raed about FIFA world cup starting 14 june 2018 in russia – फीफा संभावना: थामिए दिल, आज से छाएगा जहां में जुनून

एक खूबसूरत खेल है फुटबॉल। इसकी खूबसूरती में छिपा है खिलाड़ियों का अद्भुत कौशल। कौशल ऐसा जो दर्शकों में सिहरन पैदा कर दे। दीवानगी ऐसी कि मैदान के बाहर भी समर्थकों को भिड़ा दे। अविश्वसनीय गोल, लाजवाब, बचाव, नयनाभिराम पासिंग, हलचलों में इतनी तेजी कि पलक झपकते गेंद एक छोर से दूसरे छोर तक नाचती रहे, और वह भी नपी-तुली पासिंग से।

जिस खेल ने पेले, माराडोना, प्लातीनी, बेकनबाउर और जिदान जैसे महान खिलाड़ी उभारे, उसी खेल में अब नए सुपरस्टारों की परीक्षा है। आज से सभी की निगाहें टिक जाएंगी रूस के नौ शहरों पर जहां ओलंपिक की भव्यता को टक्कर देने वाला 21वां फुटबॉल विश्व कप शुरू होने जा रहा है। खिलाड़ियों के व्यक्तिगत कौशल ने भी टीमों को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई है, चाहे वे पेले हों या माराडोना, बेकनबाउर हों या पाउलो रोसी, खेल का रंग जमता गया है। पर आज भी कुछ बड़े सितारे हैं जिनके लिए विश्व कप जीतना सपना है। यों तो फुटबॉल के ढेरों अवार्ड, क्लब टीम की सफलताएं उनके साथ जुड़ी हैं पर विश्व का सबसे प्रतिष्ठित कप उनके शो-केस की शोभा नहीं है। इनमें दो खिलाड़ी प्रमुख हैं अर्जेंटीना के लियोनल मेस्सी और पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो। दोनों के पास गोल बनाने की कला है और अपनी टीमों को आगे ले जाने का माद्दा भी। उम्र के जिस पड़ाव पर ये हैं उनके लिए संभवत: विश्व कप जीतने का आखिरी मौका होगा।

बड़ी खबरें

पेले के दौर से ब्राजील की फुटबॉल कलाकारी की दुनिया कायल रही है। पांच खिताब जीतकर उसने अपने प्रशंसकों की तारीफ बटोरी। पर मेजबान के नाते 2014 में हुए पिछले विश्व कप के सेमीफाइनल में जर्मर्नी ने उसे 7-1 से धोकर जो गत बनाई, वह चौंकाने वाला था। यह तो स्वीकारना पड़ेगा कि ब्राजील के खेल की चमक कम हुई है। उसके पास वैसे क्लासिकी खिलाड़ी नहीं हैं जैसे 1982 की टीम में थे। अपनी सफलता के लिए ब्राजील नेमार पर काफी निर्भर है। ग्रुप ‘ई’ में कोस्टारिका, स्विट्जरलैंड और सर्बिया पर जीत पाने में उसे परेशानी नहीं होनी चाहिए। उसकी फार्म, रैंकिंग दोनों बेहतर है।

यूरोप में विश्व कप हो रहा है और पुर्तगाल यूरोपीय चैंपियन है। कोच फर्नांडो सांतोस का मानना है कि रोनाल्डो जैसे कलात्मक खिलाड़ी के रहने से टीम फायदे में है। रोनाल्डो ऐसे खिलाड़ी हैं जो मैच में किसी भी क्षण जादुई पल (जीत दिलाने वाला गोल) ला सकते हैं। उनके रहने से टीम के बाकी खिलाड़ी प्रेरित होते हैं लेकिन ग्रुप में स्पेन जैसी सशक्त टीम से उनका पहला मुकाबला है। स्पेनिश टीम 2010 की विश्व चैंपियन है और इस बार खिताब की दावेदार भी। ग्रुप से इन्हीं दो टीमों के आगे बढ़ने की संभावना है। मोरक्को और ईरान इस ग्रुप की दो अन्य टीमें हैं। पूर्व चैंपियन उरुग्वे को भी नाकआउट में जगह बनाने में परेशानी नहीं होगी। तीनों अभ्यास मैच जीतकर उसने अपनी पुख्ता तैयारी का संकेत दिया है। उनके पास कुशल स्ट्राइकर लुइस सुआरेज है। ग्रुप में मेजबान रूस, मिस्र और सऊदी अरब की टीमें उसे आगे बढ़ने से शायद ही रोक पाएं। हां मिस्र के स्टार खिलाड़ी मोहम्मद सालाह के प्रदर्शन पर सभी की निगाहें रहेंगी। इस ग्रुप में मेजबान रूस के साथ एक समस्या है। पिछले आठ मैचों में उसे एक भी जीत नसीब नहीं हो सकी है। लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि दर्शकों के समर्थन से टीम का भाग्य बदलेगा।

