हिंदी न्यूज़ – ये भी हैं यूपी के नामचीन माफिया डॉन, Munna Bajrangi, Sunil Rathi, Ateeq Ahmad, Mukhtar Ansari, UP

जिस तरह से मुन्ना बजरंगी की हत्या में गैंग्स्टर सुनील राठी का नाम सामने आ रहा है उससे एक बार फिर से यूपी में गैंगवार की आशंकाएं जन्म लेने लगी हैं. मुन्ना बजरंगी पर मुंख्तार अंसारी का हाथ बताया जाता है. फिलहाल तो मुंख्तार अंसारी भी जेल में बंद है. लेकिन उससे जुड़े बहुत सारे लोग बाहर ही घूम रहे हैं. दूसरे गैंगस्टर की बात करें तो अतीक अहमद, ब्रजेश सिंह और सुनील राठी के नाम से आज भी यूपी में अपराध की दुनिया बनती और बिगड़ती है.

आया था पिता का बदला लेने, बन गया ब्रजेश डॉन

बृजेश सिंह ने अपराध की दुनिया में कदम भले ही अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए रखा हो लेकिन ताकत का नशा उसके सिर चढ़ के बोलने लगा. बड़े ही कम समय में बृजेश ने रंगदारी के रास्ते कोयला, रेशम, रेलवे आदि के ठेकेदारी में हाथ डालना शुरू कर दिया. ठेकों के कारण वर्चस्व की लड़ाई भी शुरू हुई जिसमें सैकड़ों व्यापारी, पुलिसकर्मी और अपराधी मारे गए. तीन दशक से ज्यादा के इस सफर में ब्रजेश पर 27 से ज्यादा मुकदमे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल समेत गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बंगाल में दर्ज हुए.

अपराध की दुनिया में बृजेश का देशव्यापी सिंडिकेट सुनने में किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है. जनवरी 2008 में जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बृजेश को भुवनेश्वर (ओडिशा) में गिरफ्तार किया, उस वक्त उत्तर प्रदेश पुलिस ने बृजेश पर पांच लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था. गिरफ्तारी के तीन साल पहले से ही बृजेश भुवनेश्वर में अरुण सिंह के नाम से रह रहा था तथा उसने वहां विंध्याचल रियल स्टेट डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी भी खोल रखी थी. जरायम की दुनिया में इस बात की चर्चा कई दिन तक होती रही कि दिल्ली पुलिस का ‘ऑपरेशन बृजेश’ अत्यंत नाटकीय था. गिरफ्तारी के समय बृजेश पर दर्जन भर से अधिक मामले दर्ज थे लेकिन धीरे-धीरे सभी मामलों का आसानी से निस्तारण होता गया और राजनीतिक गलियारों के फाटक खुलते गए.पुरखे स्वतंत्रता सेनानी और आर्मी अफसर, बेटा पूर्वांचल का डॉन

पूर्वांचल के डॉन मुख़्तार अंसारी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और अपने ज़माने में नामी सर्जन रहे डॉक्टर एमए अंसारी के परिवार से आते हैं. यही नहीं, मुख़्तार अंसारी के पिता भी स्वतंत्रता सेनानी और कम्युनिस्ट नेता थे. शुरुआत मुख़्तार अंसारी ने भी छात्र राजनीति से की, लेकिन जनप्रतिनिधि बनने से पहले उसकी पहचान एक दबंग या माफ़िया के रूप में हो चुकी थी. 1988 में पहली बार उनका नाम हत्या के एक मामले में आया. हालांकि इस मामले में उनके ख़िलाफ़ कोई पुख़्ता सबूत पुलिस नहीं जुटा पाई, लेकिन इस घटना से मुख़्तार अंसारी चर्चा में आ गया.1990 के दशक में ज़मीन के कारोबार और ठेकों की वजह से वह अपराध की दुनिया में एक चर्चित नाम बन चुका था. मुख़्तार अंसारी पर आरोप है कि वो ग़ाज़ीपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में सैकड़ों करोड़ रुपए के सरकारी ठेके आज भी नियंत्रित करता है.

