गर्भपात के मुद्दे पर पोलैंड में सियासी तूफान – Poland is in Discussion Due to Protests Taking Place on Abortion Legislation in These Days

पोलैंड इन दिनों गर्भपात कानून में बदलाव को लेकर हो रहे विरोध आंदोलनों के कारण चर्चा में है। पोलैंड में धुर दक्षिणपंथी पार्टी लॉ एंड जस्टिस की सरकार है जिसे संक्षिप्त में पीआईएस कहते हैं। पोलैंड की सरकार अपने फैसलों से लगातार खलबली मचाए हुए है। कभी वह शरणार्थियों को न लेने के मुद्दे पर यूरोपीय संघ के सामने सीना तान कर खड़ी हो जाती है तो कभी देश की न्यायपालिका पर शिकंजा कसती है। यही नहीं, पिछले दिनों पोलैंड की सरकार ने एक कानून बना दिया जिसके तहत यहूदी नरसंहार के लिए किसी भी तरह पोलैंड को दोष देना अपराध घोषित कर दिया गया। अब सरकार गर्भपात के कानून सख्त बनाने की तैयारी में थी लेकिन भारी विरोध के कारण फिलहाल उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े। 23 मार्च को 50 हजार से ज्यादा लोग राजधानी वारसॉ की सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने इसे ब्लैक फ्राइडे का नाम दिया और उनके हाथों में मौजूद तख्तियों पर लिखा था “स्टॉप” या फिर “हमें चॉइस चाहिए, दहशत नहीं।”

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पोलैंड पूरी तरह से एक कैथोलिक देश है और वहां गर्भपात पर पहले से ही प्रतिबंध है। सिर्फ तीन परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति है। इनमें अगर मां की जान को खतरा हो, गर्भ बलात्कार या अनैतिक शारीरिक संबंधों का नतीजा हो या फिर गर्भ में पल रहे भ्रूण को कोई स्थायी नुकसान पहुंचने पर ही गर्भपात की अनुमति है। पोलैंड में जितने भी गर्भपात अभी तक होते रहे हैं उनमें 90 प्रतिशत तीसरी श्रेणी यानी भ्रूण को नुकसान होने की परिस्थिति के तहत होते रहे हैं। अब सरकार नए कानून के जरिए इसी तीसरी श्रेणी को खत्म करना चाहती है। सरकार देश में गर्भपात के लिए संभावनाओं को बेहद सीमित कर देना चाहती है। बीते डेढ़ साल में यह दूसरा मौका है जब पोलैंड में गर्भपात को लेकर सियासी बहस छिड़ी है। अक्टूबर 2016 में भी पोलैंड में गर्भपात पर लगभग पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग उठी थी। लगभग साढ़े चार लाख लोगों ने गर्भपात पर रोक के समर्थन में अपने हस्ताक्षर दिए थे। लेकिन उसके बाद एक लाख लोग इसके खिलाफ सड़कों पर उतरे जिनमें ज्यादातर महिलाएं थीं।

पीआईएस पार्टी के बहुत से सांसद गर्भपात विरोधी मुहिम के समर्थन में थे, लेकिन सरकार ने इससे दूरी बना ली। कैथोलिक चर्च भी गर्भपात पर रोक चाहता था, लेकिन 6 अक्टूबर 2016 को संसद में बिल पेश होने से पहले उसने अपना रुख तब्दील कर लिया। चर्च ने कहा कि उसे यह मंजूर नहीं है कि किसी महिला को गर्भपात कराने की वजह से जेल जाना पड़े। अब फिर पोलैंड उसी दोराहे पर खड़ा है. 2016 में गर्भपात विरोधियों को मिली नाकामी के बाद पीआईएस पार्टी के अध्यक्ष यारोस्लाव काचिंस्की ने कहा था कि उनकी पार्टी कानूनों में इस तरह के बदलाव के लिए प्रतिबद्ध है जिससे विकलांग भ्रूण भी जन्म ले पाएं ताकि उनका “बपतिस्मा हो सके, उन्हें दफनाया जा सके और उन्हें एक नाम दिया जा सके।” पिछले दिनों कैथोलिक बिशपों ने फिर पोलिश सांसदों से कहा कि “वे इंसानी अस्तित्व के सभी पलों के प्रति अपना बिना शर्त समर्थन व्यक्त करें।” यानी वे उन बच्चों की वकालत कर रहे थे जो गर्भ में किसी विकृति का शिकार हो गए हैं।

