हिंदी न्यूज़ – RajyaSabha election 2018 congress BJP Needs Naveen Patnaik support for win

राज्यसभा के उपसभापति और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का कार्यकाल 30 जून को खत्म हो गया है. सभी राजनीतिक दलों की निगाहें 18 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र में होने जा रहे डिप्टी स्पीकर के चुनावों पर लग गई है. एक तरफ जहां एनडीए से लगातार पार्टियों के अलग होने से सत्तापक्ष की राज्यसभा में स्थिति और कमज़ोर हुई है उधर 2019 आम चुनावों के लिए महागठबंधन बना रहे दलों के लिए भी ये उनकी एकता की परीक्षा जैसा है. फिलहाल महागठबंधन और एनडीए की निगाहें बीजेडी के 9, टीआरएस के 6 और वाईएसआर कांग्रेस के 2 सदस्यों पर टिकी हुई हैं.

क्या है स्थिति
गौरतलब है कि 41 साल से डिप्टी स्पीकर का ये पद कांग्रेस के पास है. वैसे तो पिछले 66 सालों में से 58 साल तक यह पद उसके पास रहा, लेकिन इस बार राज्यसभा में संख्या का संतुलन ऐसा है कि कांग्रेस भी जीत का दावा नहीं कर सकती. बीजेपी को मात देने के लिए कांग्रेस समेत 16 विपक्षी दलों को एकजुट होना ही होगा. इनमें गैर-यूपीए, गैर-एनडीए वाले बीजद और तृणमूल भी हैं. ऐसा हुआ, तो उनके पास कुल 128 वोट होंगे. मगर दो खेमों में बंटे विपक्ष को ऐसे प्रत्याशी की जरूरत होगी जिस पर सभी सहमत हो जाएं.

उधर बीजेपी के सामने एनडीए को एकजुट रखने की चुनौती है. साथ ही उन दलों का समर्थन भी हासिल करना होगा जो चार साल के दौरान एनडीए और यूपीए दोनों से दूरी बनाते हुए संतुलन साधते रहे हैं. बीजेपी के पास 106 सांसदों का समर्थन है, जिसमें AIADMK के 14 सांसद भी शामिल हैं. उधर, विपक्षी पार्टियों का सम्मिलित आंकड़ा 117 तक पहुंच रहा है, जिसमें TDP भी शामिल है. हालांकि 245 सदस्यीय सदन में जीत के लिए 122 वोटों की जरूरत होगी.

कांग्रेस पार्टी की सदस्य संख्या सदन में 50 रह गई है, लेकिन विपक्षी एकता के बदले हालात में तृणमूल कांग्रेस के 13, समाजवादी पार्टी के 13, टीडीपी 6, डीएमके के 4, बसपा के 4, एनसीपी के 4 माकपा 4, भाकपा 1 व अन्य गैर भाजपा पार्टियों की सदस्य संख्या को मिला दें तो वे भाजपा पर भारी पड़ रहे हैं. हालांकि 13 सदस्यों वाली अन्नाद्रमुक बीजेपी के साथ जाएगी ऐसा तय माना जा रहा है. ऐसे आसार हैं लेकिन 9 सदस्यों वाला बीजू जनतादल और शिव सेना समेत कुछ और दल अगर तटस्थता बनाए रखते हैं तो इससे विपक्षी पलड़ा भारी होना तय है. 6 निर्दलीय विधायकों में से भी कुछ इधर-उधर जा सकते हैं.

क्षेत्रीय दलों पर सब निर्भर
बीजेपी इस चुनाव में खुद को पीछे रखते हुए अकाली नेता नरेश गुजराल का नाम आगे बढ़ा सकती है वहीं बीजेडी और बीजेपी के बीच बढ़ती दूरियों का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस बीजेडी से महागठबंधन का उम्मीदवार मैदान में उतार सकती है. चुनाव में तीन क्षेत्रीय दलों बीजू जनता दल, टीआरएस और वाईएसआरसीपी की निर्णायक भूमिका को देखते हुए एनडीए और विपक्षी पार्टियां इन छोटे दलों को लुभाने में जुट गई हैं. इन तीन पार्टियों के 17 सदस्य राज्यसभा का अगला उपसभापति चुनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. जहां सत्तारूढ़ दल के रणनीतिकार भी इन तीनों दलों के संपर्क में हैं, क्योंकि इन पार्टियों ने पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भाजपा का समर्थन किया था. बीजेडी ने हालांकि उप राष्ट्रपति चुनाव के लिये कांग्रेस उम्मीदवार को अपना समर्थन दिया था.

बीजेपी के पास क्या ऑप्शन है ?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक बीजेपी इन चुनावों में कमज़ोर नज़र आ रही है ऐसे में वो ये पद टीआरएस या वाईएसआर कांग्रेस को दे दे तो काफी कुछ बदल सकता है. इस स्थिति में राज्यसभा के सभापति और उपसभापति दोनों पद आंध्र या तेलंगाना के पास चले जाएंगे. इसके आलावा AIADMK और अकाली के उम्मीदवार को भी आगे बढ़ाना बेहतर होगा. अप्रैल में चुनावों के बाद बीजेपी 69 सदस्यों के साथ राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है. हालांकि डिप्टी स्पीकर के चुनावों के लिए शिवसेना और अन्नाद्रमुक के साथ के बिना बीजेपी की जीत संभव ही नहीं.

