हिंदी न्यूज़ – Why Mayawati is the Indispensable Cog in the Wheel of Opposition Chariot- 2019 के चुनावी रण में विपक्ष के रथ का जरूरी हिस्सा क्यों हैं मायावती?

(सुमित पांडे)

राजनीति में अनिश्चितता की हमेशा जगह रहती है. 10 साल पहले जुलाई 2008 में राष्ट्रीय राजनीति में जो हुआ, उसके बारे में भी किसी ने कुछ सोचा नहीं था. तब यूनाइडेट लेफ्ट फ्रंट के 60 सांसदों ने कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार से समर्थन वापस ले लिया था.

मनमोहन सिंह सरकार के लिए जरूरी संख्याबल के प्रभारी रहे सीनियर कांग्रेस नेता को विश्वास मत के दो दिन पहले एक जर्नलिस्ट का फोन आया था. जर्नलिस्ट ने कांग्रेस नेता से सवाल किया था कि राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के सभी 3 सांसद यूपीए के साथ हैं?

राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ के चुनाव में BSP को पैकेज डील देगी कांग्रेस!दरअसल, अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी के तीनों सांसद बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संपर्क में थे. तीनों सांसद बीएसपी सुप्रीमो मायावती के हुमायूं रोड स्थित बंगले में मिलने जा रहे थे. उन्हें विश्वास मत के खिलाफ वोटिंग करनी थी.

इस घटना के 10 साल बाद भी मायावती फिर से केंद्र में विपक्ष के लिए लीड रोल निभा रही हैं. हालांकि, इस बार केंद्र का चेहरा बदल गया है. 2008 में यूपीए की सरकार थी. अब एनडीए की सरकार है. इसमें सिर्फ इतना फर्क है कि 2008 में उत्तर प्रदेश के सीएम के रूप में मायावती के पास प्रशासनिक शक्ति थी, जो अब नहीं रह गई है. अब हालात हो गए मायावती को बीएसपी से किसी एक कैंडिडेट को राज्यसभा भेजने के लिए भी जरूरी विधायकों का सपोर्ट नहीं मिला.

हालांकि, सियासत की लड़ाई में उनकी महत्ता कम नहीं हुई है. मायावती के सहयोगी दलों (समाजवादी पार्टी, जेडीएस) और विरोधी दलों को बखूबी मालूम है कि 2019 के चुनावी रण में मायावती विपक्ष के रथ का एक ऐसा हिस्सा हैं, जिसे अलग नहीं किया जा सकता. हाल ही में कर्नाटक में सीएम एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्ष के शक्ति प्रदर्शन के दौरान इसका ‘टीज़र’ भी देखने को मिला.

14 साल बाद खत्म होगा ‘सियासी वनवास’, यहां से 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगी मायावती!

यूपी में पिछले एक साल से बीजेपी की सरकार है. तब से बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने पार्टी की आडियोलॉजी में ऐसे कई बदलाव किए, जो कांशीराम द्वारा बनाई गई बीएसपी के इतिहास में अब तक नहीं हुए थे. दो साल पहले उत्तराखंड में बीएसपी के ही दो विधायकों ने हरीश रावत की सरकार बचाई थी. हालांकि, मायावती ने यूपी से बाहर किसी दूसरे राज्य में चुनाव लड़ने की कभी इच्छा जाहिर नहीं की.

2017 में हुए यूपी चुनाव में मिली करारी हार से सबक लेते हुए मायावती यूपी के अलावा दूसरे राज्यों में गठजोड़ को तवज्जों दे रही हैं. बीजेपी और कांग्रेस के बाद बीएसपी इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसकी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता है. अगर बात करें वोट की, तो पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बाद मायावती की पार्टी का ही वोट शेयर ज्यादा था. लेकिन, पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई. मायावती का अपना वोट बैंक हैं. जिसे एकजुट विपक्ष बीजेपी के खिलाफ जरूर भुनाना चाहेगा.

कर्नाटक में हाल में हुए एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में हमें इसकी एक झलक भी देखने को मिली. शपथ ग्रहण समारोह के स्टेज पर मायावती और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ मिलना ये साफ करता है कि विपक्ष के लिए मायावती कितनी जरूरी हैं.

उधर, सियासी रणनीति के तहत मायावती कांग्रेस के बागी रहे अजीत जोगी से भी मिल रही हैं. हाल के दिनों में अजीत जोगी छत्तीसगढ़ में रमन सरकार का विकल्प बनकर उभरे हैं. छत्तीसगढ़ में इस साल चुनाव होने हैं. लिहाजा मायावती इस मौके को भी हाथ से जाने देना नहीं चाहेंगी.

बता दें कि अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी का सामना करने के लिए विपक्ष के दल एक साथ आ रहे हैं. इसके लिए ‘एकजुट महागठबंधन’ की चर्चा हो रही है. ज्यादातर राजनीतिक दलों ने बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन का समर्थन किया है. फिलहाल महागठबंधन के नेता (लीड) को लेकर सहमति नहीं बन पाई है. ऐसे में माना जा रहा है कि इसका ऐलान चुनाव बाद किया जाएगा.

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