Indian men’s hockey team returns empty handed from Gold Coast after winning silver medal in the Commonwealth Games 2010 and 2014 – भारतीय हॉकी : पदक के फेर में फेरबदल

भारतीय हॉकी टीम (पुरुष) 2010 और 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीतने के बाद जब इस बार गोल्ड कोस्ट से बगैर पदक लौटी तो उठापटक मचना तय था। तो इसी उठापटक का नतीजा रहा कि प्रदर्शन की समीक्षा किए बगैर कोच शोर्ड मारिन की बलि ले ली गई। गनीमत यह रही कि उन्हें हटाने के बजाय महिला हॉकी की कमान फिर से उन्हें दे दी गई और महिला हॉकी के मुख्य कोच हरेंद्र सिंह को पुरुष टीम का कोच बना दिया गया। अब सवाल यह है हॉकी इंडिया ने शोर्ड मारिन का प्रयोग करके भारतीय हॉकी टीम के आठ महीने बर्बाद क्यों किए। असल में पिछले साल सितंबर में जब रोलैंट ओल्टमेंस को हटाकर नए कोच की तलाश की जा रही थी, तो पहला नाम हरेंद्र का ही था। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि हरेंद्र पहले भी भारतीय पुरुष हॉकी टीम से जुड़े रह चुके थे और जूनियर टीम को विश्वकप जिताने का उन्हें अनुभव था। पर हॉकी इंडिया ने इससे उलट मारिन को पुरुष और हरेंद्र को महिला हॉकी टीम का कोच बना दिया। शोर्ड मारिन के समय में एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने और विश्व हॉकी लीग में कांस्य पदक जीतने का श्रेय उनको नहीं दिया गया। यह कहा गया कि यह तो पिछले कोच की तैयारियों का नतीजा था। अगर ऐसा था तो पिछले कोच रोलैंट ओल्टमेंस को यह कहकर क्यों हटाया गया कि हमें परिणाम देने वाले कोच की जरूरत है। रोलैंट ओल्टमेंस के समय में भारतीय हॉकी टीम ने 2015 में विश्व हॉकी लीग में कांस्य पदक और चैंपियंस ट्रॉफी में 34 साल बाद रजत पदक जीता था। बार-बार विदेशी कोच पर भरोसा करना और उसे समय से पहले ही हटा देने से क्या भारतीय हॉकी सुधर पाएगी, लगता तो नहीं है।

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सच तो यह है कि हॉकी इंडिया कई बार सक्षम कोचों को चुनने में ही असफल रही है। अगर सक्षम कोच चुन लिया गया तो उसे हॉकी इंडिया की निभ नहीं सकी है। कई बार ऐसा लगता है कि हमारे सिस्टम की वजह से यह सब समस्याएं आ रही हैं। रोलैंट ओल्टमेंस ने हटाए जाने के समय कहा था कि हम जैसे लोग समझते हैं कि हम सिस्टम को बदल सकते हैं। लेकिन भारत में सिस्टम को बदला जाना संभव नहीं है। हां, इतना जरूर है कि आप यदि विदेशी कोच हैं तो करार खत्म होने से पहले ही आपको हटा दिया जाएगा। इसे आप जोस ब्रासा, टैरी वाल्श और पॉल वान एस को हटाए जाने से समझ सकते हैं। शोर्ड मारिन ने जब कोच पद संभाल था, तब खिलाड़ियों से उन्होंने कहा था कि वह खुद सोचें और फैसला करें। गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद खिलाड़ियों ने खुद सोचा और कोच साहब की छुट्टी करा दी। भारतीय हॉकी के लिए यह साल बेहद महत्त्वपूर्ण है। इसी साल एशियाई खेलों और घर में विश्वकप का आयोजन होना है। एशियाई खेलों से टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने की राह बनेगी तो विश्वकप में खेलने से पता चलेगा कि हम कितने पानी में हैं। हॉकी इंडिया ने इसकी जिम्मेदारी हरेंद्र सिंह को सौंप दी है। वह पहले भी कम समय के नोटिस पर जिम्मेदारियों को संभालकर अच्छे परिणाम दे चुके हैं। पर कई फैसलों से टीम को नुकसान भी हुआ है। ओल्टमेंस के समय में भारतीय टीम की लंबे समय तक कमजोरी रही पेनल्टी कार्नरों को गोल में बदलने में सुधार हुआ था। पर शोर्ड मारिन के समय में यह कमजोरी फिर पहले जैसी हो गई और इसकी वजह से ही गोल्ड कोस्ट में टीम को हारना पड़ा। सच यह है कि भारतीय हॉकी की समस्या तब तक बनी रहेगी, जब तक प्रदर्शन में एकरूपता नहीं आएगी, जिसकी संभावना अभी तो नजर नहीं आती है। गोल्ड कोस्ट में ही न्यूजीलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल में और फिर इंग्लैंड के खिलाफ कांस्य पदक के मुकाबले में रूपिंदर पाल की अनुपस्थिति से भारतीय खेल एकदम से लड़खड़ा गया। इसके लिए जरूरी है कि टीम में खिलाड़ियों के विकल्प मौजूद रहें और उनका प्रदर्शन ऐसा हो कि दोनों में ज्यादा फर्क नहीं किया जा सके।

हम विदेशी कोचों को एक दशक से ज्यादा समय से ला रहे हैं। यह सही है कि इन कोचों के आने से टीम में सुधार हुआ है। लेकिन कोई भी कोच प्रदर्शन में एकरूपता नहीं ला सका है। इसकी जड़ में हम जाएं तो कई बार लगता है कि यह खामियां सिस्टम की देन हैं। हम विदेशी कोचों को लाने और उन्हें हटाने की लंबी फेहरिस्त खड़ी कर चुके हैं। अब हमें जांच इस बात की करानी चाहिए कि वह क्या वजह हैं कि हमारे यहां विदेशी कोच टिक नहीं पाते हैं।

हुक्म हाजिर है…
हॉकी इंडिया ने शोर्ड मारिन का प्रयोग करके भारतीय हॉकी टीम के आठ महीने बर्बाद क्यों किए। असल में पिछले साल सितंबर में जब रोलैंट ओल्टमेंस को हटाकर नए कोच की तलाश की जा रही थी, तो पहला नाम हरेंद्र का ही था। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि हरेंद्र पहले भी भारतीय पुरुष हॉकी टीम से जुड़े रह चुके थे और जूनियर टीम को विश्वकप जिताने का उन्हें अनुभव था। पर हॉकी इंडिया ने इससे उलट मारिन को पुरुष और हरेंद्र को महिला हॉकी टीम का कोच बना दिया। शोर्ड मारिन के समय में एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने और विश्व हॉकी लीग में कांस्य पदक जीतने का श्रेय उनको नहीं दिया गया। यह कहा गया कि यह तो पिछले कोच की तैयारियों का नतीजा था। अगर ऐसा था तो पिछले कोच रोलैंट ओल्टमेंस को यह कहकर क्यों हटाया गया कि हमें परिणाम देने वाले कोच की जरूरत है।

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