हिंदी न्यूज़ – राजनीति में अभी बाकी है ‘जूता’ निशान! Election commission of india listed symbols for political parties include shoe socks footwear bangles lighter

मशहूर व्यंग्यकार शरद जोशी ने नेता और जूता के संबंधों पर एक व्यंग्य लिखा था. जोशी ने उसमें बताया था कि नेता शब्द दो अक्षरों से बना है ‘ने’ और ‘ता’ से. ‘ने’ से नेतृत्व और ‘ता’ से ताकत यानी ‘नेतृत्व की ताकत’. इनमें एक भी अक्षर कम हो तो कोई भी नेता नहीं बन सकता. अंत में जोशी लिखते हैं ‘लेकिन मेरा विश्वास है मित्रों, जब भी संकट आएगा, नेता का ‘ता’ नहीं रहेगा, लोग निश्चित ही जूता हाथ में ले बढ़ेंगे और प्रजातंत्र की प्रगति में अपना योग देंगे.’

चुनाव आयोग  की सूची में जूता निशान को किसी  पार्टी का इंतजार है, लेकिन कोई उसे लेने के लिए तैयार नहीं दिख रहा. तैयार भी भला कैसे होगा. आजकल नेता लोग जूतों के निशाने पर हैं. इराक यात्रा पर गए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर पत्रकार ने जूता क्या फेंका… इसका वायरस भारत तक पहुंच गया. पी. चिदंबरम, जीतन राम मांझी, अरविंद केजरीवाल और नवीन जिंदल…जैसे कई नेता इसके निशाने पर आ गए…हर नेता में यह डर बैठा हुआ कि कहीं उन पर कोई जूता न उछाल दे.

ऐसे में कौन जूता चुनाव चिन्ह लेने का रिस्क ले. जूता चुनाव चिन्ह ले लिया तो प्रचार कैसे होगा? जनता से वोट कैसे मांगा जाएगा? इसलिए चुनाव आयोग की फ्री सिंबल सूची में जूता टिका हुआ है. कोई इसे अपनाने वाला नहीं है. किसी ने इस बात पर गौर करने की कोशिश नहीं की कि झाडू की तरह जूता भी तो पापुलर हो सकता है. झाडू निशान लेने वाला आज सीएम है.

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फिलहाल तो किसी ने अपनी पार्टी के लिए जूता निशान लेने की हिम्मत कर ली तब तो ‘चप्पलें’ और ‘जुराबें’ का नंबर आएगा. आयोग ने इन्हें भी फ्री सिंबल लिस्ट में जगह दी हुई है. यही नहीं हेडफोन, हेलमेट, भिंडी, लाइटर, नेल कटर, फोन चार्जर, सेफ्टी पिन, शेविंग मशीन, चूड़ियां, तकिया और हांडी भी अपने लिए पार्टी का इंतजार कर रहे हैं. फ्री सिंबल लिस्ट में इस समय 164 निशान हैं. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर इसके सचिव एनटी भूटिया की ओर से जारी यह सूची मौजूद है.

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अब्दुल रहीम का मानना है “जिससे नकारात्मक विचार आते हों वो निशान नहीं होना चाहिए. जूता हर कोई पहनता है लेकिन उसे निशान के रूप में शामिल करना सम्मानजनक नहीं है. जूते, चप्पल जैसे निशान असहज करने वाले हैं, कोई राजनीतिक दल शायद ही इसे अपनाना चाहेगा. राजनीतिक दल अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ते हैं. चुनाव चिन्ह पार्टियों की रीति-नीति को भी प्रदर्शित करता है. इसलिए ऐसे चिन्ह होने चाहिए जो असहज न करें. ”

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मतदान करते समय वोटरों के सामने न केवल प्रत्याशी और पार्टी का नाम बल्कि चुनाव चिन्ह भी होता है. जो लोग पढ़े लिखे नहीं होते हैं उनके लिए चिन्ह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. जब कोई पार्टी अपने लिए चुनाव चिन्ह का चयन करती है तो अंतिम निर्णय चुनाव आयोग का होता है.

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