Munich conference hopes to get adversaries talking between threats to global security – दुनिया पर मंडराते खतरों के बीच म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन

अशोक कुमार, डॉयचे वेले

दूसरे विश्व युद्ध के 70 साल बाद क्या दुनिया फिर किसी बड़ी जंग की तरफ बढ़ रही है? दुनिया में नए सिरे से शुरू हुई हथियारों की रेस को देखते हुए यह सवाल उठना लाजिमी है। अमेरिका अपने रक्षा बजट में रिकॉर्ड बढोत्तरी की तैयारी कर रहा है तो चीन और रूस भी अपनी सैन्य क्षमताओं को दिन रात नई धार देने में जुटे हैं। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष और उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों और मिसाइलों के परीक्षण की खबरें तो आप रोज सुनते ही हैं। यूक्रेन संकट के बाद यूरोप के लिए खतरे बढ़े हैं, तो शांति भारत और पाकिस्तान की सीमा पर भी नहीं हैं। कुल मिलाकर दुनिया बेहद खतरनाक होती जा रही है। इसीलिए जर्मनी के शहर म्यूनिख में हो रहे सुरक्षा सम्मेलन पर दुनिया भर की नजरें टिकी हैं। इस सालाना सम्मेलन में दुनिया भर के ऐसे नेता और आला अधिकारी मिलते हैं जिनके फैसले सीधे तौर पर वैश्विक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।

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तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा मे, इस्राएल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्याहू, इराकी प्रधानमंत्री हैदर अल अबादी, यूक्रेन के राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशेंको और रूस, ईरान और तुर्की के विदेश मंत्री हिस्सा ले रहे हैं। जर्मनी की तरफ से इस सम्मेलन में विदेश मंत्री जिगमार गाब्रिएल मौजूद रहेंगे। वहीं, अमेरिका से रक्षा मंत्री जिम मैटिस म्यूनिख पहुंचे हैं। इस बार म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन नाटो में मतभेद लगातार तेज हो रहे हैं। मतभेद की बड़ी वजह यूरोपीय देशों के बीच हुआ नया रक्षा समझौता है। अमेरिका को लगता है कि 25 यूरोपीय देशों के बीच पर्मानेंट स्ट्रक्चर्ड कोऑपरेशन (पेस्को) नाम के इस समझौते से नाटो की अहमियत कम होगी। हालांकि यूरोपीय संघ ने साफ कहा है कि उसका नाटो की जगह नया गठबंधन बनाने का कोई इरादा नहीं है। इस समझौते का मकसद रक्षा खर्च और नए सैन्य उपकरण बनाने में समन्वय कायम करना है ताकि संसाधनों की बर्बादी को रोका जा सके। अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से यूरोप और अमेरिका की दूरियां बढ़ी हैं। पिछले साल जर्मन चांसलर को कहना पड़ा कि यूरोपीय लोगों को अपनी किस्मत अपने हाथ में लेनी होगी। इसका मतलब है कि अब यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पहले की तरह निर्भर नहीं रह सकता।

रूस के साथ यूरोप के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। लेकिन जब रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया को अपना हिस्सा बना लिया, तो यह यूरोपीय संघ के लिए खतरे की घंटी थी। ऐसे में, इसे पेस्को के गठन की एक वजह माना जा सकता है। लेकिन अमेरिका ने यूरोप को साफ चेतावनी दी है कि यूरोप की हिफाजत के लिए अगर नाटो की जगह पेस्को को इस्तेमाल किया जाता है तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। सीरिया संकट भी नाटो के भीतर मतभेदों को बढ़ा रहा है। नाटो का अकेला मुस्लिम सदस्य तुर्की अमेरिका की तरफ से सीरियाई कुर्दों के संगठन वाईपीजी को हथियार दिए जाने से नाराज है। अमेरिका कुर्द लड़ाकों को आईएस के खिलाफ लड़ाई में इस्तेमाल कर रहा है जबकि तुर्की के लिए कुर्द लड़ाके आतंकवादी हैं। तुर्की ने कुर्द लड़ाकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सीरिया के आफरीन इलाके में अपनी फौज भेज दी है।

सीरिया में अब इस्लामिक स्टेट का दायरा सिमट कर बहुत कम रह गया है। बावजूद इसके सीरिया का भविष्य अब भी साफ नहीं है। राष्ट्रपति बशर अल असद और उन्हें हटाने के लिए कई साल से जद्दोजहद कर रहे बागियों के बीच समझौते का कोई रास्ता अभी नहीं दिखाई देता। रूस जहां राष्ट्रपति असद के साथ खड़ा है, वहीं अमेरिका और पश्चिमी देशों को असद फूटी आंख नहीं सुहाते और वे बागियों का समर्थन कर रहे हैं। ऐसे में सीरिया का संकट भी म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के अहम मुद्दों में शामिल है। शांति यमन के मोर्चे पर भी नहीं है। साथ ही सऊदी अरब और ईरान के बीच इलाके में अपना वर्चस्व कायम करने की खींचतान जारी है। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद ईरान के साथ हुआ परमाणु समझौता भी सवालों में है। यानि दुनिया की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा समझे जाने वाले जिस विवाद को बरसों चली वार्ताओं के बाद 2016 में सुलझाने का दावा किया गया, वहां से फिर नई लपटें उठ सकती हैं।

दक्षिण कोरिया के शीत ओलंपिक में उत्तर कोरिया के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी से कोरियाई प्रायद्वीप में थोड़ी बर्फ पिघली है। लेकिन उत्तर कोरिया के अस्त्रागार में शामिल हुए नए खतरनाक हथियार बराबर चिंता कारण बने हुए हैं। अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइल तैयार करने के उत्तर कोरियाई दावों को अमेरिका अनदेखा नहीं कर सकता है। इसीलिए अमेरिका ने परमाणु हथियारों को आधुनिक बनाने का काम शुरू कर दिया है। परमाणु हथियारों से होने वाली तबाही को देखते हुए बड़ा युद्ध भले ही न हो, लेकिन दुनिया में फिलहाल शांति कायम होने के आसार भी नहीं दिखते।  म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के आयोजकों का कहना है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्विक सुरक्षा के लिए हालात इतने पेचीदा कभी नहीं रहे जितने आजकल हैं। इस सालाना सुरक्षा सम्मेलन से उम्मीद है कि यहां जुटने वाले नेताओं के बीच सार्थक संवाद होगा। बंदूकों और तोपों के शोर से नहीं, शांति का रास्ता संवाद से निकलेगा।

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