के कार्यकर्ता अपनी चमड़ी और अपनी दमड़ी घिस कर ये सब करते हैं.

संघ पर तीसरा बड़ा आरोप महिलाओं की भागीदारी को लेकर लगता है. देश का एक बड़ा वर्ग राष्ट्र सेविका समिति से परिचित नहीं है. 1936 में प्रारंभ हुआ ये संगठन आज 5000 शाखाओं के साथ देश का सबसे बड़ा महिला संगठन है. महिला सशक्तिकरण को लेकर राष्ट्र सेविका समिति का कार्य अद्भुत है. देश भर में कई छात्रावास राष्ट्र सेविका समिति की बहनें चलाती हैं. दोनो संगठन-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र सेविका समिति स्वतंत्र रूप से परंतु सामंजस्य के साथ अपना-अपना समाज संगठन का काम कर रहे हैं.

संघ को लेकर पैदा की गई भ्रामक अवधारवणाओं का निराकरण एक बार फिर सरसंघचालक जी ने देश के सम्मुख खुले दिल से रखा है और समाज को आह्वान किया है की संघ में आइए और निकट से देखिए. यदि समझा में न आए, तो छोड़ कर जाइए. आने और जाने का कोई शुल्क नहीं है. संघ की इस अनवरत साधना का एक बड़ा परिणाम ये भी है कि आज संघ को प्रेम करने वाले हैं और संघ से विद्वेष रखने वाले भी हैं, परंतु संघ के काम से अनभिज्ञ हैं ऐसे लोग न के बराबर हैं.

(लेखक आरएसएस में दिल्ली प्रांत के प्रचार प्रमुख हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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