जर्मनी दुनिया की नंबर एक टीम है। उस पर खिताब बचाने का दबाव रहेगा। इतिहास में केवल दो बार ही टीमें लगातार दूसरी बार विश्व कप जीतने में सफल रही हैं। गोलकीपर मेनुअल नोएर की चोट के बाद वापसी से जर्मनी का मनोबल बढ़ा है। पिछले विश्व कप में टीम को चैंपियन बनाने की उनकी खास भूमिका थी। जर्मनी हमेशा अपने मजबूत रक्षण के लिए जाना जाता है। लेकिन कुछ समय से उसने गोल भेदने की कलाकारी में भी छाप छोड़ी है। विश्व कप के सभी दस क्वालीफाई मैच जर्मनी ने जीते और इसमें 40 गोल बनाए।

ग्रुप ‘एफ’ में उसे स्वीडन, मेक्सिको और दक्षिण कोरिया से खेलना है। खेल के हर क्षेत्र में जर्मन टीम संतुलित है और उसके ग्रुप टॉप करने की उम्मीद है। स्वीडन और मेक्सिको के बीच क्वालीफाई करने की होड़ रहेगी। दक्षिण कोरिया ग्रुप की सबसे कमजोर टीम है।
ग्रुप ‘डी’ में अर्जेंटीना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि टीम मेस्सी की कलाकारी का कितना फायदा उठा पाएगी। पहली बार फाइनल्स में खेल रही आइसलैंड, क्रोएशिया और नाइजीरिया के खिलाफ अर्जेंटीना को जल्द खेल की लय बनानी होगी। मेस्सी के पासों को फिनिश देने के लिए सर्जियो अगुएरो, गोंजालो हिगुएन और पाब्लो रहेंगे। कोई भी चूक टीम को महंगी पड़ेगी। ग्रुप ‘सी’ में फ्रांस की राह आसान लगती है। पेरू, डेनमार्क और आस्ट्रेलिया उसकी राह में खड़े हैं। ग्रुप ‘जी’ में इंग्लैंड और बेल्जियम के नाकआउट दौर में पहुंचने की उम्मीद है। इंग्लैंड ने अंडर-17 और अंडर-21 के विश्व खिताब जीते हैं। यह खिताब मिल जाए तो यादगार ‘हैट्रिक’ हो जाएगी। वैसे भी इंग्लैंड को एकमात्र सफलता 1966 में मिली थी। कोलंबिया, पोलैंड, सेनेगल और जापान ग्रुप ‘एच’ से नाकआउट की रेस में होंगे।

श्रेष्ठता की जंग

विश्व कप में श्रेष्ठता की जंग लातिन अमेरिकी और यूरोपीय टीमों के बीच ही रही है। अफ्रीकी टीमें आयु वर्ग स्तर पर तो उम्मीद जगाती हैं पर जब विश्व कप की परीक्षा आती है तो उनकी चुनौती बहुत आगे तक नहीं जा पाती। 2002 के फुटबॉल विश्व कप को छोड़ दें तो एशियाई टीमें भी फिसड्डी रही हैं। 2002 में जापान और कोरिया संयुक्त मेजबान थे और उनका प्रदर्शन काबिले तारीफ रहा था।

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