पीआईएस पार्टी के लिए कैथोलिक चर्च के इस बयान की बहुत अहमियत है क्योंकि अगले साल पोलैंड में आम चुनाव होने हैं और जीत के लिए उसे चर्च का समर्थन चाहिए। लेकिन आम चुनाव से पहले इस साल के आखिर में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव भी पीआईएस के लिए अहम परीक्षा होंगे। वहीं बुधवार को जारी एक सर्वे के मुताबिक सर्वे में पीआईएस की लोकप्रियता घटकर 28 प्रतिशत रह गई है जबकि एक महीने पहले वह 40 प्रतिशत के आसपास थी। पिछले दस साल में कभी पीआईएस के लिए समर्थन में इतनी गिरावट देखने को नहीं मिली। एक महीने के भीतर लोकप्रियता में 12 प्रतिशत की गिरावट दिखाती है कि गर्भपात का मुद्दा लोगों के लिए कितना अहम है। सर्वे करने वाली संस्था के मुताबिक यहूदी नरसंहार से जुड़े कानून पर इस्राएल के साथ कूटनीतिक टकराव के कारण भी लोगों में सरकार के प्रति रोष है। इस्राएल ही नहीं, बल्कि पोलैंड इस मुद्दे पर अमेरिका से भी टकराने को तैयार हो गया जबकि अमेरिका उसका अहम रक्षा सहयोगी है। दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी सिविल प्लेटफॉर्म की लोकप्रियता छह फीसदी की बढ़त के साथ 22 प्रतिशत हो गई है।

गर्भपात के मुद्दे पर पोलैंड की सरकार को अपने लोगों की नाराजगी ही नहीं झेलनी पड़ रही है, बल्कि यूरोपीय मानवाधिकार परिषद ने भी उसे चेतावनी दी है। यूरोपीय मानवाधिकार आयुक्त नील्स मुइजनिएक्स ने कहा है कि अगर पोलैंड ने गर्भपात विरोधी कानून को पास किया तो यह उन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा जिन्हें निभाने की जिम्मेदारी पोलैंड के ऊपर भी है। उन्होंने पोलिश संसद से कहा है कि ऐसे किसी कानून को पारित न करे जिससे महिलाओं के यौन और प्रजनन से जुड़े अधिकारों पर बंदिशें लगती हों। पिछले साल सरकार ने एक वीडियो जारी किया जिसमें पोलैंड के लोगों से कहा गया है कि वे खरगोशों की तरह बच्चे पैदा करें, ताकि देश में घटती जनसंख्या की समस्या से निपटा जा सके। यही नहीं ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को सरकार ने आर्थिक मदद देने का भी एलान किया है। पोलैंड में जन्मदर पूरे यूरोप में सबसे कम है। इसलिए पोलैंड में गर्भपात के खिलाफ कानून को सख्त बनाने की वकालत करने वाले भी कम नहीं हैं। लेकिन एक आधुनिक समाज और यूरोपीय संघ का हिस्सा होने के नाते व्यक्तिगत आजादी को भी पोलैंड को संरक्षित करना होगा। गर्भपात कानून विरोधियों का कहना है कि महिलाएं इंसान हैं, न कि बच्चे पैदा करने वाली मशीन। इसलिए उन्हें कब और कितने बच्चे पैदा करने हैं, ये फैसला करने का हक सिर्फ उन्हें ही होना चाहिए।

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