सूत्रों की माने तो अकाली के नरेश गुजराल के आलावा एनडीए दलित चेहरे के तौर पर मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद सत्यनारायण जटिया का नाम भी आगे बढ़ा सकती है. बता दें कि राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष ने मीरा कुमार को खड़ा कर बीजेपी के उम्मीदवार कोविंद को प्रतीकात्मक टक्कर दी थी. बीजेपी का निशाना यूपीए के बाहर के दल जैसे टीएमसी, बीजद, वाईएसआर कांग्रेस पर है साथ ही एनडीए की एकता बनाए रखना बड़ा चैलेंज है. जम्मू-कश्मीर में पीडीपी से दोस्ती टूटने से बीजेपी की राह और मुश्किल हो गई है.

बीजेडी को मना रहे बीजेपी-कांग्रेस
नवीन पटनायक की बीजेडी फिलहाल वो पार्टी है जिसे अपने खेमे में लेने के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही प्रयास कर रहे हैं. एनडीए अगर बीजेडी को मना लेता है तो उसके 9 सांसदों के साथ एनडीए के पास 119 सांसद होंगें और विपक्ष के पास 121 होंगे, ऐसे में मामला और फंसता नज़र आ रहा है. दिक्कत ये है कि ओडिशा विधानसभा चुनाव में बीजेपी और बीजेडी दोनों आमने-सामने होंगें और ये चुनाव 2019 में लोकसभा चुनावों के साथ ही होना है. सूत्रों की माने तो कांग्रेस गठबंधन में सहमति कायम कर टीएमसी और बीजेडी दोनों में से किसी के भी उम्मीदवार को समर्थन देने के लिए लिए तैयार है. कांग्रेस के इस दांव से तेलंगाना और आंध्र में कांग्रेस के विरोधी टीआरएस और टीडीपी को भी कोई परेशानी नहीं होगी. बता दें कि दोनों दल पहले से ही इस मामले को लेकर टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के संपर्क में हैं.

मगर वह चुनाव 2019 में होना है लोकसभा चुनाव के साथ. तब तक यदि बीजेडी के सांसद यदि राज्यसभा का उपसभापति बन जाए तो क्या बुरा है. यदि ऐसे हालात बनते हैं तो उपसभापति जो भी बनेगा वह क्षेत्रीय दल का होगा. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक अगर बीजेडी एनडीए के प्रस्ताव को मान लेती है तो राज्य में ये संदेश जाने का खतरा है कि अंदरखाने दोनों पार्टियां अभी भी मिली हुई हैं. चुनाव से पहले डिप्टी स्पीकर के पद के लिए बीजेडी ये खतरा उठाएगी ऐसा मुश्किल ही नज़र आता है. हालांकि परंपरा यही रही है कि लोकसभा के उपाध्यक्ष और राज्यसभा के उपसभापति का पद मुख्य विपक्षी दल को जाता है मगर लोकसभा में कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या न होने के कारण उसे मुख्य विपक्षी दल की मान्यता नहीं मिली और बीजेपी ने एआईएडीएमके के थम्बी दुरई को लोकसभा का उपाध्यक्ष बना दिया.

केजरीवाल ने भी खेला दांव
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल इस मामले में संकेत दे चुके हैं कि वे किसी गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई उम्मीदवार का समर्थन कर सकते हैं. केजरीवाल के इस दांव और अभी हाल ही में दिल्ली के उपराज्यपाल और केजरीवाल के बीच गतिरोध के दौरान चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों का उनके समर्थन में सामने आने के बाद क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवारी और मजबूत हो गई है.

उधर कांग्रेस ने अभी तक उम्मीदवार उतारने के संकेत नहीं दिए हैं लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारने जा रही है, जिसमें राज्यसभा सांसद शुखेन्दु रॉय के नाम की चर्चा है. कांग्रेस अगर शुखेन्दु रॉय को अपना सर्मथन देती है तो बीजेपी के लिए मुश्किलें और बढ़ जाएंगी. विपक्ष में कांग्रेस, तृणमूल, जेडीएस, बीएसपी, सीपीएम, सीपीआई, डीएमके, एनसीपी, सपा, आरजेडी, टीडीपी के साथ टीआरएस और पीडीपी की संख्या जोड़ दें तो यह 130 तक पहुंच जाती है.

इसलिए अहम है यह चुनाव
राज्य सभा में बहुमत न होना बीजेपी के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है. आम चुनाव से एक साल पहले पार्टी कानूनों को पास कराना चाहेगी और इसके लिए चेयरमैन (वेंकैया नायडू) और डिप्टी स्पीकर काफी मददगार साबित हो सकते हैं. उधर महागठबंधन के दल इस सीट पर कब्जा जमकर विपक्षी एकता का संदेश देना चाहेंगे. गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में विपक्षी एकता के सामने हार के बाद बीजेपी के लिए ये चुनाव जीतना काफी अहम् माना जा रहा है.

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