हिंदी न्यूज़ – पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया पर क्यों नहीं लग सकता प्रतिबंध, ये हैं पांच कारण-Why cant parties impose a ban on popular front of india

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया पर क्यों नहीं लग सकता प्रतिबंध, ये हैं पांच कारण

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (Photo: Fqacebook)

News18Hindi

Updated: July 13, 2018, 8:38 PM IST

चंद्रकांत विश्वनाथ

केरल के एर्नाकुलम में एफएफआई से जुड़े एक छात्र की क्रूर हत्या के बाद से पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) पर रोक लगाने की मांग ने जोर पकड़ रखा है. पार्टी लाइन से हट कर दलों और लोगों की राय इस इस्लामिक संगठन के खिलाफ है. कॉमरेड की हत्या की जांच में शुरूआती सुबूत इस संगठन के विरोध में ही जा रहे है. फिर भी लगता है कि कम से कम 16 राज्यों में अपना असर रखने वाले इस 12 साल पुराने संगठन पर रोक लगाना मुश्किल है.

अल्पसंख्यकों और पिछड़ों की आवाज उठाने के नाम पर बना संगठन पीएफआई एक बहुत ताकतवर मुस्लिम संगठन बन चुका है. इसका असर कम से कम 16 राज्यों मे है और 15 से ज्यादा मुस्लिम संगठन इसकी छतरी में है. संघ और बीजेपी के अलावा केंद्रीय मंत्री तक इसके खिलाफ बोल चुके है. केंद्र की सरकारी एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद कहा जाने लगा था कि इस पर रोक लगा ही दी जाएगी. फिर भी इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने से केरल मुख्यमंत्री ने साफ मना कर दिया. जानिए वो 5 कारण जिनकी वजह से इस संगठन पर रोक लगाना बहुत ही मुश्किल है.

1. सीपीएम की नीतियांसत्ताधारी पार्टी का मानना है कि समाज को सांप्रदायिक बनाने के लिए पीएफआई और आरएसएस दोनों ही जिम्मेदार है. कई नेताओं की राय में ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. मुख्यमंत्री पी विजयन के मुताबिक,‘केरल सरकार की नीति ये नहीं है कि वो किसी संगठन पर रोक लगाए. अगर दंगों और समाज को बांटने के लिए किसी संगठन पर रोक लगानी है तो आरएसएस पर लगाई जानी चाहिए. बहरहाल इस तरह के संगठनों का मुकाबला रोक से नहीं किया जा सकता. हमारा ऐसा अनुभव रहा है और पीएफआई के साथ भी यही है.’ मुख्यमंत्री ने यह बात 15 फरवरी को केंद्रीय मंत्री किरन रिजीजु के एक बयान के जवाब में कही थी.

2. समर्थन और ताकत
हत्या की घटना के पहले इस संगठन के कैडर की संख्या 40 हजार तक पहुंच गई थी. फिर भी इसके पास 25 हजार के करीब कैडर और 3 लाख समर्थक हैं. इसके राजनीतिक विंग एसडीपीआई की बात की जाए तो राज्य की 140 में से 20 सीटों पर एडीपीआई का वोट शेयर 10 हजार से ज्यादा है. जबकि अन्य 20 सीटों पर 5 हजार से ज्यादा वोट शेयर इसके पास है.

इसके अलावा अन्य सीटों पर 3 सौ से 3 हजार तक इसका वोट शेयर है. फिर भी सीपीएम ने इस हत्याकांड के बाद से बड़ी फुर्ती से कह दिया कि एसडीपीआई से उसका कोई ताल्लुक नहीं है. अब यह कोई गोपनीय तथ्य नहीं रह गया है कि पीएफआई के राजनीतिक विंग से उसने समर्थन लिया है. खासतौर से लोकल बॉडीज के चुनावों में जहां कम वोटों के अंतर से फैसले होते हैं. ऐसी जगह पर इस संगठन की ताकत निर्णायक होती है.

3. मुस्लिम सेंटीमेंट को उभारना
एंटी फासिज्म और एंटी बीजेपी नारों के सहारे इस संगठन ने दूसरे सेक्युलर मुसलमानों के बीच भी अपनी पैठ कर ली. लिहाजा पीएफआई के विरोध में कोई भी कार्रवाई ‘मुसलमानों को दबाने’ वाली कार्रवाई के प्रचार अभियान का रूप अख्तियार कर सकती है. हत्याकांड के बाद जब पीएफआई के गढ़ों पर छापे पड़े या उसके कैडर की धर पकड़ की गई तो उसने ऐसा ही प्रचार किया था.

4. बीजेपी को फायदा
लंबे समय से बीजेपी और संघ परिवार पीएफआई पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं. उनकी दलील है कि यह तमाम और कामों के अलावा धर्मांतरण और आईएसआईएस में भर्ती कराने जैसे कामों में लिप्त है. लिहाजा इस पर रोक लगाई जानी चाहिए. ऐसे में अगर रोक लगाई जाती है तो उसके आरोपों की ही पुष्टि होगी और वाम दल नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो.

5. रोक असरदार होगी?
राज्य सरकार और पुलिस को इस बारे में संशय है कि पीएफआई पर रोक असरकारक होगी. इसकी छतरी में तकरीब 15 संगठन हैं और यह उनके लिए प्रेरण देने वाला संगठन है. अधिकारियों के मुताबिक इसका निष्ठावान कैडर इनमें से किसी संगठन से जुड़ जाएगा.

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