अपराध के साथ ही 1995 में मुख्तार अंसारी ने राजनीति की मुख्यधारा में कदम रखा. 1996 में वो मऊ सीट से पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए. उसी समय पूर्वांचल के एक अन्य चर्चित माफ़िया गुट के नेता ब्रजेश सिंह से मुख़्तार अंसारी के गुट के टकराव की ख़बरें भी ख़ासी चर्चा में रहीं. बताया जाता है कि अंसारी के राजनीतिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ब्रजेश सिंह ने बीजेपी नेता कृष्णानंद राय के चुनाव अभियान का समर्थन किया. राय ने 2002 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मोहम्मदाबाद से मुख्तार अंसारी के भाई अफ़ज़ाल अंसारी को हराया था. बाद में कृष्णानंद राय की हत्या हो गई और उसमें मुख़्तार अंसारी को मुख्य अभियुक्त बनाया गया. कृष्णानंद राय की हत्या के सिलसिले में उन्हें दिसंबर 2005 में जेल में डाला गया था, तब से वो बाहर नहीं आए हैं. उनके ख़िलाफ़ हत्या, अपहरण, फिरौती सहित कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

अतीक अहमद, डॉन से विधायक और सांसद तक

पूर्व सांसद अतीक अहमद के लिए जेल दूसरा घर सरीखी हो गई है. 38 साल के आपराधिक इतिहास के दौरान इलाहाबाद से लेकर बिहार तक संगीन वारदातें अंजाम दी और इन मुकदमों में ग्यारह बार गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. सच तो यह है कि पिछले दो दशक के दौरान अतीक का आधा वक्त जेल में ही गुजरा. राजनीतिक साख कमजोर पड़ने के बाद अब उनके दिन गर्दिश में आ गए हैं. सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बनने की तैयारी कर रहे अतीक को गुंडागर्दी भारी पड़ गई. टिकट कटा और जेल जाना पड़ा. अब अदालत की सख्ती के चलते उन्हें जाने कब तक सलाखों के पीछे रहना होगा.

अंतरराज्यीय गिरोह के सरगना हिस्ट्रीशीटर अतीक अहमद के खिलाफ इस साल तक 75 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं. अतीक के खिलाफ पहला मुकदमा 38 साल पहले खुल्दाबाद थाने में कत्ल का लिखा गया था. फिर तो अतीक पर धूमनगंज, खुल्दाबाद, शाहगंज, कोतवाली, कर्नलगंज, करेली, कीडगंज समेत अन्य थानों में हत्या गुंडा एक्ट, अवैध हथियार रखने, गैंगस्टर, बलवा, फ्राड, हेराफेरी, धमकी के आरोप में हर साल मुकदमे दर्ज होते रहे. कचहरी में पुलिस-वकीलों के बीच शूटआउट में चार लोगों का कत्ल, चकिया में कार्यालय के पास नस्सन हत्याकांड, चांद बाबा हत्याकांड, कचहरी परिसर में बम हमला, चकिया में निवास के सामने भाजपा नेता अशरफ हत्याकांड और फिर बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड से अतीक शहर और प्रदेश में सुर्खियों में बना रहा.

मुन्ना बजरंगी को मारकर फिर सुर्खियों में आया सुनील राठी

यूपी के माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी हत्याकांड में कुख्यात बदमाश सुनील राठी का नाम सामने आ रहा है. सूत्रों की माने तो सुनील के इशारे पर ही उसके गुर्गों ने मुन्ना को गोली मारी है. सुनील राठी को हाल ही में रुड़की जेल से बागपत शिफ्ट किया गया था. उसने रुड़की में अपनी जान का खतरा बताया था. सुनील ही नहीं उसका पूरा परिवार अपराध जगत में सक्रिय है. उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपराध जगत में सुनील राठी का नाम बड़ा है. अपने पिता की हत्या के बाद उसने जुर्म की दुनिया में कदम रखा था. इसके बाद एक-एक करके चार लोगों को मौत की नींद सुला दिया. लोग सुनील के नाम से भी डरने लगे. उसकी मां पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी के टिकट पर छपरौली विधानसभा से चुनाव भी लड़ चुकी हैं. मां जिला पंचायक अध्यक्ष भी रह चुकी है.

पिछले साल सुनील राठी का नाम तब सुर्खियों में आया था, जब उसने रुड़की शहर के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर एनडी अरोड़ा से पचास लाख की रंगदारी मांगी थी. बागपत जेल में बंद रहते हुए उसे डॉक्टर से अपनी मां तक इन पैसों को पहुंचाने के लिए कहा था. इसके बाद रुड़की पुलिस सुनील राठी को रिमांड पर लेकर आई थी. कोर्ट के आदेश पर उसे रुड़की में रखा गया था. बताते चलें कि एक अन्य कुख्यात बदमाश चीनू पंडित से सुनील राठी की जानी दुश्मनी है. दोनों एक दूसरे पर जानलेवा हमले करवा चुके हैं. दोनों बदमाशो की गैंग के कई साथी भी मारे जा चुके हैं. चीनू पंडित रुड़की की जेल में बंद है. जेल में बंद होने के बावजूद दोनों अपना-अपना गैंग नेटवर्क चला रहे हैं. चीनू सुनील के वकील को मारने की कोशिश भी कर चुका है.

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